
शिवानंद तिवारी। फोटो सोशल साइट फेसबुक
Bihar Politics: समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने अपने पोस्ट में राजनीति के एक रोचक कहानी शेयर करते हुए लिखते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा को दो खंडों में देखा जा सकता है। पहला खंड वह है, जब वे सत्ता से बाहर थे। वे पहली बार 1985 में बिहार विधानसभा के सदस्य बने। इसके बाद उनकी राजनीति तेज़ी से आगे बढ़ी। 1989 में वे बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए।
1990 में वी.पी. सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्य मंत्री बने, हालांकि यह सरकार केवल लगभग 15 महीने ही चल सकी।1991 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में वे फिर से बाढ़ से सांसद निर्वाचित हुए। उसी दौर की एक चर्चित घटना का ज़िक्र संकर्षण ठाकुर की किताब में मिलता है, जो लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, दोनों के मिज़ाज और व्यक्तित्व को दर्शाती है।
इस बीच 1990 में लालू यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे। मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू किए जाने के समर्थन में उनके अभियान और आडवाणी जी की गिरफ़्तारी से उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी। हालाँकि उस अभियान में लालू यादव के साथ नीतीश कुमार सहित हम सब लोग सक्रिय थे।
1991 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भी सीवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। बिहार भवन में उन्हें एक कमरा मिला था। उन दिनों दिल्ली में मेरा ठिकाना नीतीश कुमार का ही घर हुआ करता था। जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग—नीतीश कुमार, ललन , वृष्णि पटेल और मैं पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर एक फिल्म देख रहे थे। फिल्म खत्म होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू प्रसाद यादव भी दिल्ली आ चुके हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में मौजूद हैं। इसके बाद नीतीश कुमार ने कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री से मिल लिया जाए। हालांकि, ललन किसी कारणवश वहां जाने के इच्छुक नहीं थे। नीतीश ने कहा कि 'अरे चलिए, ऐसा क्या है' लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो , क्या हर्ज है। (मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है) हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे। यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था।
हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुँचे। वहाँ देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू प्रसाद यादव बैठे हुए थे। सामने एक लंबी टेबल थी, जिस पर एक खुली फाइल रखी थी। फाइल में केवल एक पन्ना दिखाई दे रहा था और उनके हाथ में खुली हुई कलम थी। उनकी नज़र फाइल पर ही टिकी थी, उन्होंने हमारी ओर देखा भी नहीं। हम लोग अंदर गए और जिसे जहाँ जगह मिली, वहीं बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था, जिस पर नीतीश कुमार और पटेल साहब बैठ गए। सामने रखी एक गोदरेज टेबल से टेक लगाकर ललन सिंह खड़े हो गए, जबकि मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।
लालू प्रसाद यादव ने बिना कुछ बोले अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन सिंह की ओर देखा। उंगली के इशारे से उन्होंने उन्हें कमरे से बाहर जाने का रास्ता दिखाया। यह देखकर सब लोग हतप्रभ रह गए। ललन सिंह ने पहले इस इशारे को समझा नहीं, लेकिन जब लालू ने दोबारा इशारा किया, तो वे चुपचाप सिर झुकाकर बाहर निकल गए।
मैंने नीतीश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर देखा। ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा गंभीर हो गया। गौरतलब है कि ललन अपनी मर्जी से लालू के पास नहीं गए थे; एक तरह से उन्हें वहां पहुंचाने के लिए नीतीश कुमार का दबाव था।
इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली-गलौज शुरू कर दी। हम लोग यह नहीं जानते थे कि लालू सरयू राय को क्यों नाराज़ थे। बाद में पता चला कि सरयू राय ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि लालू सरकार ने बिहार के हित के विपरीत सोन नहर का पानी तत्कालीन केंद्रीय बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया। उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था और विपक्ष ने इस खबर पर जोरदार हंगामा किया था। सरयू राय, नीतीश कुमार के मित्र हैं। इसी पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद यादव अत्यंत आक्रोशित थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं और मैं जानता हूँ कि यह सब कौन करा रहा है। उनका इशारा सीधे नीतीश कुमार की ओर था।
यह सब सुनकर मेरा धैर्य जवाब दे गया। मैं खड़ा होकर बोला कि आपको यह गलतफहमी है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं। मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि वे मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे और वह दिन उन्होंने भुला दिया है। मैंने नीतीश कुमार से कहा, “उठो, इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है।” गुस्से से मेरी आवाज़ काँप रही थी। इस पर नीतीश कुमार और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए। लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे। मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई। लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई—“अरे कहाँ मर गया सब. जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ. दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे। नीतीश ठस से बैठ गए। चाय आई। अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहाँ से बाहर निकले।
बिहार भवन के बिल्कुल नज़दीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था। वातावरण गंभीर था। घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ़ को आदेश दिया कि किसी का फोन न लिया जाए और किसी से भी मिलना न हो। उसी दौरान पटना से सरयू राय को फोन किया गया। राय जी को बताया गया कि शाम तक दिल्ली पहुँचें। शाम तक राय जी दिल्ली में हाज़िर हो गए और पूरी घटना पर विस्तार से चर्चा हुई। तय किया गया कि बिहार भवन में हुई घटना के विरोध में लालू प्रसाद यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए। राय जी ने दो ढाई पेज का मसौदा तैयार किया। इसके बाद नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाव दिया कि इसे थोड़ा संक्षिप्त किया जाए। राय जी ने फिर चिट्ठी को छोटा करने में हाथ लगाया। इसी बीच, नीतीश कुमार ने कहा कि वे शरद जी से मिलने चले आते हैं।
मैंने कहा कि “अगर आप शरद जी से मिलने जाएंगे तो चिट्ठी नहीं जाएगी।” नीतीश कुमार ने झुंझलाकर जवाब दिया कि “शरद जी नेता हैं, उनसे मिलना क्यों नहीं चाहिए।” मैंने कहा, “ज़रूर मिलें, मैं तो केवल उस मुलाक़ात के नतीजे की बात कर रहा हूँ।” नीतीश जी शरद जी से मिलने गए। इस बीच, सरयू राय ने ढाई पेज का मसौदा डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया। नीतीश जी ने कहा कि इसे और छोटा कर दें, और यह पटना पहुँचने के बाद लालू प्रसाद यादव को भेजी जाएगी। अंततः समझा गया कि उस चिट्ठी का कोई विशेष औचित्य नहीं रहा।
Published on:
26 Mar 2026 11:35 am
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