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पाली की 550 महिलाओं को मिला मातृत्व सुख

आइवीएफ से 50 साल तक की महिलाएं बन रही मां

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Rajeev Dave

May 18, 2023

नि:संतानता एक बहुत बड़ा दर्द है। इस पीड़ा को झेलने वाली महिलाओं के लिए आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) यानी टेस्ट ट्यूब बेबी वरदान से कम नहीं है। इस तकनीक से पाली जिले में 550 महिलाओं को मातृत्व सुख मिल चुका हैं। घर में किलकारी गूंजने से खुशियां कई गुना बढ़ गई है। हालांकि, पहले 70 वर्ष की महिलाएं व पुरुष भी मातृ-पितृ सुख प्राप्त कर लेते थे, लेकिन अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइड लाइन के कारण 50 वर्ष आयु तक की महिलाएं व 55 वर्ष आयु के पुरुष ही आइवीएफ से संतान प्राप्त कर सकते हैं।

क्या है आइवीएफ:

-आइवीएफ गर्भधारण की एक आर्टिफिशियल प्रक्रिया है। आइवीएफ उपचार के दौरान प्रयोगशाला में महिला के अंडो व पुरुष के शुक्राणु को मिलाया जाता है। इन्क्यूबेटर में पांच दिन का भ्रूण तैयार किया जाता है। इसके बाद उसे गभाZशय में छोड़ दिया जाता है।

अब ये करना होगा:
– असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेशन 2023 के तहत अब महिला के गर्भाशय में एक या दो स्वस्थ भ्रूण ही ट्रांसफर हो सकेंगे। गंभीर मामलों में ही तीन भ्रूण ट्रांसफर हो सकेंगे। पहले चार व इससे अधिक भ्रूण भी रखे जाते थे। हर आइवीएफ प्रक्रिया की जानकारी सरकार को देनी होगी।

इस कारण की सख्ती:
इंडियन सोसाइटी ऑफ असिस्टेड रिप्रोडक्शन के अनुसार 27.5 मिलियन बांझपन के शिकार हैं। गर्भधारण के लिए इनमें से अधिकतर आइवीएफ तकनीक का सहारा लेते हैं, लेकिन असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी के नियमों को कड़ा किया गया है। इसका उद्देश्य तेजी से पैसा बनाने वाले उद्योग पर लगाम लगाना है।

आइवीएफ में डोनर सर्विस के लिए शपथ पत्र बनवाना होता है। अब सरकार से स्वीकृत डोनर बैंक से ही अंडे व शुक्राणु के लिए डोनर बुलाया जा सकता है। राजस्थान में अभी डोनर बैंक नहीं है। ऐसे में आइवीएफ सेंटरों पर अन्य राज्य के बैंकों से डोनर बुलाते है। एक डोनर एक ही दम्पती को अंडे या शुक्राणु डोनेट कर सकता है।

बांझपन की वजह:
नौकरी का बढ़ता दवाब, प्रदूषण और अधिक उम्र में मां-पिता बनना

एक्सपर्ट का कहना:

– इस प्रक्रिया में तीन लेवल होते है। लेवल एक में आइयूआई होती है। जिसमे गभाZशय में शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है।

– लेवल दो में आइवीएफ तकनीक है। इसमें प्रयोगशाला में भ्रूण तैयार कर गभाZशय में रखा जाता है। पाली के बांगड़ चिकित्सालय में इस तकनीक से उपचार किया जाता है।
– लेवल तीन में इक्सी तकनीक के तहत शुक्राणु को अण्डबीज में निशेचन के लिए डालते है।

डॉ. दिपाली लोढ़ा, आइवीएफ विशेषज्ञ, पाली