
rahul gandhi
किसी का तीर्थयात्रा पर जाना कोई विचित्र बात नहीं होती और ऐसी यात्राओं पर मंथन का भी कोई कारण नहीं होना चाहिए। लेकिन, जब धर्म और राजनीति का घालमेल दिनों-दिन बढ़ता जा रहा हो, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा के राजनीतिक मतलब निकाले ही जाएंगे।
पार्टी यह कहकर नहीं बच सकती कि राहुल की धार्मिक गतिविधि उनका निजी मामला है। सार्वजनिक जीवन जीने वाले किसी भी व्यक्ति का सार्वजनिक तौर पर किया गया कोई भी काम निजी नहीं रह जाता। लिहाजा राहुल की मानसरोवर यात्रा को भी यह दिखाने की कोशिश माना जा रहा है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी पार्टी नहीं है, जैसा भाजपा प्रचारित करने की कोशिश करती रही है।
हो सकता है कि भाजपा को ऐसे प्रचार से लाभ मिल रहा हो पर, उससे मुकाबले के लिए अपने को हिंदू दिखाने का प्रयास या कांग्रेस को लाभान्वित कर पाएगा? यह ऐसा सवाल है जिसका आसान-सा जवाब है- नहीं। योंकि भाजपा पहले ही इसमें चैंपियन हो चुकी है। देश की सबसे पुरानी पार्टी आज अपने चरित्र को लेकर जिस तरह दुविधाग्रस्त नजर आती है, शायद पहले कभी नहीं दिखी है। वजह सिर्फ इसका अपने ही सिद्धांतों की पटरी से उतर जाना है।
कांग्रेस अध्यक्ष रहते महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, अबुल कलाम आजाद, मदनमोहन मालवीय, राजेंद्र प्रसाद व सरोजनी नायडु जैसी हस्तियों को कभी ऐसे किसी दिखावे की जरूरत नहीं पड़ी और पूरा देश कांग्रेस के साथ रहा। महात्मा गांधी की तो दिनचर्या ही ऐसी थी कि कोई आसानी से उन्हें कट्टर हिंदू मान सकता था, पर ऐसा माना नहीं जा सका। कट्टर हिंदू उन्हें मुस्लिमपरस्त और कट्टर मुस्लिम उन्हें हिंदू नेता बताने की कोशिश ही करते रह गए।
राजनीति में सर्व-धर्म समभाव की कांग्रेस जैसी मिसाल किसी दूसरी पार्टी में मिलना मुश्किल है। कांग्रेस ने अपना चरित्र बड़ी सूझ-बूझ के साथ ऐसा बनाया था कि वह देश से एकाकार होकर उसे आगे ले जा सके। आजादी के बाद कांग्रेस की सरकारों ने भी इसे बनाए रखा। कभी-कभी धार्मिक समूहों को साधने की कोशिश करते दिखने के बावजूद इसकी छवि किसी धर्म विशेष की पक्षधर या विरोधी नहीं रही।
राजीव गांधी ने पहली बार अयोध्या विवाद में हिंदुओं को और शाहबानो मामले से मुस्लिम कट्टरपंथियों को साधना चाहा। यहीं से धर्म को राजनीति से अलग रखने की सैद्धांतिक पटरी से कांग्रेस उतरती चली गई। इसने विरोधी दलों को कांग्रेस की गैर-हिंदू छवि रचने के मौके दिए। अब राहुल गांधी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि पार्टी को इस दाग से कैसे मुक्त करें।
चुनाव से पूर्व वह 'जनेऊधारी हिंदू' बनकर मंदिरों में घूमने लगते हैं और अब शिवभक्त बनकर मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले हैं। ऐसा दिखावा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भले ही ढाल प्रदान कर देता हो पर, यह इस पार्टी को भी उसी धरातल पर खड़ा कर देता है जिस पर भाजपा मजबूती से मौजूद है। ऐसा दिखावा कांग्रेस में पुराने मूल्यों की तलाश करने वाले मतदाताओं को किंकर्तव्यविमूढ़ बना देता है।

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