
पाली. भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पंचकर्म प्राचीन व प्रमाणिक है। इस चिकित्सा पद्धति का शरीर पर कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है। इसमें स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम अर्थात स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना, आतुरस्य विकारोपशनम् अर्थात रोगों का नाश करना व रसायन वाजीकरण गुण प्राप्त्यर्थम् अर्थात रसायन वाजीकरण व असाधारण गुण प्राप्त करने का सिद्धांत है। यह दिनचर्या, ऋतुचर्या व आधारणीय वेग के आधार पर है। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, भानुवासन, निरुह और नस्य ये पांच कर्म हैं।
आचार्य चरक ने ये बताया
आचार्य चरक ने पंचकर्म चिकित्सा के लिए शोधन व शमन दो विधि बताई है। इनमें फिर से पांच व सात कर्म से उपचार किया जाता है।
शोधन विधि के पांच कर्म- वमन, विरेचन, वस्ति, नस्य व रक्त मोक्षण
शमन के पांच कर्म - दीपन, पाचन, श्रतु, तृषा, व्यायाम, आतप व वायु
सर्दी में ये रोग होते हैं
सर्दी में जोड़ों का दर्द, स्पाइन, डिस्क रोग अधिक होते हंै। इसका कारण है सर्दी से पहले वर्षा के मौसम में शरीर शीतलता का अनुभव करता है। उसका अभ्यस्त हो जाता है। उस समय शरीर में जमा पित्त व वात दोष सर्दी में अधिक प्रभाव दिखाता है। इस कारण जोड़ों में जकडऩ, ब्लड प्रेशर, अस्थमा आदि रोग बढ़ जाते हैं।
इन क्रियाओं से बढ़ता रोग
सर्दी में आहार का विशेष ख्याल रखना चाहिए। इस मौसम में नशा करने, फास्ट फूड अधिक खाने, तैलीय खाद्य सामग्री का उपयोग करने, मिर्च-मसाला तेज खाने, दिन में शयन करने आदि से रोग अधिक तेजी से प्रभावित करता है। इस कारण सर्दी में सुपाच्य भोजन करना चाहिए। दिन में शयन नहीं करना चाहिए।
प्रकृति के अनुसार उपचार
पंचकर्म में नाड़ी से मनुष्य शरीर की प्रकृति (त्रिदोष रचना) का पता किया जाता है। वायु, पित्त व कफ त्रिदोष के आधार पर मनुष्य की प्रकृति सात प्रकार की हो सकती है।
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