26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

उल्टा पड़ रहा सपा को पूजा पाल का निष्कासन? भाजपा को मिला PDA के खिलाफ हथियार, जानें सियासी गणित

Puja Pal expelled from SP : पूजा पाल का निष्कासन सपा पर ही भारी पड़ रहा है। पूजा पाल का निष्कासन पाल और बघेल समाज के वोटों को बीजेपी की ओर मोड़ सकता है। बीजेपी इस मौके को भुनाने के लिए पहले से ही ओबीसी समुदायों, जैसे लोध और चौहान, को साधने में जुटी है।

4 min read
Google source verification

पूजा पाल को सपा से निष्कासित करने का दांव पड़ रहा उल्टा? PC- Video Grab

लखनऊ : उत्तर प्रदेश की सियासत में कौशांबी की चायल विधानसभा सीट से सपा विधायक पूजा पाल के निष्कासन ने नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के इस फैसले ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को अखिलेश यादव के 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (PDA) फॉर्मूले को कमजोर करने का सुनहरा मौका दे दिया है। पाल और बघेल समाज के प्रभावशाली वोट बैंक को अपने पाले में लाने की बीजेपी की रणनीति अब और तेज हो गई है। आइए, इस सियासी ड्रामे के नफा-नुकसान को समझते हैं और तथ्यों की पड़ताल करते हैं...।

क्यों हुआ पूजा पाल का निष्कासन?

14 अगस्त 2025 को सपा ने पूजा पाल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। यह कार्रवाई तब हुई, जब पूजा ने विधानसभा के मानसून सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'जीरो टॉलरेंस' नीति और माफिया अतीक अहमद के खिलाफ कार्रवाई की तारीफ की। पूजा ने अपने पति, पूर्व विधायक राजू पाल की 2005 में हुई हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि योगी सरकार ने उन्हें न्याय दिलाया, जबकि सपा ने उनकी पीड़ा को अनदेखा किया। इस बयान ने सपा नेतृत्व को नाराज कर दिया, और अखिलेश यादव ने तुरंत उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

पूजा पाल ने विधानसभा में 13 अगस्त 2025 को 'विजन 2047' चर्चा के दौरान योगी सरकार की तारीफ की थी। उन्होंने कहा, 'मुख्यमंत्री ने अतीक अहमद जैसे अपराधियों को मिट्टी में मिलाया और मेरे जैसी कई महिलाओं को न्याय दिलाया।' यह बयान सपा की नीतियों के खिलाफ था, क्योंकि पार्टी योगी सरकार की कानून-व्यवस्था नीतियों की आलोचना करती रही है। सपा ने इसे अनुशासनहीनता माना और निष्कासन पत्र में पार्टी विरोधी गतिविधियों का हवाला दिया।

सपा का PDA फॉर्मूला और बीजेपी की रणनीति

सपा का PDA फॉर्मूला (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहा था, जिसमें गैर-यादव ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट कर पार्टी ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। लेकिन पूजा पाल के निष्कासन ने बीजेपी को इस फॉर्मूले की हवा निकालने का मौका दे दिया। यूपी में पाल और बघेल समाज की आबादी ओबीसी वोट बैंक में यादवों के बाद सबसे प्रभावशाली मानी जाती है, जो पूर्वांचल और मध्य यूपी की कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है।

2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या, जिसमें अतीक अहमद का नाम आया, के बाद पाल समाज का सहानुभूति वोट पहले बसपा और फिर सपा की ओर गया। पूजा पाल ने इस सहानुभूति को भुनाते हुए 2007 और 2012 में बसपा के टिकट पर शहर पश्चिमी सीट जीती और 2022 में सपा के टिकट पर चायल सीट से विधायक बनीं।

राजू पाल की हत्या 25 जनवरी 2005 को प्रयागराज में हुई थी, और इस मामले में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ पर आरोप लगे थे। सीबीआई कोर्ट ने इस मामले में कई आरोपियों को सजा सुनाई। पूजा पाल ने इस हत्याकांड के बाद सहानुभूति वोटों के दम पर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी।

बीजेपी को कैसे मिला हथियार?

  1. पाल-बघेल वोट बैंक: बीजेपी पूजा पाल को अपने पाले में लाकर पाल और बघेल समाज को साधने की कोशिश कर रही है। सूत्रों के अनुसार, पूजा ने 16 अगस्त 2025 को लखनऊ में सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से मुलाकात की, जिसने उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलों को हवा दी। बीजेपी उन्हें 2027 के चुनाव से पहले किसी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर सकती है।
  2. सपा की छवि पर हमला: बीजेपी इस मामले को 'महिला सशक्तिकरण' और 'माफिया विरोध' से जोड़कर सपा को 'महिला विरोधी' और 'माफिया समर्थक' के रूप में पेश कर रही है। बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने कहा, "सपा का PDA का मतलब है पिछड़ों को मार-मारकर बाहर निकाल दो।

पूजा पाल ने 2024 के फूलपुर उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी दीपक पटेल के लिए प्रचार किया था और राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग कर बीजेपी को समर्थन दिया था। यह उनकी सपा से बढ़ती दूरी का संकेत था। हालांकि, उन्होंने 17 अगस्त 2025 को दावा किया कि वे अभी बीजेपी में शामिल नहीं हो रही हैं और अपनी रणनीति पर पाल समुदाय से चर्चा करेंगी।

सपा का नुकसान, बीजेपी का फायदा

सपा की मुश्किलें : पूजा पाल के निष्कासन ने सपा के PDA फॉर्मूले को कमजोर करने की आशंका बढ़ा दी है। पाल समुदाय में असंतोष फैल सकता है, जो सपा के लिए 2027 के चुनाव में नुकसानदायक हो सकता है। सपा प्रवक्ता अशोक यादव ने दावा किया कि पूजा का निष्कासन अनुशासन के लिए जरूरी था, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम उल्टा पड़ सकता है।

बीजेपी की रणनीति: बीजेपी पहले से ही गैर-यादव ओबीसी वोटों को साधने के लिए लोध, चौहान और अन्य समुदायों पर फोकस कर रही है। पूजा पाल का मामला इसे और मजबूती दे सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने पूजा को 'न्याय की योद्धा' करार दिया, जिसे बीजेपी अपनी 'महिला सुरक्षा' और 'माफिया विरोधी' छवि के लिए भुना रही है।

सपा ने पूजा पाल के अलावा राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले चार अन्य विधायकों को पहले ही निष्कासित कर दिया था, लेकिन पूजा पर तब कार्रवाई नहीं हुई थी। विश्लेषकों का मानना है कि सपा ने तब पूजा को पाल समाज के वोटों के लिए बरकरार रखा था, लेकिन उनकी खुली बगावत ने अखिलेश को मजबूर किया।

सोशल मीडिया पर क्या है माहौल?

सोशल मीडिया पर पूजा पाल के निष्कासन को लेकर दो धड़े दिख रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, "पूजा पाल ने माफिया के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन सपा ने वोट बैंक के लिए उन्हें सजा दी।" वहीं, सपा समर्थकों का कहना है कि पूजा की बीजेपी के साथ नजदीकी अनुशासनहीनता थी। एक अन्य पोस्ट में कहा गया, "सपा का फैसला सही है, क्योंकि पूजा लंबे समय से पार्टी विरोधी गतिविधियों में थीं।"

2027 के लिए सियासी गणित

सपा के लिए पूजा पाल का निष्कासन जोखिम भरा साबित हो सकता है, क्योंकि यह पाल और बघेल समाज के वोटों को बीजेपी की ओर मोड़ सकता है। बीजेपी इस मौके को भुनाने के लिए पहले से ही ओबीसी समुदायों, जैसे लोध और चौहान, को साधने में जुटी है। दूसरी ओर, सपा का दावा है कि वह 2027 में अनुशासित नेताओं के साथ PDA फॉर्मूले को और मजबूत करेगी। लेकिन पूजा पाल जैसे प्रभावशाली चेहरों का नुकसान पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।