10 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

देश की युवा शक्ति बने दुनिया की ‘स्किल कैपिटल’

रोजगारदाताओं की जरूरत व नौकरी चाहने वालों के हुनर के बीच मेल नहीं, औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित  

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Patrika Desk

Feb 08, 2023

skill_capital.png

दिनेश सूद
राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के प्रशिक्षण सहभागी
.....................................................................

भारत की बे-लगाम आबादी इस साल चीन को भी पछाड़ देगी। संभावना जताई जा रही है कि 1 जुलाई तक भारत 142.80 करोड़ आबादी के साथ दुनिया में सबसे आगे होगा और 142.60 करोड़ आबादी के साथ चीन दूसरे स्थान पर रह जाएगा। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में भारत के समक्ष कई चुनौतियों के बीच अवसर भी अपार हैं। इस रेकॉर्ड आबादी की विशेषता यह है कि जब विकसित देशों अमरीका, जापान, जर्मनी, चीन और यूरोप की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी उम्रदराज है, भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु वर्ग की है। इस युवा जनशक्ति को दुनिया की ‘स्किल कैपिटल’ के रूप में स्थापित करने के लिए ‘रेडी टु हायर’ वर्कफोर्स के रूप में विकसित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए देशभर में 30 स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर खोले जाने का प्रावधान केंद्रीय बजट में किए जाने से भारत की युवा शक्ति को दुनिया की ‘स्किल कैपिटल’ के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी।

अमेरिका चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुताबिक, कंज्यूमर गुड्स मेन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 55, होलसेल व रिटेल ट्रेड कारोबार में 70, फाइनेंशियल सर्विसेज में 20 व हॉस्पिटेलिटी सेक्टर में 35 प्रतिशत कामगारों की कमी है। यूरोपियन कमीशन का अनुमान है कि फाइनेंशियल और बिजनेस सर्विस सेक्टर में प्रतिभाशाली कामगारों की कमी के कारण 2030 तक यूरोपीय संघ देशों की अर्थव्यवस्था को 1.323 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का नुकसान हो सकता है। 24 लाख कामगारों की कमी का सामना करने वाले जर्मनी मेें 2030 तक एक करोड़ कुशल कामगारों की कमी हो सकती है। दुनिया का तीसरा प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग देश जापान भी कामगारों की भारी किल्लत का सामना कर रहा है। जापान में हुए अध्ययनों के मुताबिक, 2030 तक कामगारों की कमी के कारण जापान की अर्थव्यवस्था को 194.61 बिलियन अमरीकी डॉलर राजस्व का नुकसान हो सकता है।

दूसरी ओर, भारत में हर साल करीब 1.20 करोड़ युवा रोजगार योग्य उम्र तक पहुंचते हैं पर हम उन्हें रोजगार देने में इसलिए असमर्थ हैं क्योंकि 90 प्रतिशत नौकरियां कौशल आधारित हैं। दिसंबर 2022 में आई सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘33 प्रतिशत शिक्षित युवा बेरोजगार हैं।’ उच्च डिग्रीधारी लाखों युवा हुनर के हथियार से लैस न होने के कारण बेरोजगार हैं। हुनर से हमारा मतलब निश्चित रूप से किसी को शालीनता से आजीविका कमाने लायक बनाना है। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट (आइएसआर) 2022 के मुताबिक, ‘उच्च शिक्षण संस्थानों से निकलने वालों में से केवल 46.2 प्रतिशत ही रोजगार पाने लायक हैं।’ शिक्षित होने के बावजूद बेरोजगारी का संताप युवाओं में मानसिक रोग, नशा और अपराध जैसी समस्याओं का एक बड़ा कारण है।

कई अर्थशास्त्री और सामाजिक वैज्ञानिक भारत की विशाल आबादी को भूख, कुपोषण और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जोड़ते हैं पर यह भी विफलता ही है कि आजादी के 75 वर्षों में कुशलता की राह पर हमारी यात्रा संतोषजनक नहीं रही है। स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग के अलावा, रोजगार योग्य हुनर की कमी अब भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है इसलिए देश के सामने शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या एक समस्या है। रोजगारदाताओं की जरूरत और नौकरी चाहने वालों के हुनर के बीच मेल न होने से औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। हुनरमंद कामगारों की मांग और बाजार में उनकी उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। पूरा असंगठित क्षेत्र अर्ध-कुशल या अकुशल श्रमिकों पर निर्भर है। सीमित प्रशिक्षण सुविधाओं के साथ 83 प्रतिशत कार्यबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस सेक्टर में कौशल उन्नयन बड़ी चुनौती बना हुआ है। नीति आयोग के मुताबिक, कौशल विकास की प्रमुख चुनौतियों में स्कूली शिक्षा के दौरान ही व्यावसायिक प्रशिक्षण को एक जरूरी विकल्प बनाना, बेहतर गुणवत्ता और प्रासंगिकता के लिए उद्योग को कौशल प्रशिक्षण से जोडऩा और कौशल विकास तंत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन प्रणाली स्थापित करना जरूरी है।
हुनरमंद लोगों की कमी शिक्षा प्रणाली से सीधे तौर पर जुड़ी है। स्कूली शिक्षा पूरी न करने वाले ज्यादातर लोग कुछ प्रशिक्षित लोगों के साथ हेल्पर मजदूर के रूप में शुरुआत करते हैं और समय के साथ आजीविका कमाने के लिए कौशल सीखते हैं। योग्य प्रशिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण संस्थानों की क्षमता भी बढ़ानी होगी। फिलहाल इन संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्लंबर, बढ़ई, इलेक्ट्रिशियन या ब्यूटीशियन तैयार करने की कोई व्यवस्था नहीं है ताकि वे विदेश में भी आसानी से नौकरी पा सकें।