
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
दुनिया धरती के बढ़ते तापमान को खतरे की सीमा के भीतर रोकने की पहली लड़ाई हार चुकी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2 सितंबर 2026 को नैरोबी से जारी नई रिपोर्ट 'लिमिटिंग ओवरशूट' के मुताबिक, अगले कुछ ही वर्षों में वैश्विक तापमान पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि की सीमा पार कर जाएगा। यह स्थिति दशकों तक बनी रह सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तापमान वृद्धि पहले ही करीब 1.4 डिग्री तक पहुंच चुकी है और अब इसे 1.5 डिग्री की सीमा के भीतर रोकने का कोई उपाय नहीं बचा है। इसलिए अब तापमान को 2 डिग्री तक सीमित रखना और इसे धीरे-धीरे वापस नीचे लाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
साल 2015 के पेरिस समझौते में औद्योगिक क्रांति के बाद के तापमान को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने का प्राथमिक लक्ष्य तय किया गया था, क्योंकि माना गया था कि इससे ज्यादा वृद्धि होने पर धरती पर जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि तापमान वृद्धि अगले कुछ वर्षों में 1.5 डिग्री की सीमा पार कर जाएगी और यह हमारी अपनी निष्क्रियता की विरासत है।
UNEP के मुताबिक, अगर तापमान लंबे समय तक 1.5 डिग्री से ऊपर बना रहा, तो इसके कोई अच्छे नतीजे नहीं निकलेंगे। वहीं, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे 'मानवता के लिए लड़ाई' करार देते हुए कहा कि इस गर्मी की भीषण गर्म लहरें, जंगल की आग और जानलेवा बाढ़ आगे आने वाले खतरों की चेतावनी हैं, और अब जरूरत है कि 1.5 डिग्री से ऊपर जाने की अवधि को जितना हो सके उतना छोटा और सीमित रखा जाए।
UNEP रिपोर्ट में दो परिदृश्य पेश किए गए हैं। अगर देश अपनी मौजूदा जलवायु योजनाओं और नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरी तरह लागू करते हैं, तो सदी के मध्य तक तापमान करीब 1.8 डिग्री सेल्सियस के चरम स्तर तक पहुंचकर उसके बाद धीरे-धीरे घटना शुरू हो सकता है। लेकिन अगर मौजूदा नीतियां ही जारी रहीं, तो 2100 तक तापमान करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस (संभावित दायरा 1.9 से 3.6 डिग्री) तक बढ़ सकता है। एक्सेटर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक रिचर्ड बेट्स के मुताबिक यह वास्तविकता की परीक्षा है। हमें अब ज्यादा गर्म दुनिया में जीना सीखना होगा, हालांकि वार्मिंग को सीमित करने के लिए अब भी बहुत कुछ किया जा सकता है।
रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि इस दौर में चरम मौसम से मौतें और बीमारियां बढ़ेंगी, खाद्य उत्पादन घटेगा और पानी की किल्लत और गहराएगी। पश्चिम अंटार्कटिक व ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरें, अमेजन वर्षावन और अटलांटिक की तापमान-नियंत्रक समुद्री धारा जैसे 'टिपिंग पॉइंट' अपरिवर्तनीय रूप से प्रभावित हो सकते हैं। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक रोब जैक्सन ने कहा कि तापमान को वापस नीचे लाना सबसे अच्छी उम्मीद जरूर है, लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है।
भारत को लेकर कुछ दावों की पड़ताल जरूरी है। जर्मनवॉच की क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 रिपोर्ट (नवंबर 2025, COP30 बेलेम) के मुताबिक भारत बीते तीन दशकों (1995-2024) में सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में 9वें स्थान पर है, जिसमें करीब 430 चरम मौसमी घटनाओं में 80 हजार से ज्यादा मौतें और लगभग 170 अरब डॉलर का नुकसान दर्ज हुआ।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दुनिया में सबसे आगे है। UNEP की एमिशन गैप रिपोर्ट 2025 के मुताबिक कुल उत्सर्जन में चीन (15.6 अरब टन) और अमेरिका (5.9 अरब टन) के बाद भारत (4.4 अरब टन) तीसरे स्थान पर है। हां, यह जरूर सही है कि 2024 में पूर्ण मात्रा (absolute) के लिहाज से सबसे ज्यादा उत्सर्जन वृद्धि भारत में ही दर्ज हुई, जबकि प्रतिशत वृद्धि में इंडोनेशिया के बाद भारत दूसरे नंबर पर रहा। साथ ही भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अब भी वैश्विक औसत और विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र में तेज तापमान वृद्धि और हिमनदों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है, जबकि गंगा के मैदानी इलाकों में हीट-स्ट्रेस के साथ मानसूनी बारिश में कमी दर्ज हो रही है। गर्मी के रिकॉर्ड भी टूट रहे हैं। 19 मई 2016 को राजस्थान के फलौदी में 51 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ था, जबकि 2024 में दिल्ली के मुंगेशपुर में 52.3 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंचा। हालांकि इसे उपकरण संबंधी विसंगति भी माना गया था। मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के मुताबिक हिमालय की तलहटी, पूर्वी तट, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में आने वाले समय में हीटवेव के दिन सामान्य से अधिक रहने की आशंका है।
Updated on:
16 Sept 2026 09:32 pm
Published on:
16 Sept 2026 09:32 pm
