
आज विश्व हिंदी दिवस मनाया जा रहा है।
World Hindi Day : आज दुनिया भर में विश्व हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। हिंदी और भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर देश में त्रि-भाषा सूत्र (Three Languages Formula) पर चलकर शिक्षा देने की बात राधाकृष्णन आयोग (Radhakrishnan Commission report 1948-49) की रिपोर्ट की सिफारिश के बाद से ही प्रारंभ हो गई थी।
इस सूत्र के अनुसार देश में स्कूलों को तीन भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था का परामर्श दिया गया था। आयोग का कहना था कि माध्यमिक स्तर पर प्रादेशिक भाषा, हिंदी भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाए। हालांकि इसके बाद 1968 में कोठारी आयोग (Kothari Commission) की सिफारिश पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 (New Eduaction Policy) में ‘त्रि-भाषा सूत्र’ को स्वीकार कर लिया गया परंतु इसे धरातल पर नहीं लाया जा सका। भाषा तकरार, उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत, सरकारी स्कूल बनाम प्राइवेट स्कूल के बीच कैसे बढ़ेगी हिंदी और अन्य भारतीय भाषा?
भारत के जानेमाने शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल (Anil Sadgopal, Educationist) ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि तीन या चार भाषा फॉमूर्ला लागू कराने का माध्यम सरकारी स्कूल रहे हैं। सरकारी स्कूलों को बहुत तेजी से बंद किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में ही हजारों की संख्या में सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं।
उन्होंने प्राइवेट स्कूलों में हिंदी पढ़ाने के रवैये को लेकर कहा कि देश में प्राइवेट स्कूल बहुत तेजी से खुलते जा रहे हैं। किसी शहर या गांव की गली में इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल आपको मिल जाएंगे। इन स्कूलों में हिंदी पढ़ाना मजबूरी भर रह गया है। यहां शिक्षक बच्चों को अंग्रेजी सीखने या अंग्रेजी में बात करने पर जोर देते हैं। वह अभिभावकों पर भी घर में बच्चों से अंग्रेजी में बातचीत करने पर जोर देते हैं। ऐसे में हिंदी ही नहीं बहुत सारी भाषाएं दम तोड़ चुकी हैं या तोड़ देंगी। उन्होंने कहा कि स्कूलों में अंग्रेजी की शिक्षा दी जानी चाहिए लेकिन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की बलि देकर नहीं।
Private School Growing Rapidly in India : भारत में 2014-15 से 2023-24 तक 89,441 सरकारी स्कूल बंद हुए, जबकि निजी स्कूल 14.9% बढ़े। मध्य प्रदेश में इस अवधि में 29,410 और उत्तर प्रदेश में 25,126 में सबसे ज्यादा स्कूल बंद हुए। लोकसभा में जयंत चौधरी के पेश किए एक आंकड़े के अनुसार, पिछले एक दशक में 8% सरकारी स्कूल बंद किए गए।
Government School Declining Rapidly in India: लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2014 से लेकर 2024 के बीच 89,441 सरकारी स्कूलों पर ताले लगाए गए। सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर अब 10,17,660 हो गई। वहीं इसी अवधि में प्राइवेट स्कूलों की संख्या में 42,944 की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अब प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,88,164 से बढ़कर 3,31,108 हो गई।
Admission declining in MP and UP government Schools: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में दाखिलों की संख्या में क्रमशः 29,410 और 25,126 की गिरावट दर्ज की गई, जो कुल सरकारी स्कूलों में हुई 89,441 की गिरावट का 60.9% है। उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में दाखिलों में 19,305 की वृद्धि दर्ज की गई। इस तरह से उत्तर प्रदेश ने देश भर में निजी स्कूलों में दाखिलों की कुल वृद्धि का 44.9% हिस्सा दर्ज किया है, जो अब 42,944 हो गया है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में भाषा विज्ञान की प्रोफेसर रह चुकी अन्विता अब्बी (Anvita Abbi, Former JNU Proffessor) का इस बारे में मानना है कि बच्चों को तीन नहीं चार भाषा सूत्र के आधार पर शिक्षा देना चाहिए। वह कहती हैं, उन्हें एक साथ चार भाषाएं मत सिखाएं। मेरे हिसाब से चार चरणों में उन्हें चारों भाषाओं का ज्ञान दिया जाना चाहिए।
पहले दो साल तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दें ताकि जब वो साढ़े चार-पांच साल की उम्र में मां को छोड़कर स्कूल जाने लगे तो उसे अपनी मातृभाषा में खुद को अच्छी तरह अभिव्यक्त करना आ जाए। मिसाल के लिए राजस्थान की प्रांतीय भाषा हिंदी है तब उसे विषय के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए, न कि माध्यम के रूप में।
वह कहती हैं, मान लें कि उसकी मातृभाषा शेखावटी है तो उसे पहली और दूसरी जमात में शेखावटी में सिखाएं। तीसरी जमात में उसे हिंदी माध्यम में पढ़ाएं ताकि उसका संपर्क अपनी भाषा में बना रहे। पांचवी कक्षा में उत्तर भारत के बच्चों को दक्षिण भारत के बच्चों को दक्षिण भारत की कोई एक भाषा और दक्षिण भारत के बच्चों को हिंदी सिखाई जानी चाहिए। छठी कक्षा से विषय के तौर पर अंग्रेजी का ज्ञान दें। छठी में अगर चाहें तो उसे मातृभाषा पढ़ने या ना पढ़ने की छूट दी जा सकती है।
प्रोफेसर अब्बी का मानना है कि चार भाषा सूत्र पर चलकर छठी कक्षा तक आते-आते बच्चों को अपनी मातृभाषा का ज्ञान बहुत अच्छे ढंग से हो जाएगा और फिर वह उसे जिंदगी भर नहीं भूलेगा। उसका सम्मान अपनी मातृभाषा के लिए ताउम्र बना रहेगा। यह मत भूलें कि बच्चों के लिए यह आकार लेने की उम्र (फॉर्मेटिव स्टेज) होती है।
उनका कहना है कि नौवीं कक्षा से बच्चों को यह छूट मिलनी चाहिए कि वह पढ़ाई का माध्यम हिंदी या अंग्रेजी किसी भाषा में कर सके। हालांकि हिंदी को एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाना जरूर जारी रखा जाना चाहिए। हिंदी की स्वीकार्यता बहुत व्यापक है। यह नकारात्मक सोच है कि हिंदी को दक्षिण भारत में गलत निगाह से देखा जाता है। हिंदी टेलीविजन और फिल्मों की वजह से बहुत लोकप्रिय हो रही है।
वह दावा करते हुए कहती हैं कि पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों के लोग एक-दूसरे से आपस में बात नहीं कर पाते थे। उनकी भाषाओं में बोधगम्यता है ही नहीं। हिंदी ने उन्हें जोड़ने का काम किया है। वे आपस में शादी भी कर रहे हैं। पूजा-पाठ भी संस्कृत छोड़कर हिंदी में होने लगे हैं। यह अलग बात है कि हमारी हिंदी से उनकी हिंदी बहुत अलग है। यही वजह है कि हिंदी पूरे भारत के स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए।
Updated on:
10 Jan 2026 08:28 am
Published on:
10 Jan 2026 06:00 am
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