
Pollution Death in India
Pollution Death in India : आईएमएफ की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ (Gita Gopinath, EX IMF chief economist) ने विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि भारत में प्रदूषण के कारण सालाना लगभग 17 लाख लोगों की मौत (1.7 million people died annually in India due to pollution) होती है, जो देश में होने वाली कुल मौतों का लगभग 18 प्रतिशत है। गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत पर प्रदूषण का आर्थिक प्रभाव देश पर लगाए गए टैरिफ के प्रभावों से कहीं अधिक गंभीर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ समन्वय में काम करने वाले द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज के अनुसार, पीएम 2.5 ने न केवल 2022 में भारत में 17 लाख लोगों की जान ली, बल्कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 9.5% के बराबर वित्तीय नुकसान भी पहुंचाया। वहीं 'स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025' रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से संबंधित 20 लाख मौतें हुईं।
दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर भारत के विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना पर हो रही चर्चा में बोलते हुए गीता ने कहा, “यदि आप भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रदूषण के प्रभाव को देखें, तो यह अब तक भारत पर लगाए गए किसी भी शुल्क के प्रभाव से कहीं अधिक गंभीर है।” उन्होंने आगे कहा कि प्रदूषण की कीमत केवल आर्थिक गतिविधियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय जीवन की हानि भी शामिल है।
गीता का यह कहना कि अनियंत्रित प्रदूषण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए व्यापार शुल्कों से कहीं अधिक बड़ा खतरा है, जिसे वैश्विक मंच पर पर्यावरण अर्थशास्त्री वर्षों से रेखांकित और प्रमाणित करते आ रहे हैं। दरअसल, वायु प्रदूषण केवल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट नहीं है, यह एक आर्थिक आपातकाल है।
देश के प्रमुख पर्यावरणविद् विमलेंदु झा का कहना है कि गीता गोपीनाथ की चिंता वाजिब है। उनकी बातों का मर्म समझने की जरूरत है कि देश के ऐसे आर्थिक विकास का क्या फायदा कि जहां वायु प्रदूषण जैसी समस्या से करीब 18 फीसदी मौतें हो जाती हों। भारत तब तक सफल और विकसित देश कैसे बन सकता है जबतक कि आम लोगों को स्वच्छ वायु और साफ पानी ना मुहैया है। उन्होंने कहा कि देश में वायु प्रदूषण एक जटिल समस्या बन चुकी है। वायु प्रदूषण से लोग लगभग पूरे साल ही जूझते ही रहते हैं। मुझे उम्मीद है कि आगामी बजट में भारत सरकार इसपर ध्यान देगी।
विश्व बैंक के हालिया रिसर्च के अनुसार, वायु प्रदूषण से वैश्विक कल्याण लागत लगभग 5.7 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष होती है, जो विश्व जीडीपी के लगभग 4.8 प्रतिशत के बराबर है। यह लागत श्रम आय में कमी, श्रम दक्षता में गिरावट, स्वास्थ्य देखभाल व्यय और आर्थिक उत्पादकता में कमी के रूप में सामने आती है।
अकेले भारत में ही प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष अनुमानित 17 लाख मौतें होती हैं, जो कुल मौतों का लगभग 18 प्रतिशत है। इससे जानमाल का नुकसान, स्वास्थ्य देखभाल लागत और कार्यबल की उत्पादकता में कमी के कारण भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।
वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बाजार लागत, जो श्रम उत्पादकता में कमी, स्वास्थ्य संबंधी अतिरिक्त खर्च और फसल उत्पादन में होने वाली हानि से उत्पन्न होती है, का अनुमान है कि 2060 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1 प्रतिशत के बराबर वार्षिक आर्थिक लागत तक पहुंच जाएगी। इससे पहले विश्व बैंक के अनुमानों में प्रदूषण के आर्थिक नुकसान को लगभग 80 अरब डॉलर प्रति वर्ष या भारत के जीडीपी के लगभग 1.7 प्रतिशत के बराबर बताया गया था, जो विकास पर इसके निरंतर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है।
लैंसेट की रिपोर्ट, जो 71 शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के 128 विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई है, में यह भी पाया गया है कि औसतन प्रत्येक भारतीय को 2024 के दौरान लगभग 20 दिनों की लू का सामना करना पड़ा। इनमें से लगभग एक तिहाई का सीधा कारण जलवायु परिवर्तन था। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में औसतन प्रत्येक व्यक्ति को 19.8 दिन लू का सामना करना पड़ा। इनमें से 6.6 दिन ऐसे थे जिनकी जलवायु परिवर्तन के बिना होने की उम्मीद नहीं थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में भीषण गर्मी के कारण प्रति वर्ष 247 अरब संभावित श्रम घंटों का नुकसान हुआ, जो प्रति व्यक्ति 419 घंटे का अब तक का सबसे अधिक नुकसान है और 1990-1999 की तुलना में 124% अधिक है। कृषि क्षेत्र का इसमें 66 प्रतिशत और निर्माण क्षेत्र का 20 प्रतिशत हिस्सा था। भीषण गर्मी के कारण श्रम क्षमता में कमी से संबंधित संभावित आय का नुकसान 2024 में 373 मिलियन डॉलर था। पिछले छह दशकों की तुलना में पिछले एक दशक में देश में डेंगू के मामलों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।
लैंसेट पत्रिका की भारत-विशिष्ट रिपोर्ट में भारत में जीवाश्म ईंधन जलाने के प्रभाव को उजागर किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत में 2022 में मानव जनित वायु प्रदूषण (पीएम 2.5) के कारण 1,718,000 से अधिक मौतें हुईं, जो 2010 से 38% की वृद्धि है।"
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि "वर्ष 2022 में भारत में बाहरी वायु प्रदूषण के कारण होने वाली असमय मृत्यु का मौद्रिक मूल्य 339.4 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 30 लाख करोड़ रुपये) था, जो सकल घरेलू उत्पाद का 9.5 प्रतिशत है।" संयोगवश, जलवायु परिवर्तन से जुड़ा खतरा बढ़ रहा है, लेकिन कम कार्बन उत्सर्जन की दिशा में भारत की तैयारी 2024 में पिछले वर्ष की तुलना में मामूली रूप से कम हो गई।
रिपोर्ट में बताया गया है कि जीवाश्म ईंधन जलाने से होने वाली मौतों में घर के अंदर होने वाला वायु प्रदूषण भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है, '2022 में भारत में प्रदूषणकारी ईंधनों के उपयोग के कारण घरेलू वायु प्रदूषण से प्रति 100,000 लोगों पर 113 मौतें हुईं। घरेलू वायु प्रदूषण से जुड़ी मृत्यु दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100,000 पर 125 और शहरी क्षेत्रों में प्रति 100,000 पर 99 मौतें हुईं।'
अध्ययन में यह भी पाया गया कि "2001 और 2023 के बीच, भारत में कुल मिलाकर 23 लाख हेक्टेयर वृक्ष आवरण नष्ट हो गया, जिसमें से 143,000 हेक्टेयर केवल 2023 में नष्ट हुआ।" इसमें आगे कहा गया है कि पिछले दशक में देश में शहरी हरियाली में 3.6 प्रतिशत की कमी आई है।
भारत के 189 सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से, जिनकी जनसंख्या 5 लाख से अधिक है, 14 शहरों में शहरी हरियाली का स्तर असाधारण रूप से कम था, 110 शहरों में बहुत कम, 42 शहरों में कम और 22 शहरों में मध्यम था। केवल पश्चिम बंगाल के तामलुक शहर को ही शहरी हरियाली के उच्च स्तर वाले शहर के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
Published on:
25 Jan 2026 10:04 am
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