
ब्रह्म की शक्ति के परिचायक हैं शब्द, मर्यादा रखें ध्यान
अतुल कनक
लेखक और साहित्यकार
भारतीय जीवन दर्शन में शब्द की शक्ति को ब्रह्म माना गया है। समस्त मंत्रों के सृजन के मूल में इसी शक्ति की आराधना है। कहते हैं कि ब्रह्मशक्ति अमोघ होती है, अर्थात वह कभी व्यर्थ नहीं होती। कदाचित पौराणिक युद्धों में वर्णित ब्रह्मास्त्र की परिकल्पना के मूल में भी यही चिंतन रहा हो। कहते हैं कि ब्रह्मास्त्र का निर्माण इसलिए किया गया था ताकि जीवन नियमित और नियंत्रित बना रहे। शब्दों की भूमिका भी जीवन के नियमन और नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए भारतीय वांग्मय में कहा गया है कि वाणी और पानी का अपव्यय नहीं करना चाहिऐ।
महाभारत में प्रसंग है कि जब पाण्डवों ने अपना महल बनवाया तो अतिथि उसका वास्तु देखकर आश्चर्यचकित रह गए। जहां जमीन थी, वहां पानी लहराता सा दिखता था और जहां पानी था, वहां जमीन होने का भ्रम होता था। इसी भ्रम में दुर्योधन पानी में गिर गया। इस दृश्य को द्रौपदी ने गवाक्ष से देखा और वह दुर्योधन को अंधे का अंधा बेटा कह बैठी। इसी संवाद ने दुर्योधन के मन में उस दुराग्रह को बलवान किया, जो दुराग्रह अंतत: महाभारत के युद्ध तक पहुंचा। बेशक, कौरव पक्ष की अनीतियों और प्रपंचों को महाभारत की चर्चा करते समय अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन, शब्दों की जिस मर्यादा का उल्लंघन अपने संबोधन में द्रौपदी ने किया था, उसे भी किसी दृष्टि से सभ्य समाज में ठीक नहीं कहा जा सकता। कहते हैं कि तलवार के घाव भर जाते हैं, लेकिन वाणी से दिए गए घाव कभी नहीं भरते। इसीलिए बुजुर्ग शिक्षा देते हैं कि हमें आवेश में कोई बात नहीं कहनी चाहिए। मनुस्मृति का एक प्रसिद्ध श्लोक है, 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात असत्यं प्रियं/ सत्यं च नानृतम् ब्रूयात् ऐष धर्म: सनातन:' अर्थात सनातन धर्म कहता है कि हम सत्य और प्रिय बोलें। लेकिन, प्रिय लगने वाला असत्य नहीं बोलें और सत्य को भी प्रिय तरीके से बोलें। स्पष्ट है कि अपने मूल में यह शिक्षा भी शब्दों की मर्यादा के निर्वहन की ही प्रेरणा देती है। दुर्भाग्य से सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित कुछ लोग सार्वजनिक रूप से इस मर्यादा का उल्लंघन करने लगे हैं। पिछले दिनों भारतीय संसद में ऐसा घटनाक्रम एक बार फिर देखने को मिला। चुनाव के दिनों में लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं और भी देखने को मिल सकती हैं, क्योंकि हर कीमत पर स्वयं को प्रतिस्पर्धी से बेहतर साबित करने की जिद कई बार अनावश्यक प्रपंचों को भी जन्म देती है। जो लोग सार्वजनिक जीवन में होते हैं, उन पर सामाजिक मर्यादाओं के निर्वहन का दायित्व अधिक होता है। यह राजा शिवि का देश है, जिन्होंने शरणागत कबूतर को बचाने के लिए अपनी जांघ का मांस काटकर शिकारी बाज को दे दिया था। राजा शिवि की कथा का भी मंतव्य यही समझाना है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोगों को कई बार व्यापक हितों को देखते हुए वैयक्तिक सुखों का त्याग करना होता है। फिर आवेश में किसी को अपमानजनक तरीके से संबोधित करने में तो कोई वास्तविक सुख भी नहीं होता।
शब्द ब्रह्म की शक्ति के परिचायक हैं। उनकी मर्यादा का निर्वहन किया ही जाना चाहिए। महाभारत की एक कथा है। एक रात अश्वत्थामा पाण्डवों के पुत्रों को मारकर भागता है। अर्जुन उसका पीछा करता है तो बौखलाया हुआ अश्वत्थामा अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ देता है। प्रत्युत्तर में अर्जुन भी ब्रह्मास्त्र का प्रहार करता है। यह स्थिति सृष्टि के विनाश वाली प्रतीत होती है। ऐसे में महर्षि व्यास उपस्थित होकर दोनों से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने का आग्रह करते हैं। हालांकि अर्जुन तो अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लेता है, लेकिन अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र वापस लेने का तरीका नहीं आता था, इसलिए वह उसका रुख मोड़ देता है। परिणाम स्वरूप उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित को यह अस्त्र लगा। हालांकि कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित को अपनी शक्तियों से नवजीवन दे दिया लेकिन ब्रह्मास्त्र के दुरुपयोग से क्षुब्ध होकर अश्वत्थामा के सिर से वह मणि निकाल ली जो उसे तेजस्विता दे रही थी। अश्वत्थामा को चिरंजीव माना गया है। कहते हैं कि आज भी वह अपना घाव लिए इस पृथ्वी पर भटक रहा है। शब्दों के कारण पनपे घाव इसी तरह के होते हैं। वे आसानी से नहीं भरते। ...तो क्यों न हम शब्दों की शुचिता के प्रति और उनके सदुपयोग के प्रति सतर्क रहें।
Published on:
03 Oct 2023 09:48 pm
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