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खबर में पढे़ : कैसे जानलेवा सस्ते नशे के भंवर में जकड़ रहा बचपन

-जेब में नहीं पैसा, फिर भी थिनर, व्हाइटनर व सॉल्यूशन के नशे में डूब रहा बालमन मजदूरी करने वाले बच्चे भी करते हैं ऐसा नशा जो छुड़ाना भी मुश्किल

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तम्बाकू, शराब व स्मैक से भी अधिक खतरनाक नशे की लत शहर के किशोरावस्था वाले बच्चों और युवाओं में घर करता जा रहा है। यह सस्ता होने के कारण हर किसी की पहुंच में भी है और आसानी से दुकानों पर भी मिल रहा है। मारवाड़ जंक्शन में रेलवे की पटरियों के किनारे बसी कच्ची बस्ती में मंगलवार को यह खतरनाक स्थिति सामने आई। यहां रहने वाले 14 से 20 साल तक बच्चे और युवा इस नशे की गिरफ्त में आ चुके हैं। ये बच्चे ना तो स्कूल जाते हैं और ना इन पर किसी का दबाव है। यही कारण है कि कचरा बीनने और दिहाड़ी मजदूर करने वाले ये बच्चे और युवा टायर चिपकाने वाले सोल्यूशन व वाइटनर का उपयोग नशे के रूप में कर रहे हैं। इसी पर पेश है संवाददाता प्रवीणसिंह चौहान व रमेश पंवार की पड़ताल।

पाली/मारवाड़ जंक्शन. जिले की बदलती आबोहवा अब उन परिजनों के लिए चेतावनी है, जो अभी भी अपने बच्चों की देखरेख के लिए समय नहीं दे पा रहे हैं। जिन बच्चों को पैसा आसानी से मिल जाता है। वे हुक्के, शराब व स्मैक जैसे नशे में पड़ रहे हैं। वहीं जिन बच्चों के पास एक वक्त खाने के रुपए नहीं है। वे सस्ते व जानलेवा नशे के आदी हो चुके हैं। बड़े शहरों की स्लम बस्तियों में यह नशा कई लोग करते हैं, लेकिन अब यह हमारे शहर व गांवों तक पहुंच गया है। यहां के युवा व बच्चे भी केमिकल से बने थिनर, स्याही मिटाने वाले वाइटनर, टायर का पंक्चर बनाने वाले सोल्यूसन, बोंड, पेट्रोल व डीजल को सूंघकर नशा करते हैं। यह नशा करने के बाद ये युवा व बच्चे बेसुध हो जाते हैं।

पैसा नहीं तो क्या, स्मैक से ज्यादा मस्त

मारवाड़ जंक्शन में कचरा बीनने वाले एक बालक ने बताया कि वह दिनभर में कचरा बीनकर 80 से 100 रुपए कमा लेता है। इस पैसे से वह शराब या अन्य नशा नहीं कर पाता है। इस कारण वह बाजार से पंक्चर बनाने की ट्यूब या थिनर लेकर नशा करते हैं। यह खरीदने पर कोई टोकता भी नहीं हैं। वे इस थिनर या ट्यूब को कपड़े पर लगाकर नाक से सूंघते हैं। इसके बाद उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता। उसका कहना था अब वह नशे का आदी हो गया है। उसके साथ कई बच्चे भी यह नशा करते हैं।

माता-पिता मजदूर, 11वीं का बच्चा बन गया नशेड़ी

पाली के सोसायटी नगर में रहने वाला एक श्रमिक व उसकी पत्नी सुबह मजदूरी के लिए जाते हैं। उनका 11वीं में पढऩे वाला बेटा स्कूल से आने के बाद घर पर अकेला ही रहता है। वह कई बार स्कूल जाने के बजाय दोस्तों के साथ ही पास ही पार्क में बैठा रहता है। एक दिन जब माता पिता को मजदूरी नहीं मिली वे वापस घर लौटे तो बेटा घर पर नहीं था। इस पर उन्होंने उसकी तलाश की तो वह मोहल्ले के पार्क में बेहोशी की हालत में मिला। परिजन उसे बांगड़ अस्पताल लेकर गए। वहां चिकित्सकों ने काउंसलिंग के बाद बताया कि वह पंक्चर बनाने के सोल्यूशन को सूंघकर रशा करता हैं। उसने यह भी बताया कि उसके साथ उसके 6 अन्य दोस्त भी यह नशा करते हैं।

बच्चों में तेजी से फैल रहा है नशा

किशोर अवस्था यानी 12 से 18 साल के बच्चों में यह नशा तेजी से फैल रहा है। इस नशे की गिरफ्त में गरीब परिवार के बच्चे अधिक आ रहे हैं। इन बच्चों को पंक्चर बनाने का सोल्यूशन, थिनर, वाइटनर, डीजल व पट्रोल आसानी से मिल जाते हैं, जिसका वे नशे के रूप में उपयोग करते हैं। इस तरह का नशा पहले बड़े शहरों की कच्ची बस्तियों में फैला हुआ था। लेकिन, अब यह नशा तेजी से पाली जैसे छोटे शहरों में फैल रहा है। इस तरह के नशे से बालक व युवाओं का मानसिक विकास रूक जाता है। उसका शरीर अपने आप ही कुरूप होता जाता है। इतना ही नहीं अगर इसका ज्यादा डोज ले लिया जाए तो नशेडी लम्बी बेहोशी में भी चला जाता है, जिससे उसकी मौत हो सकती है।

-डॉ. दलजीतसिंह राणावत, मनोरोग विशेषज्ञ, बांगड़ अस्पताल

पत्रिका व्यू

जिले में गरीब परिवार के बच्चे तेजी से इस तरह के नशे चपेट में आ रहे हैं। उनके साथ कई सम्पन्न परिवार के बच्चे भी चोरी-छिपे यह नशा करने लगे हैं। जिले के ज्यादातर रेलवे स्टेशन के किनारे स्लम बस्तियों में यह नशा पैर पसार चुका है। इसे बेचने वाले और इन बच्चों के पास रहने वाले भी इससे अनभिज्ञ नहीं हैं, लेकिन इन बच्चों को कोई रोक नहीं रहा है। यह ऐसा नशा है जिसकी लत लगने के बाद छुड़ाना तक मुश्किल है। ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वे किशोरावस्था में बच्चों पर पूरी नजर रखे। नहीं तो बच्चे अपने जीवन के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। यह ऐसा नशा है जिसे जिला प्रशासन, पुलिस, चिकित्सा विभाग, बाल कल्याण समिति भी रोक नहीं पा रही है और हमारी पीढ़ी गर्त में जा रही है। इसे छुड़ाने की कोई दवा तो नहीं है, लेकिन काउंसलिंग से कुछ हद तक इसे छुड़ाने में सफलता मिल सकती है।

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