
मुरेठा में सम्राट चौधरी। (फोटो- IANS)
सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा बिल्कुल भी सीधी-सादी नहीं रही है। बिहार कैबिनेट में पहली बार शामिल होने के बाद गवर्नर ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाते हुए उन्हें पद से हटा दिया था। अब वही नेता भाजपा से मुख्यमंत्री बन गए हैं। यह उनके करियर का एक पूरा चक्र माना जा रहा है। 57 वर्षीय सम्राट चौधरी नौ साल पहले भाजपा में शामिल हुए थे। पार्टी के भीतर उनकी तरक्की काफी तेज़ रही और वे अंततः राज्य में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गए। राकेश कुमार के नाम से जन्मे चौधरी पहली बार 1999 में सुर्खियों में आए थे, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में शामिल किया था।
समता पार्टी छोड़कर उनके पिता शकुनी चौधरी के राजद में शामिल होने के बाद राबड़ी सरकार में सम्राट चौधरी को पहली बार मंत्री बनाया गया था। हालांकि, उनका यह कार्यकाल बहुत छोटा रहा। जल्द ही राजभवन में एक शिकायत पहुंची, जिसमें आरोप लगाया गया कि उस समय सम्राट चौधरी, जो विधानसभा के सदस्य नहीं थे, ने संविधान के अनुसार निर्धारित न्यूनतम 25 वर्ष की आयु भी पूरी नहीं की थी। इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन राज्यपाल सूरज भान ने उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया। यह एक दुर्लभ मामला था, जिसमें किसी मंत्री को निर्वाचित सरकार की सिफारिश के बिना ही पद से हटाया गया था।
साल 2000 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली RJD ने उन्हें उम्मीदवार बनाया। चौधरी चुनाव जीत गए और उन्हें फिर से कैबिनेट में शामिल कर लिया गया। इस बार उन्होंने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया। साल 2005 में जब RJD सत्ता से बाहर हो गई और JD(U)-BJP गठबंधन सत्ता में आया, तब भी चौधरी पार्टी के साथ बने रहे। इसके बाद पाँच साल बाद उन्हें पार्टी का मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त किया गया। वर्ष 2014 में उन्होंने RJD में विभाजन की स्थिति के बीच जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाली JD(U) सरकार का साथ दिया और उसमें शामिल हो गए। हालांकि, उनका यह कार्यकाल भी बहुत छोटा रहा। कुछ महीनों बाद जब नीतीश कुमार सत्ता में लौटे और उन्होंने मांझी की जगह ली, तो चौधरी को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा।
साल 2017 में वे भाजपा में शामिल हो गए। कोइरी OBC समुदाय के एक प्रमुख नेता के रूप में, जिन्हें पार्टी ने अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने के लिए सक्रिय रूप से जोड़ा, उन्होंने तेजी से संगठन में अपनी जगह बनाई और एक साल के भीतर ही पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बन गए।
अपनी प्रभावशाली मौजूदगी के लिए जाने जाने वाले सम्राट चौधरी, जिनकी लंबाई छह फीट से अधिक है, लंबे समय तक सार्वजनिक स्थानों पर अक्सर पगड़ी पहने नजर आते थे। निजी बातचीत में वे मज़ाकिया अंदाज़ में कहते थे कि वे अपनी पगड़ी तभी उतारेंगे जब वे JD(U) के मुखिया नीतीश कुमार को सत्ता से हटा देंगे। वर्ष 2024 में, जब नीतीश कुमार एक बार फिर NDA में शामिल हो गए, तब चौधरी, जो तब तक कई वरिष्ठ नेताओं को पीछे छोड़ते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके थे, को पार्टी ने राज्य में उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया।
उनके साथ विजय कुमार सिन्हा, जो नीतीश कुमार के एक और मुखर आलोचक माने जाते हैं, को भी पदोन्नति मिली। पार्टी ने इन दोनों नियुक्तियों की अलग-अलग तरह से व्याख्या की—कुछ लोगों ने इसे गठबंधन में संतुलन साधने की कोशिश माना, जबकि कुछ ने इसे भाजपा की राजनीतिक ताकत दिखाने की रणनीति बताया। चौधरी ने इस भूमिका में खुद को तेजी से ढाल लिया और दो साल से भी कम समय में वे नीतीश कुमार के एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में उभरे। इसके बाद उन्हें गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे वे 2005 से संभाल रहे थे।
इसके अलावा, विधानसभा चुनावों के दौरान उनकी लोकप्रियता और भी बढ़ गई। तारापुर, जो एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है जिसका प्रतिनिधित्व उनके पिता ने छह बार किया था, में चुनाव प्रचार करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मतदाताओं से उनका समर्थन करने की अपील की और उन्हें “एक बड़ा नेता” बनाने का वादा किया। विधान परिषद में लगभग एक दशक बिताने के बाद, सीधे चुनावी राजनीति में वापसी करने वाले चौधरी ने तारापुर सीट 45,000 वोटों के भारी अंतर से जीत ली।
बिहार के मुंगेर ज़िले के एक गाँव में जन्मे सम्राट चौधरी, पार्वती देवी और शकुनी चौधरी के पुत्र हैं। उनके पिता सेना में रहे और बाद में राजनीति में आए। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी, जिसके बाद वे लालू प्रसाद यादव और फिर नीतीश कुमार के साथ जुड़े।
मुख्यमंत्री के तौर पर चौधरी के सामने अब कई जटिल चुनौतियाँ हैं। उन्हें NDA के भीतर संतुलन बनाए रखते हुए बिहार में भाजपा के जनाधार का विस्तार करना होगा। इसमें JD(U) के साथ संबंधों को संभालना भी शामिल है, जो अब “मुख्यमंत्री की पार्टी” न रह जाने के कारण खुद को कमजोर महसूस कर सकती है। साथ ही, उन्हें उन छोटे सहयोगी दलों को भी साधना होगा जो अक्सर अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए जाने जाते हैं।
इसके अलावा, उन्हें प्रशांत किशोर जैसे विपक्षी नेताओं की आलोचना का भी सामना करना पड़ेगा, जिन्होंने चुनावी हलफनामों में चौधरी की उम्र में कथित विसंगतियों से लेकर उनके खिलाफ दर्ज रहे पिछले आपराधिक मामलों तक कई मुद्दे उठाए हैं।
Updated on:
15 Apr 2026, 8:53 AM IST
Published on:
14 Apr 2026, 11:47 PM IST
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