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बिहार में सम्राट सरकार की कठिन परीक्षा, क्या बीजेपी साध पाएगी नीतीश का जातीय गणित?

बिहार में जातिगत समीकरणों से आगे बढ़कर अपनी पकड़ मजबूत करना और वैचारिक आधार पर समर्थन जुटाना चाहती है। हालांकि, यह राह आसान नहीं है, क्योंकि उसे सबसे पहले खुद को राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना होगा।

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सम्राट चौधरी (फोटो- X@ @samrat4bjp)

बीजेपी को बिहार में आखिरकार मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई है। इस सफलता पर पार्टी ने ज़रूर राहत की साँस ली होगी, लेकिन उसके सामने अब भी दो बड़ी चिंताएँ बनी हुई हैं। पहली, वह गठबंधन में केवल एक ‘बड़ा साझीदार’ बनकर रह गई है; उसके पास जेडीयू से महज़ चार सीटें ज़्यादा हैं, जो बहुमत के आँकड़े से काफ़ी कम हैं। दूसरी, सम्राट चौधरी ‘संघ परिवार’ की पृष्ठभूमि से नहीं आते; उनका राजनीतिक सफ़र कई अलग-अलग विचारधाराओं से होकर गुज़रा है।

इसके बावजूद, यह क्षण एक लंबे दौर के अंत का प्रतीक है। अक्टूबर 1990 में जब लालू प्रसाद यादव ने ‘रथ यात्रा’ को रोकने के लिए लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी का आदेश दिया था, तभी से बीजेपी राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए लगातार प्रयासरत रही। अब जाकर पार्टी को वह सफलता मिली है।

स्वीकार्यता की चुनौती

सीनियर पत्रकार अरूण कुमार पांडेय कहते हैं कि सम्राट चौधरी के कंधों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि उन्हें अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी। नीतीश कुमार का लंबा कार्यकाल उनके ऊपर भारी पड़ता दिख रहा है और उनके हर कदम पर पैनी नज़र रहेगी। जैसे-जैसे वह शासन-प्रशासन के कामकाज में ढलेंगे, उन्हें जेडीयू के साथ बेहद संतुलित और सावधानीपूर्ण रवैया अपनाना होगा खासकर तब, जब नीतीश कुमार अभी भी सक्रिय राजनीति में मौजूद हैं।

नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तीन अहम तरीके अपनाए थे। पहला, उन्होंने ‘महादलित’ और ‘अति पिछड़ा’ जैसी नई श्रेणियाँ बनाईं, जिससे एससी और ओबीसी के उन बड़े वर्गों को अलग पहचान मिली, जिनकी राजनीतिक पकड़ मंडल युग के बाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही थी। दूसरा, उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं में सुधार करते हुए इन वर्गों को आरक्षण दिया, जिससे लंबे समय से हाशिए पर रहे समुदायों के लिए नए राजनीतिक अवसर खुले और उनकी पार्टी के लिए एक मजबूत कैडर आधार तैयार हुआ।

तीसरा, और शायद सबसे अहम, उन्होंने महिलाओं पर केंद्रित नीतियों को प्राथमिकता दी। स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों को साइकिल और ड्रेस देने जैसी योजनाओं से शुरुआत हुई, जो दिखने में भले साधारण लगीं, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव कहीं ज़्यादा गहरा था। अब सम्राट चौधरी के सामने चुनौती होगी कि वह इन नीतियों की निरंतरता बनाए रखें और इनके आधार पर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता को मजबूत करें।

सामाजिक समीकरण, कानून-व्यवस्था संतुलन की चुनौती

इसके साथ ही उन्हें कोइरी (कुशवाहा) समुदाय के बीच अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश करनी होगी। सीनियर पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं कि यादवों और कुर्मी के बाद यह एक अहम पिछड़ा वर्ग है, जिससे वे खुद भी आते हैं। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कानून-व्यवस्था को लेकर एनडीए का ज़ोर, विपक्ष के कथित ‘जंगल राज’ के नैरेटिव के मुकाबले कहीं कमजोर न पड़े।

यदि वे नीतीश कुमार की नीतियों खासकर शराबबंदी की समीक्षा करते हैं, तो उन्हें बेहद सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि इस नीति को महिलाओं के बीच लगातार समर्थन मिलता रहा है। हालांकि, ‘डबल-इंजन’ सरकार का एक फायदा उन्हें मिलता रहेगा केंद्र के संसाधनों तक सीधी और मजबूत पहुंच।