
प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT
पंजाब में नशे का कारोबार चरम पर है। यहां चिट्टा चारों ओर बिक रहा है। जैसा कि सांसद राघव चड्ढा ने भी ये दावा किया था। ये हर बार का चुनावी मुद्दा है। 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के बीच यह मुद्दा फिर से तेजी से उभर रहा है। पर, यह नया नहीं है, पिछली चुनावों में भी इस तरह के दावे किए गए लेकिन हुआ क्या?
2012 से अब तक पंजाब में हर प्रमुख राजनीतिक दल ने नशे को चुनावी मुद्दा बनाया है। 2012 में SAD–BJP सरकार पर नशे की समस्या पर नियंत्रण न रखने का आरोप लगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP ने इसी मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और चार सीटें जीतीं।
2017 में कांग्रेस ने “चार हफ्तों में नशा खत्म” करने का वादा किया, लेकिन यह वादा पूरा नहीं हो पाया और विपक्ष ने इसका राजनीतिक लाभ उठाया। 2022 में AAP ने “बड़ी मछलियों” को पकड़ने और ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान चलाने का दावा किया - हजारों FIR दर्ज की गईं, हजारों गिरफ्तारियां हुईं, संपत्तियों पर कार्रवाई की गई। लेकिन जमीनी स्तर पर नशा अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
नशा संगठित अपराध और सीमा पार नेटवर्क से जुड़ा खतरा बन गया है। मार्च 2025 से AAP सरकार के अभियान के तहत 36,178 FIR दर्ज की गईं, 51,648 गिरफ्तारियां हुईं, 2,277 किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और 16.7 करोड़ रुपये की नकदी बरामद की गई। जनवरी 2026 में शुरू हुए “गैंगस्टरां ते वार” अभियान में 200 दिनों में 58,000 से अधिक लोगों पर कार्रवाई हुई, हथियार बरामद हुए और गैंगस्टर नेटवर्क पर छापे मारे गए। फिर भी, नशे की जड़ें अभी भी गहरी हैं।
अब BJP इस मुद्दे को चुनावी रणनीति के केंद्र में ला रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान” शुरू किया, जिसका समय 2027 के चुनाव से ठीक पहले है। BJP पंजाब में “नशा मुक्त पंजाब यात्रा” 18 सितंबर से शुरू कर रही है, जो 30 सितंबर तक चलेगी। इसमें पांच रैलियां, बाइक रैली, पदयात्रा, नारी शक्ति कार्यक्रम और जनसभाएं शामिल हैं। यात्रा का समापन जालंधर में होगा, जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शामिल हो सकते हैं। BJP का उद्देश्य है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित न रहे, बल्कि जन आंदोलन का रूप ले।
साथ ही, अमृतपाल सिंह की पार्टी ने बाबा बकाला में एक सम्मेलन में वादा किया कि सत्ता में आने पर वे नशे पर एक व्यापक श्वेत पत्र जारी करेंगे, जिसमें 1997 से 2027 तक की आपूर्ति नेटवर्क, मौतों, पुलिस और राजनीतिक संबंधों की जांच होगी।
पिछले चार चुनावों में “डेरा, वंशवाद और ड्रग्स” ने पंजाब की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। CSDS–NES सर्वे में 58.7% लोगों ने माना कि SAD नेतृत्व वाली सरकार नशे को रोकने में विफल रही। राजनीतिक-गैंगस्टर गठजोड़ और चुनावी फंडिंग में नशे के पैसे के इस्तेमाल की बातें भी सामने आई हैं।
वोटर अब थक चुके हैं — हर पार्टी ने वादे किए, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। अब सवाल यह है कि क्या BJP इस बार एक विश्वसनीय विकल्प बन सकती है, या फिर यह भी केवल एक राजनीतिक दांव साबित होगी।
पंजाब में नशा अब केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। हर पार्टी ने इसे चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, लेकिन अब जनता को असली बदलाव चाहिए। अगले चुनाव में यह तय हो सकता है कि कौन वादों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर असर दिखा पाता है।
पिछली कई पार्टियों की सरकारें बनीं और गईं लेकिन, नशे से मुक्ति सिर्फ वादे तक ही दिख रहा है। 2027 में इस राजनीतिक वादे पर पंजाब की जनता कितना भरोसा करेगी या फिर किस दल को चुनेगी ये तो आने वाला समय ही तय करेगा।
Updated on:
15 Sept 2026 11:14 am
Published on:
15 Sept 2026 11:14 am
