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नीतीश कुमार शुरू से थे चुनावी राजनीति के खिलाफ, पत्नी ने समझाया तो माने

नीतीश कुमार 50 साल में बस एक विधान सभा चुनाव जीते हैं। वह पत्नी के समझाने पर चुनावी राजनीति में आए थे।

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पटना

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Vijay Kumar Jha

Mar 06, 2026

NITISH KUMAR

फोटो में नीतीश कुमार। सर्कल में उनकी पत्नी मंजू (सोर्स: ANI और विकिपीडिया)

नीतीश कुमार ने 75 पार होने के बाद अपने राजनीतिक सफर को नया मोड़ दे दिया है। अब वह राज्य सभा के जरिए राजनीति करेंगे। करीब 20 साल बिहार के सीएम रहने वाले नीतीश इस बीच एक बार भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़े। वह केवल तीन बार (1977, 1980 और 1985) ही विधानसभा चुनाव लड़े हैं। जीते बस एक बार (1985)। इसके बाद वह दिल्ली कूच कर गए, जहां उनका प्रदर्शन अच्छा रहा।

नीतीश 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव लड़े। 1989 से लगातार चार बार बाढ़ से सांसद रहे। 2004 में बाढ़ से हार गए, लेकिन नालंदा से जीत गए। उसके बाद वह कभी सीधे चुनावी अखाड़े में नहीं उतरे।

नीतीश शुरू से चुनावी राजनीति में उतरने के खिलाफ थे

नीतीश कुमार कॉलेज के जमाने से ही राजनीति में आ गए थे। इंजीनियरिंग के छात्रों की बेरोजगारी के खिलाफ बड़ा आंदोलन भी कर चुके थे। और, 1974 में बतौर छात्र संघ नेता आंदोलन में काफी सक्रिय रहे थे। कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने राजनीति में ही आगे बढ्ने का फैसला किया, लेकिन वह चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं थे। उनके दोस्त अरुण सिन्हा ने अपनी किताब ‘नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार’ में लिखा है कि पत्नी के समझाने पर वह चुनावी राजनीति में उतरने के लिए तैयार हुए थे।

ससुराल वाले नहीं चाहते थे कि राजनीति करें

नीतीश की शादी छात्र जीवन में ही तय हो गई थी। पिता ने लड़की (मंजू) के हेडमास्टर पिता से 22000 रुपये नकद दहेज लेना तय किया था। शादी हिन्दू विधि-विधान से होना था। पिता ने यह फैसला तब लिया था, जब वह खुद आर्य समाजी सिद्धान्त को मानने वाले व्यक्ति थे।

अरुण सिन्हा लिखते हैं कि पिता के इन दोनों फैसलों से नीतीश सहमत नहीं थे। उन्होंने मन ही मन इसका विरोध करने का फैसला कर लिया था। उन्होंने ऐलान कर दिया कि वह शादी में माला की अदला-बदली के अलावा कुछ नहीं करेंगे। किसी कर्मकांड, वैदिक विधि-विधान का पालन नहीं करेंगे और न ही कोई तड़क-भड़क रखेंगे। साथ ही, यह भी साफ कर दिया कि शादी पटना के किसी पब्लिक हॉल में होगी। उनकी जिद के आगे अंततः दोनों के पिताओं को झुकना पड़ा।


शादी के लिए पटना के गांधी मैदान के पास लाला लाजपत राय मेमोरियल हॉल को चुना गया। बड़ी संख्या में समाजवादी कार्यकर्ता और नेता शादी में शरीक होने पहुंचे थे। वहां कोई गाना-बजाना नहीं, बल्कि नेताओं के भाषण हो रहे थे। वे भाषणों में दहेज की कुरीति और कर्मकांड के खिलाफ बातें कह रहे थे और नीतीश की शादी की तारीफ कर रहे थे।
नीतीश की सादी शादी पर समाजवादी पत्रकार जुगनू शारदेय ने उनका इंटरव्यू भी किया था। यह इंटरव्यू जानी-मानी पत्रिका 'धर्मयुग' में छपा था।

पत्नी को नहीं थी नीतीश की राजनीति से आपत्ति

शादी के बाद, कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने पर नीतीश ने नौकरी के बजाय राजनीति में जाने का फैसला किया। उनके इस फैसले से ससुराल वाले खुश नहीं थे। वे लगातार उन्हें नौकरी करने की सलाह देते और कहते थे कि राजनीति करनी ही है तो नौकरी करते हुए कर लीजिएगा। नीतीश हंस कर उनकी सलाह टाल दिया करते थे।

नीतीश के फैसले पर पत्नी मंजू ने कभी शिकायत नहीं की, बल्कि उनका पूरा साथ दिया। एक वक्त नीतीश कुमार के दिमाग में चुनाव नहीं लड़ने की बात घर कर गई थी। तब पत्नी मंजू ने ही समझाया था कि फिर राजनीति में रहने का क्या फायदा ? यह सवाल उनके दिमाग में गहरा असर कर गया। इसने उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा ही बदल दी। आगे चल कर जब नीतीश हरनौत से चुनाव लड़े तो मंजू ने जम कर उनका प्रचार किया था।

कागजी प्रक्रिया की वजह से गंवाया सांसद बनने का मौका

इमरजेंसी के बाद, 1977 में जब इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का ऐलान किया और जनता पार्टी बनी तो बक़ौल अरुण सिन्हा, नीतीश का नाम संभावित उम्मीदवारों की लिस्ट में था। उनके साथ लालू प्रसाद यादव और कई अन्य छात्र नेताओं को भी टिकट दिया जाना तय था। लालू को तो टिकट मिल गया, लेकिन नीतीश चूक गए। इसकी वजह कागजी प्रक्रिया की देरी रही।

नीतीश को आपात काल के दिनों में बक्सर और भागलपुर के जेलों में रखा गया था। अंतिम समय में उन्हें भागलपुर सेंट्रल जेल भेजा गया था। वहां से उनकी रिहाई में देर हो गई। काफी कोशिश के बाद भी समय रहते भागलपुर जेल से रिहाई के कागजात पेश नहीं किए जा सके। इस बीच जनता पार्टी ने नौवीं लोक सभा के लिए उम्मीदवार तय कर लिए और नीतीश टिकट पाने से वंचित रह गए।

पहले चुनाव में कुर्मी ने ही हराया

लोक सभा चुनाव में मौका गंवा चुके नीतीश को विधानसभा चुनाव में मौका मिला। वह हरनौत से अपना पहला चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन, इस चुनाव में वह हार गए।

हरनौत में नीतीश का मुक़ाबला उनकी ही जाति (कुर्मी) के कांग्रेस उम्मीदवार भोला प्रसाद सिंह से था। भोला ने अपना चुनाव कार्यालय नीतीश के घर के सामने ही बना रखा था। उनका प्रचार भी जोरदार चल रहा था। उनके प्रचार जुलूस में बड़ी संख्या में मोटर साइकिलें चला करती थीं। इसकी तुलना में नीतीश का प्रचार एकदम हल्का था। वह स्कूल के दिनों के दोस्त मुन्ना सरकार की मोटर साइकल पर बैठ कर गांव-गांव घूमा करते थे।

नीतीश की पत्नी मंजु ने भी इस चुनाव में खूब प्रचार किया था। उनका गांव हरनौत विधान सभा में ही पड़ता था। मंजू और उनके परिवार के ज़्यादातर लोगों ने जहां नीतीश के लिए प्रचार किया, वहीं उनके दो चाचा भोला प्रसाद के खेमे में चले गए थे। स्थानीय कुर्मी नेताओं ने भोला को समर्थन दे दिया।

भोला ने 5900 मतों (8.5 फीसदी) के अंतर से नीतीश को मात दे दी थी। इस अंतर का मुख्य कारण कुर्मी वोट का भोला की तरफ झुकाव था।

हार के बाद राजनीति छोड़ने पर विचार

लगातार दो-दो हार के बाद एक बार फिर सवाल उठा कि क्या नीतीश को नौकरी कर लेनी चाहिए? घर-परिवार के ज़्यादातर लोग इसके पक्ष में थे। पत्नी मंजू को भी कभी-कभी यही सही लगने लगता था। लेकिन, उन्होंने अपनी ओर से कुछ नहीं थोपने का निर्णय लिया।

नीतीश ने तय किया कि वह हार नहीं मानेंगे। उन्होंने भोला के पक्ष में गए कुर्मी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कर दी। इस कोशिश में वह कामयाब भी होते गए, लेकिन तब तक जनता पार्टी की लोकप्रियता ही घटने लगी थी।

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हालांकि, नीतीश ने हार नहीं मानी और आगे चल कर ऐसा हुआ कि वह करीब 20 साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे, चाहे उनकी पार्टी की सीटें कितनी भी आई हो।

बतौर सीएम नीतीश का कार्यकाल

कितनी बार सीएम बने नीतीश कब लीशपथकितने दिन रहे (लगभग)गठबंधन/मुख्य सहयोगी
13 मार्च 20007 दिन (बहुमत न होने के कारण इस्तीफा)NDA (समता पार्टी + BJP)
224 नवंबर 20054 साल, 181 दिनNDA (JD-U + BJP)
326 नवंबर 20103 साल, 175 दिन (जीतराम मांझी को कमान सौंपी)NDA (JD-U + BJP)
422 फरवरी 2015271 दिनJD-U (स्वतंत्र/बाहरी समर्थन)
520 नवंबर 20151 साल, 248 दिनमहागठबंधन (RJD + Congress)
627 जुलाई 20173 साल, 112 दिनNDA (JD-U + BJP)
716 नवंबर 20201 साल, 266 दिनNDA (JD-U + BJP)
810 अगस्त 20221 साल, 171 दिनमहागठबंधन (RJD + Congress)
9+1028 जनवरी 2024 और फिर 20 नवंबर, 2025 2 साल, 36 दिन (5 मार्च 2026 तक)NDA (JD-U + BJP)

चुनाव दर चुनाव जेडीयू को मिलीं सीटें

चुनाव वर्षJD(U) की सीटेंBJP की सीटेंRJD की सीटेंस्थिति (Status)
2005 (अक्टूबर)885554नीतीश CM बने (NDA गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते)
20101159122नीतीश CM बने (JD-U की अब तक की सबसे बड़ी जीत)
2015715380नीतीश CM बने (RJD बड़ी पार्टी थी, फिर भी नीतीश चेहरा थे)
2020437475नीतीश CM बने (तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद)
2025858925नीतीश CM बने (BJP से कम सीटें आने के बावजूद)