
nitish and upendra file photo
(प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट)
पटना। सीएम नीतीश कुमार इन दिनों रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा की 'लव कुश प्लस' सोशल इंजीनियरिंग से खासे परेशान हैं। यह वोट पैटर्न खुद नीतीश का है और अब इस पर कुशवाहा की बढ़ती पकड़ उन्हें बेचैन कर रही है। जब नीतीश कुमार भाजपा का 17 साल का साथ नरेंद्र मोदी के नाम पर एक ही झटके में छोड़कर चले गए तब कुशवाहा एनडीए में आए। जब नीतीश पुनः एनडीए में आए तो कुशवाहा ने उनका विरोध शुरू कर दिया था। उनका यह विरोध अब भी जारी है। नीतीश और कुशवाहा में पुरानी अदावत इसलिए भी है कि दोनों एक ही वोट बैंक के सहारे आगे बढ़े हैं।
लवकुश और अब पंचफोरना
'लवकुश' साधने के साथ कुशवाहा अब पंचफोरना यानी अतिपिछड़ा ईबीसी वोट को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं। लव कुश वोट बैंक बिहार में कुर्मी और कोयरी जातियों के एकजुट आधार को कहा जाता है। यह कुल वोट बैंक का दस से बारह फीसदी है। नीतीश कुमार कुर्मी जाति जबकि कुशवाहा कोयरी समाज से आते हैं। नीतीश के एनडीए से बाहर जाने के बाद कुशवाहा भाजपा के साथ आए और वह भी इसी आधार वोट के सहारे नीतीश का साथ छोड़कर आगे बढ़े हैं।
सीट शेयरिंग के समय सोशल इंजीनियरिंग
एनडीए में जब सीट शेयरिंग की कवायद चल रही है तो कुशवाहा सोशल इंजीनियरिंग की खीर पका रहे हैं। उनका लक्ष्य अपने पाले में लवकुश वोट बैंक के साथ पंचफोरना कहे जाने वाले ईबीसी वोट बैंक को जोड़ना है। इस वोट बैंक का पांच से दस प्रतिशत हिस्सा चुनावों में जीत हार के लिए खासा मायने रखता है। इसमें अतिपिछड़ी कहार, कुम्हार, मल्लाह, माली और धुनिया जातियां शामिल हैं। इस वोट बैंक को साथ लाने की कुशवाहा की कोशिशों को नीतीश पसंद नहीं कर रहे हैं जबकि आरजेडी बढ़ चढ़कर उनका स्वागत कर रहा है। बिहार में पंद्रह फीसदी यादव वोट बैंक और सत्रह फीसदी मुस्लिम वोटों पर लालू यादव की जबर्दस्त पकड़ है। कुशवाहा यदि एनडीए से निकल आए तो महागठबंधन को इसका
बड़ा फायदा मिल सकता है।
नीतीश की कम नहीं परेशानियां
नीतीश कुमार को यह कतई रास नहीं आ रहा कि कुशवाहा उन्हीं के आधार वोट को हथियार बनाएं। उसमें ईबीसी वोट बैंक को साथ करने की कुशवाहा की कोशिशें भी नीतीश को परेशान कर रही हैं। नीतीश कुमार को यह भली भांति पता है कि नरेन्द्र मोदी के रहते ओबीसी वोटबैंक को अपने दल के पाले में ला पाना उनके लिए बेहद कठिन हो गया है। ऐसे में लवकुश के आधार वोट में कुशवाहा की सेंधमारी और ईबीसी वोट को जोड़ने की कवायद उन्हें और अधिक परेशान कर रही है। इसलिए नीतीश कुमार कुशवाहा की पार्टी को अधिक से अधिक परेशान कर बाहर का रास्ता दिखाने में लगे हैं। सीट शेयरिंग में रालोसपा चालीस में से मात्र दो सीट लेकर शांत और संतुष्ट रहने वाली नहीं है। लेकिन नीतीश ऐसा ही आजमाने पर तुले हैं।
लाभ में भाजपा
ऐसे में भाजपा नेतृत्व भी यह समझ रहा है कि कुशवाहा के अभियान से लाभ में तो भाजपा ही रहेगी। लिहाज़ा कुशवाहा भी यह बताने से नहीं हट रहे कि एनडीए के ही कुछ लोग नरेंद्र मोदी को दोबारा पीएम नहीं बनने देना चाहते। वह समय पर इसका खुलासा करने का भी ऐलान कर चुके हैं। आखिर कुशवाहा का इशारा किस ओर है, इसे नीतीश भी समझ रहे और भाजपा नेतृत्व भी।
Published on:
03 Sept 2018 03:18 pm
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