
हीरे की कीमत तय करने में 4Cs का बड़ा महत्व होता है (PC: Canva)
हीरा है सदा के लिए, चाहे वो अरबों सालों से दफ्न जमीन की गहराई से आए या फिर किसी साइंटिफिकि लैब से। मगर, क्या लैब में बना हीरा नकली होता है, अगर नहीं तो लैब वाला हीरा सस्ता और माइनिंग से निकला हीरा महंगा क्यों होता है? ये वो सवाल हैं जो हमेशा से एक आम खरीदार के ज़ेहन में बना रहता है। लैब ग्रोन डायमंड (Lab Grown Diamond) का मार्केट बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। प्रभुदास लीलाधर की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में मिलेनियल्स की सबसे बड़ी आबादी भारत में है, भारत भविष्य में लैब-ग्रोन डायमंड्स का सबसे बड़ा बाजार बन सकता है। मगर, आज भी लोगों को लैब ग्रोन डायमंड्स के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।
प्राकृतिक हीरे जमीन की गहराई में बनते हैं। अरबों साल पहले, कार्बन पर बहुत ज्यादा दबाव और गर्मी पड़ती है, फिर ज्वालामुखी विस्फोट से ये ऊपर आते हैं। हर हीरा अपने आप में अनोखा होता है, इसमें छोटे-छोटे निशान होते हैं। ये बहुत दुर्लभ होते हैं क्योंकि नए हीरे नहीं बन रहे।
ज़मीन के अंदर से हीरे निकालना बहुत मुश्किल काम है। इसकी माइनिंग, प्रोसेसिंग, कटिंग पर बहुत लागत आती है। इसलिए ये सभी लोग अफोर्ड भी नहीं कर सकते, क्योंकि इसकी कीमत बहुत ज्यादा होती है। जबकि लैब में जो हीरा होता है वो इसके मुकाबले काफी सस्ता होता है। लैब में बने हीरे एक कार्बन सीड से विकसित किए जाते हैं, जिसे माइक्रोवेव चेम्बर में रखकर बहुत ज्यादा तापमान 1,000-1,500 डिग्री पर गर्म किया जाता है और इसे चमकते प्लाज्मा बॉल में बदल दिया जाता है। इस प्रक्रिया से कण बनते हैं जो कुछ हफ्तों में क्रिस्टलाइज होकर हीरे का रूप ले लेते हैं।
लैब में दो तरीकों से हीरा बनाया जाता है। इनको बनाने में कुछ हफ्ते से लेकर कुछ महीने ही लगते हैं।
लैब में बना हीरा भी उतना ही असली है, जितना कि ज़मीन से निकाला गया हीरा। यह कोई नकली हीरा नहीं होता है, जैसे Cubic Zirconia या Moissanite नहीं है। यह रियल डायमंड है। क्योंकि इसमें बिल्कुल वही केमिकल स्ट्रक्चर होता है जो कि ज़मीन से निकले हीरे का होता है। लैब में बना हीरा भी केमिकली, फिजिकली और ऑप्टिकली बिल्कुल उसी हीरे की तरह होता है जो ज़मीन के अंदर से निकाला जाता है। दोनों ही शुद्ध कार्बन से बने होते हैं। सामान्य आंख से देखने पर कोई फर्क नहीं दिखता। सिर्फ एक्सपर्ट मशीन से चेक करके बता सकते हैं कि कौन से हीरा ज़मीन से निकाला गया है और कौन सा लैब से बना है।
लैब-ग्रोन डायमंड्स अपनी असाधारण वैल्यू और मांग की वजह से ज्वेलरी मार्केट में क्रांति ला रहे हैं। लैब में बना हीरा काफी सस्ता होता है, क्योंकि माइनिंग वाले हीरों की तुलना में उनकी उत्पादन लागत कम है, सप्लाई ज्यादा है और मार्केट सेंटीमेंट्स अलग होता है। प्राकृतिक हीरे अपनी दुर्लभता और सांस्कृतिक महत्व की वजह से ज्यादा महंगे होते हैं। लैब-ग्रोन हीरों की क्वालिटी और विशेषताओं को नियंत्रित करने की क्षमता भी उनकी कीमत में योगदान देती है। मगर, सस्ते होने के बावजूद, ये लैब में बने हीरे अपनी वैल्यू नहीं खोते हैं और प्राकृतिक हीरों की तरह ही कीमती माने जाते हैं।
हीरे की कीमत तय करने में 4Cs का बड़ा महत्व होता है। 4Cs यानी कट, कलर, क्लैरिटी और कैरेट। ये नैचुरल और लैब-में बने दोनों डायमंड्स की कीमत को प्रभावित करते हैं, लेकिन उनका प्रभाव अलग-अलग होता है। लैब-ग्रोन डायमंड्स नियंत्रित उत्पादन के कारण सटीक कट और हाई क्लैरिटी हासिल कर सकते हैं, जो उनकी कीमत को प्रभावित करता है। लैब डायमंड को कुछ खास रंगों के लिए भी बदला जा सकता है, जिससे कुछ फैंसी कलर्स नैचुरल डायमंड्स की तुलना में ज्यादा किफायती हो जाते हैं।
औसतन, लैब में बना हीरा समान आकार, कट, क्लैरिटी और कलर वाले प्राकृतिक डायमंड्स की तुलना में 50% से 60% तक सस्ते होते हैं। उदाहरण के लिए, 1-कैरेट नैचुरल डायमंड की कीमत 3 लाख से 10 लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकती है, जबकि इसी स्पेसिफिकेशन्स वाले IGI-सर्टिफाइड लैब-ग्रोन डायमंड की कीमत 40,000 से 1 लाख के बीच होती है।
जैसे एक ब्रांडेड ज्वेलरी स्टोर जैसे BlueStone में SI क्लैरिटी वाला नेचुरल 1-कैरेट सॉलिटेयर (18-कैरेट गोल्ड में सेट) की कीमत 2-3 लाख रुपये होती है। वहीं, VS क्लैरिटी वाला समान लैब-ग्रोन वर्जन सिर्फ 1.2 लाख में मिल जाता है। यानी आधी से भी कम कीमत पर।
आकार बढ़ने पर यह अंतर और ज्यादा हो जाता है। Orra में SI क्लैरिटी वाला 1.5-कैरेट लूज नेचुरल डायमंड 7.55 लाख रुपये का मिल सकता है। जबकि VS1 क्लैरिटी वाला नेचुरल डायमंड 11.45 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। दूसरी तरफ, फ्लॉलेस 1.5-कैरेट लैब-ग्रोन लूज डायमंड सिर्फ 45,000 प्रति कैरेट का पड़ता है।
जब आप हीरा खरीदने जाते हैं तो आपको साथ में सर्टिफिकेशन मिलता है, जो कुछ लैब्स जारी करती हैं. इंटरनेशनल जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट (IGI) और कई अंतरराष्ट्रीय लैब्स डायमंड के कलर और क्लैरिटी के वैल्युएशन के लिए मैनुअल असेसमेंट पर निर्भर करते हैं। जिसमें जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका (GIA) को अपनी कठोर ग्रेडिंग स्टैंडर्ड्स और सख्त मूल्यांकन प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। हालांकि, इस गुणवत्ता की कीमत चुकानी पड़ती है। जनवरी 2026 में GIA सर्टिफिकेट की फीस छोटे स्टोन्स 1 कैरेट के लिए करीब 4,500 रुपये से शुरू होकर बड़े 4-5 कैरेट डायमंड्स के लिए 20,000-30,000 रुपये या उससे अधिक तक हो सकती है, जबकि IGI सर्टिफिकेट काफी सस्ता होता है, प्रति स्टोन 500-2,000 रुपये के रेंज में होता है।
साल 2010 में लैब ग्रोड डायमंड्स का मार्केट नहीं के बराबर था। साल 2019 के अंत तक नैचुरल डायमंड्स के पास 93% मार्केट शेयर था, लेकिन धीरे-धीरे लैब ग्रोन डायमंड्स की तेजी से डिमांड बढ़ी, टेक्नोलॉजी एडवांस होने के साथ ही साल 2023 तक ये मार्केट 265 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, साल 2024 में करीब 300 मिलियन डॉलर और साल 2025 तक 400 मिलियन डॉलर हो चुका है। सरकार भी लैब ग्रोन डायमंड का काफी सपोर्ट करती है। इसलिए इस सेक्टर में 100% FDI का दरवाजा खोल रखा है। साथ ही लैब ग्रोन डायमंड के सीड्स पर 5% कस्टम ड्यूटी को भी सरकार खत्म कर चुकी है।
Published on:
10 Jan 2026 06:00 am
बड़ी खबरें
View AllPatrika Special News
ट्रेंडिंग
