11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

ढाई प्याली मदिरा का लगता है मां भवाल रानी के भोग

नवरात्रा विशेष : दो स्वरूप में विराजित मां का एक साथ होता है पूजन Navratri Festival 2019 Special in pali :

2 min read
Google source verification

पाली

image

Suresh Hemnani

Oct 04, 2019

ढाई प्याली मदिरा का लगता है मां भवाल रानी के भोग

ढाई प्याली मदिरा का लगता है मां भवाल रानी के भोग

पाली/रायपुर मारवाड़। Navratri Festival 2019 Special in pali : जगत जननी मातेश्वरी के 51 शक्ति पीठ में भवाल माता [ Bhawal Mata ] के दरबार की अलग ही पहचान है। माता के इस रहस्यमयी मन्दिर के बारे सुनते ही श्रद्धालुओं के जहन में दर्शन करने की ललक जाग उठती है। वजह भी है कि माता के इस दरबार मे मां को चांदी की प्याली में मदिरा परोसी जाती है। मां अपने काली स्वरूप में उस मदिरा को ग्रहण करती हैं। चमत्कार का प्रमाण भी देती हैं। आपको यह जानकार भले ही हैरानी हो लेकिन ये सत्य है।

पाली जिले की सीमा व नागौर जिले [ Nagaur District ] के भवालगढ़ गांव [ Bhawalgarh Village ] में स्थित माता के प्राचीन मंदिर [ Ancient temple ] में कदम कदम पर रहस्य समाया हुआ है। मन्दिर में रखे शिलालेख के मुताबिक ये मन्दिर विक्रम संवत 1170 यानी 12वीं शताब्दी का है। इस मंदिर का निर्माण किसी राजा या दानदाता ने नहीं बल्कि डाकुओं ने लूटे गए खजाने से कराया था। गांव के बुजुर्गों व दंत कथा पर यकीन करें तो डाकुओं की टोली ने भारी मात्रा में सोना लूटा था। तब माता की प्रतिमाएं एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर विराजित थीं। डाकुओं ने यहां से गुजरते समय इसी चबूतरे पर बैठ लूट का माल आपस मे बांटना शुरू किया। इसी बीच पीछा करते हुए राजा की सेना वहां पहुच गई।

लुटेरे मवेशियों के झुंड में तब्दील हो गए थे। इससे उन लुटेरों की जान बच गई। माता के इस चमत्कार से प्रभावित हुए लुटेरों ने लाल पत्थर से माता के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर की पत्थरों से बनी दीवारों पर यश गन्धर्व सहित विविध देवी देवताओं की कलाकृतियां बनी हैं। यहां मन्दिर में माता की दो प्रतिमाएं विराजित हैं। जिनमें काली व ब्राह्मणी स्वरूप का एक साथ पूजन किया जाता है। माता ब्राह्मणी को मिठाई व फ लों का भोग लगता है। जबकि काली माता को मदिरा का भोग लगाया जाता है। मन्दिर में पुजारी के अलावा किसी अन्य को प्रवेश नहीं दिया जाता। भक्त मदिरा की बोतल लाकर पुजारी को सौंप देते हैं। पुजारी द्वारा चांदी की प्याली में मदिरा भरकर उस प्याली को माता काली के होठों से लगा पुजारी अपनी आंखें बंद कर माता से ग्रहण करने का आग्रह करता है। ऐसा तीन बार किया जाता है। माता दो प्याली पूरी व तीसरी प्याली आधी ग्रहण करती हैं।

बची आधी प्याली माता के समक्ष प्रज्वलित अंखड ज्योत में प्रवाह कर दी जाती है। सुबह से लेकर देर शाम तक सैकड़ों भक्त हाथों में प्रसाद रूपी मदिरा बोतल लेकर मन्दिर पहुंचते हैं। इस रहस्य की तह तक जाने के लिए बीते 100 सालों में कई बार विशेषज्ञयो ने यहां आकर दिमागी घोड़े दौड़ाए लेकिन आखिरकार उन्हें भी इसे माता का ही चमत्कार मान लौटना पड़ा। मन्दिर में तम्बाकू व चमड़े से बनी किसी भी वस्तु के साथ प्रवेश करना वर्जित है। इस मंदिर में नवरात्रा के दिनों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। यहां देश भर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए पहुंचते हैं।