
Nitish kumar And Bjp दो सालों में मजबूत कम मजबूर ज्यादा हुए नीतीश मगर बने सियासी धूरि
प्रियरंजन भारती/पटना. कभी भाजपा की राह में मुश्किलें खड़ी कर उसे बिहार में पीछे धकेल देने का उदाहरण पेश करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार( Nitish Kumar) ने भाजपा के साथ दोबारा सरकार बनाने के दो साल पूरे कर लिए। इस दौरान वह सहयोगी दल को नंबर दो बनाकर रखने और अपनी करने में सफल तो हुए पर उसके आगे विवश भी दिखाई देने लगे हैं। हालांकि सरकार ने केंद्र सरकार के उदार रवैये का लाभ उठाकर कई योजनाओं को शुरु करवाने में सफलता हासिल की है।
नीतीश कुमार ने महागठबंधन (Major alliance) का दामन छोड़कर एनडीए की सरकार बनाई तो यह कहा कि आरजेडी (RJD) के साथ रहकर मजबूर हो गए थे। भाजपा (BJP) के साथ मिलकर सरकार बनने के साथ ही वह फिर से दबाव मुक्त होकर एकल आधिपत्य वाली सरकार के कर्ताधर्ता बन गए। उन्होंने अपनी मर्जी के फैसलों पर भाजपा को नतमस्तक तो किया लेकिन वह सियासी तौर पर मज़बूर होते दिखने लगे हैं। मजबूरी यह कि वह भविष्य में सत्ताशीर्ष पर कायम रहने को लेकर भाजपा से पीछा छुड़ाने और नई राह निरूपित करने की कोशिशों से बाज नहीं आते।
हाल में प्रशांत किशोर के ममता बनर्जी का चुनावी प्रबंधन स्वीकार करने को लेकर बवाल मचा पर नीतीश इसे लेकर किसी खास निर्णय से बचते रहे। अभी तेजस्वी यादव की चुप्पी और अज्ञातवास को लेकर सियासत गरमाई तो यह भी कहा जाने लगा कि भाजपा नीतीश से अगले विधानसभा चुनाव में अलग होकर कांग्रेस के साथ नया गठबंधन बना सकते है। लगे हाथों सुशील मोदी को सार्वजनिक सफाई देनी पड़ गई कि अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश ही हमारे नेता होंगे।
इधर भाजपा के साथ रहकर भी जदयू अध्यक्ष अपने एजेंडे को अलग दिखाते रहते हैं और मौके पर उसका विरोध करने से नहीं चूकते। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने से लेकर तीन तलाक विधेयक का विरोध कर नीतीश कुमार ने यही किया।
हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने केंद्र के सहयोग से कई महत्वपूर्ण योजनाओं को शुरु करवाने में बड़ी सफलता हासिल की है। पटना मेट्रो प्रोजेक्ट और भागलपुर में विक्रमशिला पुल के समानांतर नए पुल के निर्माण की शुरुआत एक बानगी भर है। सरकार में रहते हुए मुख्यमंत्री के नाते वह भाजपा पर जोर जमाए रहने में भी कामयाब हैं। भाजपाई मंत्रियों को भी अपने विभाग की रिपोर्ट से लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग के निर्णय के लिए उन्हीं पर टिका रहना पड़ता है। कोई भी स्वतंत्र फैसला दूसरा मंत्री नहीं ले सकता।
भाजपा के आगे मजबूर भी (Forced the BJP too)
नीतीश कुमार गठबंधन में रहते हुए अनेक बार भाजपा विरोधी जैसा व्यवहार करते दिख जाते हैं। यह उनकी छटपटाहट और मजबूरी का संकेत है। लोकसभा चुनाव में अपने एजेंडे पर कायम रहने वाला बयान देकर उन्होंने अपनी छटपटाहट का ही परिचय दिया। भाजपा को नसीहत देने से भी नीतीश पीछे नहीं रहते और अब तो अकेले चुनाव लड़ने की धमकी भी पार्टी नेताओं से भाजपा को दिलवाने का वार करने लगे है। सियासत में सबकुछ वही नहीं होता जो सामने दिखता है।जानकर बताते हैं कि राजनीति में जो पर्दे के पीछे होता है उसे ही अधिक चमकदार दिखाया जाता है। इस लिहाज से जदयू अध्यक्ष की भभकियां उनकी मजबूरियों को छिपाने का प्रयास है।नीतीश कुमार भाजपा के साथ जाकर लाचार भी खूब हुए हैं। सृजन घोटाले और बालिका गृह मामले में सीबीआई के आरोप पत्र दायर कर देने के बाद इनकी मजबूरियां और बढ़ गई हैं। इन मामलों में जदयू की भी कमजोरी उजागर हो चुकी है। माना जा रहा है इन कमजोर कड़ियों के चलते नीतीश के हाथ बंध गए हैं और आगे वह भाजपा के आगे मजबूर हो गए हैं। भाजपा के आगे नीतीश की विवशताओं की झलक कई मर्तबा सार्वजनिक मंचों पर देखी भी जा चुकी है।
सरकार में नहीं है एकरूपता और भ्रष्टाचार का बोलबाला (Corruption)
भाजपा बेशक बिहार में नीतीश सरकार का हिस्सा बनी लेकिन सहयोगी दलों में एकरूपता नहीं है। भाजपा के मंत्री और नेता सुशील मोदी के नीतीश कुमार का पिछलग्गू और पीए टाइप बने रहने से खफा रहते हैं। भ्रष्टाचार के मामले में भाजपाई मंत्री कहीं अधिक आगे हैं। कोई भी काम भाजपाई मंत्री बिना चढ़ावे से प्रसन्न हुए नहीं करते हैं। अलबत्ता जदयू के कुछ मंत्री ईमानदार मंत्रियों की फेहरिस्त में शामिल हैं। भाजपा अपने भ्रष्टाचार मुक्त चेहरे को कम से कम बिहार में तो स्थापित नहीं ही कर पाई।
नीतीश सत्ता की ज़रूरत भी बने
सियासत के चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार बिहार की सत्ता (Nitish Kumar Bihar's power) में लंबे समय तक बने रहकर सत्ता राजनीति की ज़रूरत और धूरि भी बन गए हैं। लालू परिवार का साथ छोड़ने के बाद भी अनेकों बार ऐसा दिखा कि जदयू आरजेडी के प्रति आक्रामक नहीं है। इससे भविष्य को लेकर आकलन भी लगाए जाने लगे। अब भाजपा की दोस्ती के बीच जब यह चर्चा तेज होती है कि अगले साल विधानसभा चुनाव से पूर्व वह अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार उतारेगी तो नीतीश कुमार एक ऐसी ज़रूरत के रूप में नज़र आने लगते हैं जो सत्ता सियासत की धूरि यानि ज़रूरत बन गए हों।
दो साल सरकार के पूरे होने के साथ बिहार अब विधानसभा के चुनावी वर्ष में प्रवेश कर गया है। इस दौरान कोई भी उलटफेर और चौंकाने वाला फैसला बिहार के भावी दौर को सिरे से प्रभावित करने वाला सिद्ध होगा।
Published on:
27 Jul 2019 06:38 pm
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