
बांग्लादेश में सिर्फ 109 महिलाओं को टिकट दिया गया है। (Photo: IANS)
Bangladesh Election 2026 : बांग्लादेश चुनाव आयोग के आंकड़ों (Bangladesh Election Commission data) से पता चलता है कि आगामी राष्ट्रीय चुनाव में भाग लेने वाली 51 राजनीतिक पार्टियों में से 30 ने एक भी महिला उम्मीदवार (Bangladesh election women candidates) को मैदान में नहीं उतारा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि महिलाएं बांग्लादेश में भारत के मुकाबले चुनावी दौड़ से काफी हद तक अनुपस्थित हैं। भारत में 2024 में महिला सांसदों की संख्या 2019 के मुकाबले कम हो गई थी।
Bangladesh national election 2026 : ये आंकड़े एक गंभीर असंतुलन को उजागर करते हैं। हालांकि महिलाएं आबादी का आधा हिस्सा हैं, लेकिन उम्मीदवारों में उनकी उपस्थिति नगण्य बनी हुई है। भारत में 2019 में 78 महिलाएं संसद पहुंची थीं, जबकि 2024 में यह घटकर 74 रह गई। 2024 में चुनी गईं महिला प्रतिनिधि संसद का केवल 13.63 फीसदी हिस्सा हैं। सबसे अधिक 31 महिला सांसद इस बार बीजेपी से हैं।
बांग्लादेश आम चुनाव 12 फरवरी 2026: बांग्लादेश में आगामी 12 फरवरी को आम चुनाव होना है। इन चुनावों में भाग लेने वाले 2,568 उम्मीदवारों में से केवल 109 महिलाएं हैं। मतलब चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में से महिलाएं सिर्फ 4.24 प्रतिशत हैं। इन 109 महिलाओं में से सिर्फ 72 को ही पार्टियों द्वारा नामांकित किया गया है, जबकि बाकी निर्दलीय हैं। यह आलम तब है जब इस देश में महिलाएं शीर्ष पदों पर कई दशकों तक विराजमान रही हैं।
यह बहिष्कार जमात-ए-इस्लामी में सबसे अधिक स्पष्ट तौर पर सामने आया है। जमात-ए-इस्लामी ने 276 उम्मीदवारों को टिकट दिया, लेकिन एक भी महिला को चुनावी समर में नहीं उतारा। उसके बाद इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश पार्टी का नाम आता है। इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने 268 लोगों को चुनावी मैदान में उतारा है लेकिन एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है।
देश की कई अन्य छोटी-बड़ी पार्टियों ने भी सिर्फ पुरुष उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। देश की कई पार्टी जो महिला कार्यकर्ताओं की राजनीति में समान भागीदारी और सामाजिक बराबरी की बात करती हैं लेकिन सच तो यह है कि बीएनपी समेत किसी भी पार्टी ने 10 से अधिक महिलाओं को नामांकित नहीं किया है। यह आंकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि समावेश के ये प्रयास कितने सीमित और प्रतीकात्मक बने हुए हैं।
बांग्लादेश खिलाफत मजलिस (94), खिलाफत मजलिस (68) और बांग्लादेश इस्लामी मोर्चा (बीआईएफ) (27) सहित कई पार्टियों ने भी इसी तरह महिलाओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) ने 24 उम्मीदवार, जोनोतार दल ने 23, बांग्लादेश सांस्कृतिक मुक्ति जोत ने 20 और बांग्लादेश कांग्रेस ने 18 उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन किसी ने महिला उम्मीदवारों को प्रतिनिधि बनाना उचित नहीं समझा।
जातीय पार्टी (जेपी) (13), बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन (11), बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट (9), और बांग्लादेश जसद (9) ने महिलाओं को पूरी तरह से बाहर रखा है। इस सूची में राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक आंदोलन (8), बांग्लादेश जातीयताबादी आंदोलन - बीएनएम (8), बांग्लादेश मुस्लिम लीग (बीएमएल) (7), ज़ाकर पार्टी (7), बांग्लादेश निज़ामे इस्लाम पार्टी (6), और गानो फ्रंट (6) शामिल हैं। बांग्लादेश जातीय पार्टी (सिराजुल) (5) और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम बांग्लादेश (5) में भी महिलाओं की कोई भागीदारी नहीं है।
जातीय गणतांत्रिक पार्टी, इस्लामी ओइक्या जोते, बांग्लादेश कल्याण पार्टी, बांग्लादेश जातीय पार्टी (पार्थ) ने तीन-तीन पुरुष उम्मीदवारों को जबकि बांग्लादेश विकास पार्टी ने 2 उम्मीदवारों को टिकट दिए। सूची में सबसे नीचे गणतांत्रिक पार्टी, बांग्लादेश राष्ट्रीय अवामी पार्टी, बांग्लादेश एनएपी और बांग्लादेश समाधिकार पार्टी ने केवल एक-एक उम्मीदवार मैदान में उतारा, और उनमें से कोई भी महिला नहीं थी।
चुनाव आयोग की पूर्व अतिरिक्त सचिव और चुनावी सुधार आयोग की सदस्य जेस्मिन तुली ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में अभी भी पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है। उन्होंने कहा, "चुनाव महिलाओं के अनुकूल नहीं हैं।" प्रमुख पार्टियां बहुत कम महिलाओं को नामांकित करती हैं जबकि छोटी पार्टियां बस उनका अनुसरण करती हैं। उन्होंने आगे कहा कि वित्तीय बाधाएं, सामाजिक सोच और शारीरिक शक्ति का अभाव महिलाओं को चुनाव लड़ने से और भी हतोत्साहित करता है।
उन्होंने कहा, "आगे आने वाली अधिकांश महिलाएं राजनीतिक परिवारों से आती हैं। जमीनी स्तर की सक्रियता के माध्यम से बहुत कम महिलाएं आगे बढ़ती हैं।" उन्होंने आगे कहा कि पार्टियां महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाने या उन्हें पार्टी समितियों में सार्थक रूप से शामिल करने में विफल रही हैं।
"आंदोलनों के दौरान महिलाएं दिखाई देती हैं, लेकिन चुनावों के दौरान उन्हें हाशिए पर डाल दिया जाता है। पार्टियां महिलाओं को आर्थिक सहायता दे सकती थीं, लेकिन नीतिगत स्तर पर भी ऐसी कोई पहल दिखाई नहीं देती।"
जिन 21 पार्टियों ने महिलाओं को नामांकित किया, उनमें भी संख्या कम ही रही। जातीय पार्टी (जीएम कादर) और नवगठित बासाद (मार्क्सवादी) ने नौ-नौ महिलाओं को नामांकित किया।
चार दशकों से अधिक समय से महिला नेतृत्व वाली बीएनपी ने 300 सीटों के लिए 328 उम्मीदवारों में से 10 महिलाओं को टिकट दिया है। पार्टी ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में एक-एक सीट के लिए कई नेताओं को नामांकन पत्र एकत्र करने और जमा करने के लिए कहा है।
जासाद, गणोसमहती आंदोलन, बसद और एबी पार्टी सहित कई अन्य पार्टियों ने भी तीन से छह महिलाओं को नामांकित किया।
यहां तक कि जिन जन आंदोलनों में महिलाओं की मजबूत भागीदारी थी, उनसे जन्मी पार्टियों में भी सीमित समावेश देखने को मिला। जुलाई विद्रोह के नेताओं द्वारा गठित एनसीपी ने अपने 44 उम्मीदवारों में से केवल तीन महिलाओं को नामांकित किया।
जन प्रतिनिधित्व आदेश (आरपीओ) 1972 के अनुसार, पार्टियों को केंद्रीय स्तर सहित समिति के कम से कम 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित करने होंगे। लेकिन लगभग सभी पार्टियां इस दायित्व को पूरा करने में विफल रही हैं। चुनाव आयोग ने 2021 में देश में इसे लागू नहीं होता हुआ देखकर इसकी समय सीमा को बढ़ाकर 2030 कर दिया था।
Published on:
07 Jan 2026 06:00 am
बड़ी खबरें
View AllPatrika Special News
ट्रेंडिंग
