
छत्तीसगढ़ के दफ्तरों में टाइपराइटर की अनकही कहानी(photo-patrika)
CG News: क्लिक, टच और वॉइस कमांड के दौर में जब पूरा देश डिजिटल इंडिया की रफ्तार पकड़ चुका है, तब भी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कलेक्ट्रेट और तहसील परिसरों में एक अलग ही दुनिया चलती है। यहाँ आज भी टाइपराइटर की “ठक-ठक” करती आवाज़ें सुनाई देती हैं, जो सिर्फ मशीन नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत, भरोसे और आत्मनिर्भरता की कहानी कहती हैं।
सरकारी कामकाज भले ही कंप्यूटरीकृत हो गया हो, लेकिन शपथपत्र, अर्जियाँ और कानूनी दस्तावेजों के लिए आज भी मैनुअल टाइपिंग पर भरोसा किया जाता है। अर्जीनवीश बताते हैं कि कंप्यूटर में सेटिंग, प्रिंट और लाइन लगने में समय लगता है, जबकि टाइपराइटर पर काम तुरंत शुरू हो जाता है। अनुभव इतना पुख्ता है कि गलती की गुंजाइश बेहद कम रहती है।
सिब्तेन रजा हाशिमी की कहानी सिर्फ पेशा बदलने की नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और आत्मसम्मान की लड़ाई की कहानी है। वर्ष 2000 में कोर्ट परिसर से जुड़े सिब्तेन ने 2006 में टाइपिस्ट के रूप में काम शुरू किया। सीमित सम्मान ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। पढ़ाई और प्रैक्टिस को साथ लेकर उन्होंने बीएलएलबी किया और आज वकील के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। यह छत्तीसगढ़ के युवाओं के लिए संदेश है कि छोटे काम से बड़ी मंज़िल तक पहुँचा जा सकता है।
राजेंद्र साहू छत्तीसगढ़ के उन लोगों में से हैं, जिनके लिए टाइपराइटर सिर्फ मशीन नहीं, जीवन का आधार है। 1972 से कलेक्ट्रेट परिसर में काम कर रहे राजेंद्र साहू बताते हैं कि एक दौर ऐसा था जब सरकारी दफ्तरों में टाइपिंग के बिना काम की कल्पना नहीं की जा सकती थी। नौकरी की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि मेहनत ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया।
छत्तीसगढ़ में टाइपराइटर का उपयोग औपचारिक रूप से ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर और स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक से शुरू माना जाता है। उस समय जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था, तब कलेक्ट्रेट, तहसील, न्यायालय और पुलिस विभागों में दस्तावेजी काम के लिए मैनुअल टाइपराइटर अपनाया गया।
1950–60 के दशक में जैसे-जैसे प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ, वैसे-वैसे आवेदन, शपथपत्र, नोटिस, आदेश और न्यायालयीन दस्तावेजों की संख्या बढ़ने लगी। हाथ से लिखे दस्तावेजों की जगह टाइप किए हुए कागजात को अधिक स्पष्ट, आधिकारिक और विश्वसनीय माना जाने लगा। यहीं से टाइपराइटर सरकारी कामकाज की रीढ़ बन गया।
छत्तीसगढ़ में टाइपराइटर का स्वर्णकाल 1970 से 1990 के बीच माना जाता है। इस दौर में कलेक्ट्रेट, तहसील और न्यायालय परिसरों में टाइपराइटर के बिना काम की कल्पना नहीं की जा सकती थी। हर बड़े सरकारी परिसर में दर्जनों टाइपिस्ट सक्रिय रहते थे, जिनके पास दिनभर काम की कतार लगी रहती थी। उस समय टाइपिंग को एक सम्मानजनक, स्थायी और भरोसेमंद रोज़गार माना जाता था।
कई परिवारों की आजीविका पूरी तरह टाइपिंग पर निर्भर थी। मेहनत और हुनर के बल पर टाइपिस्टों ने न सिर्फ अपने परिवार का भरण-पोषण किया, बल्कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई और समाज में एक अलग पहचान भी बनाई। यह दौर छत्तीसगढ़ में टाइपिंग को केवल पेशा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक बनाता है।
वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद भी टाइपराइटर की उपयोगिता खत्म नहीं हुई। शुरुआती वर्षों में कंप्यूटरीकरण सीमित था, इसलिए सरकारी दस्तावेजों में टाइपराइटर का उपयोग लगातार जारी रहा। विशेषकर न्यायालय, तहसील और कलेक्ट्रेट परिसरों में इसकी भूमिका बनी रही।
2005 के बाद कंप्यूटर और ऑनलाइन सिस्टम के आने से टाइपराइटर का उपयोग जरूर कम हुआ, लेकिन यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। आज भी छत्तीसगढ़ के कई सरकारी परिसरों में अर्जियां, शपथपत्र और पुराने निर्धारित प्रारूपों वाले दस्तावेज मैनुअल टाइपिंग से ही तैयार किए जाते हैं। खासकर न्यायालय, तहसील और कलेक्ट्रेट परिसरों में अनुभव और सटीकता के कारण टाइपराइटर पर टाइप किए गए दस्तावेजों पर अब भी भरोसा किया जाता है।
आज टाइपराइटर सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक और श्रम संस्कृति की विरासत बन चुकी है। यह उन हजारों टाइपिस्टों की मेहनत की पहचान है, जिन्होंने दशकों तक सरकारी व्यवस्था को गति दी।
छत्तीसगढ़ की खासियत यही रही है कि यहाँ आधुनिकता के साथ परंपरा भी चलती है। टाइपराइटर भले ही तकनीकी रूप से पुरानी हो, लेकिन भरोसे, गति और सटीकता के मामले में आज भी कई जगह उसका विकल्प नहीं बन पाया है।
आज टाइपराइटर गिने-चुने स्थानों तक सीमित जरूर है, लेकिन यह खत्म नहीं हुई है। यह उन लोगों की रोज़ी-रोटी है, जिन्होंने दशकों तक सरकारी व्यवस्था को चलाया। डिजिटल युग में यह हुनर अब विरासत बन चुका है, जिसे सहेजने की जरूरत है।
Updated on:
10 Jan 2026 12:11 pm
Published on:
10 Jan 2026 12:07 pm
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