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जिसका डर था वही हुआ। लगातार गिरते रुपए के मूल्य ने नया इतिहास रच डाला। अमरीकी डॉलर की कीमत ७१ के पार हो गई। यानी देशवासियों को महंगाई से और जूझना होगा। गिरते रुपए और बढ़ती डॉलर की कीमत का सीधा असर आम आदमी की जेब पर होता है। २०१३ के मुकाबले रुपए का दस फीसदी के करीब अवमूल्यन हो चुका है। २९ अगस्त २०१३ को एक डॉलर की कीमत ६५.२१ रुपए थी जो कि अब ७१ को छू रही है। कारण कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और आयातकों की डॉलर में बढ़ती मांग को बताया जा रहा है। लेकिन क्या आयात पर ज्यादातर निर्भर भारत जैसे देश की मुद्रा का इतना अवमूल्यन सही है? क्या इससे हमारी अर्थव्यवस्था की कमर नहीं टूट जाएगी?
डॉलर महंगा होने से सभी आम उपभोक्ता वस्तुएं जिनमें विदेशी उपकरण या कलपुर्जे इस्तेमाल होते हैं, महंगे हो जाएंगे। विदेश यात्रा, पढ़ाई, इलाज का खर्च भी करीब दस फीसदी बढ़ जाएगा। मुद्रास्फीति बढ़ेगी। पेट्रोलियम उत्पाद ज्यादा कीमत पर मिलेंगे। इसका असर हर वर्ग पर पड़ेगा। कच्चा माल महंगा होने से औद्योगिक उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ेगा। अमरीका और अन्य विदेशी शहरों में लाखों छात्र-छात्रा उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं।
अमरीका में कुछ साल पहले तक एक छात्र की पढ़ाई का खर्च ३० से ४० हजार डॉलर आता था वह भी तब जबकि डॉलर की कीमत ६४ से ६५ रुपए के बीच थी। इसमें अब दस फीसदी यानी ३ से ४ लाख रुपए की वृद्धि हो जाएगी। विदेशों में शिक्षा के लिए जाने वालों में ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों से होते हैं। इनके अभिभावकों के लिए यह दस फीसदी का भार तमाम मुश्किलें खड़ी कर देगा। हां, यह जरूर है कि डॉलर महंगा होने से निर्यातकों और पर्यटन उद्योग, आईटी कम्पनियों के राजस्व में वृद्धि होगी लेकिन यह वृृद्धि अल्प और लाभ अल्पकालिक ही होगा। भारत सरकार के आर्थिक मामलों के सचिव एससी गर्ग ने दो दिन पूर्व ही दावा किया था कि डॉलर ७० रुपए से ज्यादा नहीं जाएगा। लेकिन दावे की दो दिन में ही हवा निकल गई।
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ रुपए के अभी और टूटने की आशंका जता रहे हैं। यानी आगे और दिक्कतें बढऩे वाली हैं। हमारे वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक को रुपए को मजबूत करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए। वर्ना जिस तरह पेट्रोल-डीजल के दाम रोज नया इतिहास रच रहे हैं, मुद्रास्फीति बढ़ रही है। आम आदमी का जीवन दूभर हो जाएगा। सरकार अगले वर्ष तक अर्थव्यवस्था में ब्रिटेन को पछाडऩे का दावा तो कर रही है लेकिन यदि आम नागरिक का जीवन स्तर बदतर होता गया तो ऐसे कागजी विकास (जीडीपी ८.२%) का फिर क्या फायदा? आजादी के बाद ७० सालों में जो भी सरकार रही, विकास के नए-नए दावे किए जाते रहे। लेकिन देश में बेरोजगारी, महंगाई पर कोई लगाम नहीं लगा पाया। घरेलू उत्पाद बढऩे के जितने भी कीर्तिमान बन जाएं लेकिन जब तक व्यापार असंतुलन नहीं बदलेगा, हम वहीं के वहीं खड़े दिखेंगे।
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