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नीतीश युग का आर्थिक चमत्कार! 22 हजार करोड़ से 3.5 लाख करोड़ पहुंचा बजट, जानें आय और इंफ्रास्ट्रक्चर में कैसे लगाई बड़ी छलांग

नीतीश युग में बिहार धीरे-धीरे प्रशासनिक कमज़ोरी की स्थिति से निकलकर अपेक्षाकृत स्थिरता की ओर बढ़ा। पिछले लगभग 20 वर्षों में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य में शासन और विकास के लिए एक मजबूत संस्थागत और बुनियादी ढांचा तैयार हुआ।

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Nitish Kumar

नीतीश कुमार ने दिया इस्तीफा (ANI)

नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन की चर्चा ने पूरे देश के राजनीतिक हलकों में व्यापक बहस को जन्म दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) को बड़ी जीत दिलाने और लगभग दो दशकों तक राज्य की राजनीति के केंद्रीय नेता बने रहने के बाद,उनका यह कदम केवल एक व्यक्तिगत बदलाव नहीं माना जाएगा। यह बिहार के राजनीतिक विकास के एक महत्वपूर्ण चरण के समाप्त होने का प्रतीक भी होगा, जिसे अक्सर “नीतीश युग” के रूप में देखा जाता है। इस दौर में राज्य ने धीरे-धीरे प्रशासनिक कमज़ोरी और अव्यवस्था की छवि से निकलकर अपेक्षाकृत स्थिरता की दिशा में कदम बढ़ाया, और संस्थागत पुनर्निर्माण की एक सावधानीपूर्वक प्रक्रिया देखने को मिली।

गवर्नेंस के गहरे संकट

नीतीश कुमार ने जब 2005 में मुख्यमंत्री पद संभाला, तब बिहार गवर्नेंस के गहरे संकट से जूझ रहा था। राज्य का इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर था, सरकारी संस्थाएँ बुनियादी सेवाएँ देने में संघर्ष कर रही थीं, और जातीय हिंसा, फिरौती के लिए अपहरण तथा ज़मीन से जुड़े विवादों की लगातार खबरों के कारण पूरे देश में राज्य की छवि खराब हो गई थी। ऐसी स्थिति में राज्य की प्रशासनिक अधिकारिता और कानून-व्यवस्था को बहाल करना उनकी सरकार की पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन गई। उनकी सरकार ने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने, प्रशासनिक अनुशासन स्थापित करने, नौकरशाही की जवाबदेही बढ़ाने और पुलिस व्यवस्था में सुधार पर विशेष जोर दिया। इन कदमों के कारण धीरे-धीरे आम लोगों के दैनिक जीवन का माहौल बदलने लगा। सुरक्षा की भावना के वापस आने से लोगों का भरोसा फिर से बढ़ा और राज्य में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनने लगीं।

बजट का आकार बढ़ाया

बिहार की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। राज्य का ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) 2025–26 तक लगभग 10.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है। इसी के साथ राज्य की सरकारी वित्तीय क्षमता भी काफी बढ़ी है।2000 के दशक के मध्य में राज्य का बजट जहाँ लगभग 22,000–24,000 करोड़ रुपये के आसपास था, वहीं 2026–27 में यह बढ़कर लगभग 3.47 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। प्रति व्यक्ति आय, जो 2004–05 में लगभग 8,773 रुपये थी, 2024–25 तक बढ़कर लगभग 76,490 रुपये हो गई है, हालाँकि यह अभी भी देश में सबसे कम में से एक बनी हुई है। इसी अवधि में सड़क संपर्क में उल्लेखनीय सुधार हुआ, बिजली की पहुँच का दायरा बढ़ा, और जिला तथा प्रखंड स्तर पर प्रशासनिक ढाँचे में लंबे समय से रुका हुआ निवेश भी शुरू हुआ। इन बदलावों ने राज्य के विकास के लिए बुनियादी आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सड़कों का जाल बिछाया

नीतीश कुमार सरकार से पहले बिहार लंबे समय तक कमजोर व्यय प्रबंधन की समस्या से जूझता रहा था, जिसकी पहचान “मार्च लूट” जैसी प्रवृत्ति से होती थी, जब विभाग वित्तीय वर्ष के अंत में उपलब्ध धनराशि को जल्दबाज़ी में खर्च करने की कोशिश करते थे। लेकिन, नीतीश सरकार ने नेतृत्व में प्रशासनिक तंत्र में धीरे-धीरे सुधार किया। विशेष रूप से नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी के बीच बनी साझेदारी बजट प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन को बेहतर बनाने में काफी अहम साबित हुई।

महिलाओं को मुख्य धारा से जोड़ा

इसके साथ ही बिहार में महिलाओं के सामाजिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया। एक ऐसे राज्य में, जहाँ लंबे समय तक गहरे पैट्रियार्कल सामाजिक नियमों ने महिलाओं की आवाजाही और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी को सीमित रखा था, नीतीश कुमार की नीतियों ने शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और एजेंसी के लिए नई संभावनाएँ खोलने का प्रयास किया।

स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल स्कीम

सबसे शुरुआती और प्रभावशाली पहलों में से एक स्कूली लड़कियों के लिए शुरू की गई साइकिल योजना थी, जिसके तहत उन्हें माध्यमिक विद्यालय तक जाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी। जो पहल शुरुआत में एक साधारण कल्याणकारी हस्तक्षेप जैसी लगती थी, उसके दूरगामी सामाजिक प्रभाव सामने आए। हज़ारों किशोरियों को साइकिल से स्कूल जाते देखना बिहार में बदलते जेंडर मानकों का एक सशक्त प्रतीक बन गया। इससे लड़कियों के स्कूलों में नामांकन और उनकी निरंतर उपस्थिति दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के नेटवर्क से जोड़ा

इसके साथ ही, जीविका ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम ने पूरे राज्य में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups) के नेटवर्क का विस्तार किया। इस पहल के माध्यम से महिलाओं को माइक्रोफाइनेंस, प्रशिक्षण और सामूहिक उद्यमों से जोड़ा गया। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, बल्कि उनकी आर्थिक भागीदारी के लिए नए अवसर भी खुले। समय के साथ यह पहल दक्षिण एशिया के सबसे बड़े महिला-केंद्रित आजीविका कार्यक्रमों में से एक के रूप में उभरी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया।

इन सामाजिक पहलों के बाद राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। नीतीश कुमार की सरकार ने पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाया, जिससे हजारों महिलाओं को जमीनी स्तर की राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अवसर मिला। कई गांवों में महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित किया और विकास से जुड़ी चर्चाओं में नई प्राथमिकताएँ सामने आईं।

इसके अलावा, सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसी नीतियों ने भी महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति को बढ़ाया। इसके परिणामस्वरूप पुलिस स्टेशनों, सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों तथा अन्य भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी।

बिहार में शराबबंदी

महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा पर रोक लगाने के लिए नीतीश कुमार ने प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू किया। यह उनके कार्यकाल का सबसे अधिक विवादित फैसला के रूप में देखा जा रहा है। कई अर्थशास्त्री और प्रशासनिक विशेषज्ञ इसके वित्तीय लागत और लागू करने की चुनौतियों पर अक्सर सवाल उठाते रहे, लेकिन कई महिलाओं ने इसे घरेलू भलाई में सुधार और शराब के सेवन से जुड़े घरेलू हिंसा तथा पारिवारिक संकट को कम करने के उपाय के रूप में देखा।

राजनीतिक दृष्टि से, इस कदम ने महिला मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार के समर्थन को मजबूत किया, जो बिहार में एक निर्णायक चुनावी समूह के रूप में उभरे हैं। इसके अलावा, उनकी व्यापक राजनीतिक रणनीति ने पिछड़े वर्गों, महादलितों और मुस्लिम मतदाताओं के कुछ हिस्सों को एकजुट किया, जातिगत ध्रुवीकरण को कम किया और शासन तथा विकास को राजनीति के केंद्र में रखते हुए सामाजिक गठबंधनों को नया स्वरूप दिया।