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आओ गांव चलें : त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है यह गांव, यहां से निकलता है पश्चिमी राजस्थान का रास्ता

- संत कालूराम महाराज की तपोभूमि आस्था का प्रमुख केंद्र

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पाली

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Suresh Hemnani

Jun 09, 2021

आओ गांव चलें : त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है यह गांव, यहां से निकलता है पश्चिमी राजस्थान का रास्ता

आओ गांव चलें : त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है यह गांव, यहां से निकलता है पश्चिमी राजस्थान का रास्ता

पाली/बर मारवाड़। अरावली पर्वत शृंखलाओं के बीच मारवाड़ रियासत के अंतिम छोर व रायपुर उपखंड मुख्यालय से 8 किमी दूर स्थित बर मारवाड़ गांव आस्था, ज्ञान, कला, साहित्य एवं संस्कृति की समृद्ध परंपराओं की तपोभूमि है। इस गांव को संत कालूराम महाराज की तपोभूमि के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव को त्रिवेणी संगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां से गुजरने वाले दिल्ली-अहमदाबाद नेशनल हाईवे व पश्चिमी राजस्थान को जोडऩे वाले जोधपुर जयपुर मार्ग का मध्य केंद्र है। इन तीनों राष्ट्रीय राजमार्ग को जोडऩे के लिए बर मध्य पॉइंट बना हुआ है। इस कारण इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।

यहां पिछले एक दशक से भी ज्यादा इस गांव को एक नई पहचान मिली है। वो यहां के प्रसिद्ध रबड़ी के घेवर व मिर्ची बड़े विख्यात है। जिसका स्वाद चखने के लिए दूर दराज से लोग आते है। बारह हजार की आबादी वाले इस गांव में महान तपस्वी सन्त चरणदास, जानकीनाथ, कालूराम महाराज, शंकर महाराज की तपोभूमि है। धार्मिक दृष्टि से यहां बर पुराने गढ़ में स्थिति ठाकुरजी व चारभुजा का मंदिर है। जो लगभग तीन सदी पुराना है। दूसरी तरफ यहां संत कालूराम महाराज की धूणी है, जो लगभग पांच सौ वर्ष पुरानी है। संत कालूराम महाराज के तप का वर्चस्व मारवाड़ रियासत से लेकर नेपाल तक रहा। उनका अवतरण संवत 1862 में हुआ था। संवत 2009 में 147 वर्ष की उम्र अग्नि स्नान कर देवलोक गमन हो गया था। संत कालूराम महाराज को बर निवासी आराध्य देव के रूप में पूजते हैं।

पांच सौ पूर्व बसा गांव
इतिहास की दृष्टि से बर गांव आज से करीब 500 वर्ष पूर्व ठाकुर जगनाथ उदावत ने बसाया था। ठाकुर जयनाथसिंह उदावत रायपुर मारवाड़ के राजा कल्याण सिंह के पुत्र थे। जिनकी ऐतिहासिक पुतिलिया गांव के प्रमुख तालाब पर अपने इतिहास की गवाही दे रही हैं। बर के ठाकुरों को अपनी सफ ल युद्ध रणनीति के लिए भी जाना जाता है। वर्तमान में बर मारवाड़ की रियासत के पन्द्रहवें ठाकुर गिरीशसिंह राठौड़ हैं।

ऐतिहासिक नगरीं में समस्याएं अपार
कहने को तो यहां यातायात की सुगम व्यवस्था है लेकिन समस्या का अंबार भी कम नहीं है। चिकित्सा को लेकर क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या पिछले लंबे समय से है। मरीजों को उपचार के लिए नजदीक ब्यावर व जैतारण के लिए जाना पड़ता है। यहां के वासिंदे लंबे समय से पीएससी को सीएससी में क्रमोन्नत करने की मांग कर रहे हैं। यहां के अधिकांश लोग खनन कार्यों से भी जुड़े हुए हैं। जिससे खननकर्ताओं को सिलिकोसिस बीमारी से भी गुजरना पड़ता है। पशुओं के लिए आवंटित गोचर भूमि पर कई माफियाओं ने अतिक्रमण कर रखा है।

विभिन्न क्षेत्रों में कर रहे देश सेवा
देशसेवा का जज्बा यहां लगभग हर परिवार में रहा है। यही वजह है कि राजस्थान ज्यूडिशियल में बड़े स्तर पर सेवा दी हुई है। बीएसएफ में भारत के पहले युवा कर्नल राजेन्द्र सिंह बने थे, जो बर से थे, अभी रिटायर्ड हैं । एक दर्जन से ज्यादा जवान सुरक्षा बलों में कार्यरत हैं। यहां कई स्वतंत्रता सेनानी भी हुए थे। चिकित्सा क्षेत्र में भी एम्स बिहार छत्तीसगढ़ में तीन युवक निरंतर सेवा दे रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में भी यहां का दबदबा रहा है। यहां महाधिवक्ता लक्ष्मणसिंह भारत के उप राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखवात के विशेष सहलाकर रह चुके हैं। नब्बे के दशक में पत्र व्यवहार से विकास क्रांति लाने में रामसिंह उदावत की अहम भूमिका रही है।

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