
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा। (Photo-IANS)
उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद का प्रत्याशी नहीं बनाए जाने को लेकर एक नया सियासी सवाल खड़ा हो गया है। 18 जून को होने वाले विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए के नौ उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है, लेकिन इनमें दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं है।
उनका नाम सूची में न होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कुछ लोगों का मानना है कि एनडीए के इस फैसले से गठबंधन में अंदरूनी खटपट की शुरुआत हो सकती है। हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा ने फिलहाल एनडीए के खिलाफ किसी तरह की नाराजगी जाहिर नहीं की है, लेकिन उनके राजनीतिक फैसलों और बदलते रुख को देखते हुए इस मामले पर आगे की स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है।
नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी की जोड़ी को बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) समीकरण का सूत्रधार माना जाता है। बाद में इस राजनीतिक समीकरण को आगे बढ़ाने में उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका महत्वपूर्ण रही। कहा जाता है कि उपेंद्र कुशवाहा पहले अपने नाम के साथ “कुशवाहा” सरनेम का प्रयोग नहीं करते थे, और नीतीश कुमार के सुझाव के बाद उन्होंने अपना नाम उपेंद्र प्रसाद सिंह से बदलकर उपेंद्र कुशवाहा कर लिया। इसके बाद से उन्होंने कुशवाहा (कोइरी) समाज की राजनीति को लगातार मजबूती से आगे बढ़ाया।
नीतीश कुमार से मतभेद के बावजूद उन्होंने इस सामाजिक पहचान को नहीं छोड़ा, जिससे अपने समाज में उनकी मजबूत पकड़ बनी रही। यही कारण है कि वे एनडीए और महागठबंधन दोनों ही जगहों पर प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे। हालांकि, अब सम्राट चौधरी के उभार के बाद एनडीए के भीतर उनके राजनीतिक प्रभाव में कुछ कमी देखने की चर्चा की जा रही है।
सम्राट चौधरी के उभार के बाद उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है। सम्राट चौधरी के पहले डिप्टी सीएम और फिर मुख्यमंत्री बनने के बाद कोइरी समेत पिछड़ी जातियों के बीच उनका प्रभाव और राजनीतिक वजन बढ़ा है।
सीनियर पत्रकार लव कुमार के अनुसार, सम्राट चौधरी के बढ़ते प्रभाव के चलते बीजेपी को कोइरी वोट बैंक के लिए अब उपेंद्र कुशवाहा पर उतनी निर्भरता नहीं रही। इसी कारण उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद (एमएलसी) नहीं भेजे जाने की भी चर्चा है।
दरअसल, बीजेपी ने बिहार में नीतीश कुमार द्वारा तैयार गैर-यादव पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक की राजनीति में अब अपना मजबूत कोइरी चेहरा खड़ा कर लिया है, जो न केवल प्रभावशाली है बल्कि आक्रामक छवि भी रखता है। यही वजह है कि सम्राट चौधरी के पक्ष में उनकी जाति-समुदाय के लोगों का समर्थन भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
उपेंद्र कुशवाहा के साथ पहले किसी भी राजनीतिक उठापटक पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती थी। लेकिन अब उनके बेटे दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर चल रही चर्चाओं के बावजूद वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिख रही, जैसी पहले देखने को मिलती थी।
इसी बदलाव के चलते राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि भाजपा के भीतर उपेंद्र कुशवाहा का प्रभाव कम हुआ है, जबकि सम्राट चौधरी का कद लगातार बढ़ता जा रहा है।
Updated on:
09 Jun 2026 07:29 pm
Published on:
09 Jun 2026 07:22 pm
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