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बिहार 2018 : इन 5 के आसपास घूमती रही राजनीति

बिहार पर देश की निगाह रहती है और लेकिन बिहार की राजनीति को वर्ष 2018 में किस-किस ने ज्यादा प्रभावित किया, आइए देखते हैं...

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बिहार की राजनीति 2018

बिहार की राजनीति 2018

पटना। बिहार की राजनीति हमेशा से चर्चा का केन्द्र रही है। पिछले 14 वर्ष से नीतीश कुमार ही बिहार की राजनीति के केन्द्र में रहे हैं। वे राजनीति के मामले में अन्य सभी बिहारी नेताओं पर भारी पड़ रहे हैं। आइए, उन पांच लोगों या जोडिय़ों को देखें, जो वर्ष 2018 में लगातार चर्चा के केन्द्र में रही हैं।

ताकतवर मुख्यमंत्री : नीतीश कुमार
देश के कुशल राजनेताओं में नीतीश कुमार की गिनती होती है। बिहार जैसे प्रांत में वे विरोध के बावजूद पूरी मजबूती से मुख्यमंत्री बने हुए हैं। वे भाजपा को भी तनाव में रखते हैं और अपने हिसाब से फैसले लेते हैं। गठबंधन में उन्होंने भाजपा को दो नंबर की पार्टी बना लिया है। साल के जाते-जाते भाजपा-जद-यू का 17-17 सीटों पर लडऩा नीतीश की बड़ी कामयाबी है।

लालू के लाल : तेजस्वी-तेजप्रताप
लालू के लाल तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव सत्ता में नहीं हैं, लेकिन वर्ष 2018 में वे लगातार चर्चा में बने रहे हैं। तेजस्वी अपनी सधी हुई टिप्पणियों और सरकार पर तीखे हमले के कारण और तेजप्रताप अपनी शैली, यात्राओं व तलाक प्रकरण के कारण चर्चा का विषय बने हुए हैं।

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भाजपा के बागी : शत्रु और आजाद
पूर्व क्रिकेटर सांसद कीर्ति आजाद वर्ष 2015 से ही भाजपा से निलंबित हैं, भाजपा के खिलाफ तीखे बयान देते रहे हैं, लेकिन भाजपा से अभी गए नहीं हैं। दूसरी ओर, अभिनेता व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा लगातार भाजपा और नरेन्द्र मोदी सरकार की कमियों पर निशाना साधते रहे हैं, भाजपा के विरोधियों की तारीफ करते रहे हैं, लेकिन इन नेताओं के अगले कदम का वर्ष भर इंतजार रहा।

राजग के विरोधी : उपेन्द्र कुशवाहा
रालोसपा के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा राजग में ज्यादा सम्मान खोजते रहे। केन्द्र में मंत्री पद से संतोष नहीं था। पार्टी को आगे बढ़ाना चाहते थे, जबकि पार्टी के नेता इनके विरोध में चल रहे थे। अंतत: मंत्री पद छोड़ा, राजग गठबंधन से अलग हो गए और अब महागठबंधन के साथ हैं, संकल्प ले रखा है कि भाजपा-जद-यू को हराना है।

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चुनावी इंजीनियर : प्रशांत किशोर
पीके नाम से मशहूर हो रहे प्रशांत किशोर खुद को इलेक्शन-इंजीनियर बोलते हैं। नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ज्यादा भाव नहीं दिया, तो कांग्रेस और जद-यू के साथ आ गए प्रशांत किशोर। वर्ष 2018 में विधिवत जद-यू के उपाध्यक्ष नियुक्त हो गए। पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में पहली बार जद-यू को अध्यक्ष का पद दिलवाकर अपनी रणनीति का डंका बजवा दिया।

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