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आयुष्मान कार्ड बना, लेकिन कितने लोगों ने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया? कार्ड बनाम वास्तविक इलाज और राज्यों की तस्वीर

Ayushman Bharat PMJAY : आयुष्मान भारत योजना के तहत करोड़ों कार्ड बनने के बाद भी अस्पताल में भर्ती के मामलों में अंतर क्यों है? जानिए आयुष्मान कार्ड बनाम वास्तविक इलाज का राज्यवार विश्लेषण और इसके पीछे के मुख्य कारण।
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Ayushman Card usage analysis

Ayushman Card usage analysis : कितने लोगों ने नहीं किया आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल।

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना यानी AB-PMJAY का उद्देश्य देश के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़े अस्पताल खर्च से बचाना है। योजना के तहत पात्र परिवार को हर साल 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिलता है। लाभार्थी देशभर के सूचीबद्ध अस्पतालों में तय इलाज के लिए कैशलेस और पेपरलेस सुविधा ले सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने करोड़ों आयुष्मान कार्ड बनाए हैं। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है, कार्ड बनना और उसका इस्तेमाल होना, क्या दोनों एक ही बात हैं? जवाब है-नहीं।

फरवरी 2026 तक अप्रैल 2020 से जनवरी 2026 के बीच करीब 35.69 करोड़ आयुष्मान कार्ड बनाए गए थे। वहीं 31 जनवरी 2026 तक निजी अस्पतालों में 5.77 करोड़ अस्पताल में भर्ती के मामले अधिकृत हुए थे, जिनकी कुल राशि करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये थी।

पहली नजर में इन दोनों आंकड़ों की तुलना करके यह लग सकता है कि करोड़ों कार्डधारकों ने योजना का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन यह निष्कर्ष सीधे निकालना सही नहीं होगा।

कार्ड और इलाज में इतना अंतर क्यों?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आयुष्मान कार्ड स्वास्थ्य बीमा जैसा ऐसा कार्ड नहीं है जिसे हर साल इस्तेमाल करना जरूरी हो। यह एक पात्रता दस्तावेज है। जब लाभार्थी को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है और उसका इलाज योजना में शामिल होता है, तब वह इस सुविधा का इस्तेमाल करता है।

यानी अगर किसी व्यक्ति को पांच साल तक अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत ही नहीं पड़ी तो उसका कार्ड बना होने के बावजूद उसने योजना का इस्तेमाल नहीं किया होगा।

दूसरी तरफ, अस्पताल में भर्ती होने की संख्या भी व्यक्तियों की संख्या नहीं है। एक ही लाभार्थी अलग-अलग समय पर एक से ज्यादा बार अस्पताल में भर्ती हो सकता है।

इसलिए 35.69 करोड़ कार्ड और 5.77 करोड़ admissions को घटाकर यह कहना कि “30 करोड़ लोगों ने कभी इलाज नहीं कराया” तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। सरकार भी कार्ड और अस्पताल में भर्ती को अलग-अलग संकेतकों के रूप में रिपोर्ट करती है।

फिर कितने कार्डधारकों ने इस्तेमाल नहीं किया?

इस सवाल का सटीक राष्ट्रीय जवाब सार्वजनिक सरकारी आंकड़ों से नहीं निकाला जा सकता। कारण तीन हैं -

  • पहला, कार्डों की संख्या में परिवार के अलग-अलग पात्र सदस्यों के कार्ड शामिल हो सकते हैं।
  • दूसरा, एक ही लाभार्थी एक से अधिक बार इलाज करा सकता है।
  • तीसरा, योजना का इस्तेमाल केवल अस्पताल में भर्ती होने पर होता है। हर कार्डधारक को हर साल इलाज की जरूरत नहीं पड़ती।

इसलिए सही सवाल यह है कि 'कितने कार्ड बनाए गए और उनके मुकाबले कितने अस्पताल में भर्ती के मामले हुए?' यह तुलना योजना के उपयोग की दिशा समझने में मदद करती है, लेकिन इससे “कितने लोगों ने कभी इस्तेमाल नहीं किया” का सटीक आंकड़ा नहीं मिलता।

फिर कार्ड बनाने पर इतना जोर क्यों?

AB-PMJAY मूल रूप से एक entitlement-based scheme है। इसका मतलब पात्र परिवार योजना में पहले से अधिकार रखता है; उसे बीमारी होने के बाद बीमा खरीदने की जरूरत नहीं होती। सरकार कार्ड इसलिए बनाती है ताकि जब जरूरत पड़े तो अस्पताल में लाभार्थी की पहचान और पात्रता आसानी से सत्यापित की जा सके। यानी कार्ड बनाना योजना की पहुंच बढ़ाने का पहला कदम है।

इसके बाद असली चुनौती आती है क्या जरूरत पड़ने पर मरीज को सही अस्पताल, सही इलाज और कैशलेस सुविधा मिलती है?
यही वह जगह है जहां राज्यों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

राज्यों की तस्वीर अलग-अलग क्यों है?

जुलाई 2024 तक के सरकारी आंकड़ों में ही राज्यों के बीच कार्ड और अस्पताल में भर्ती के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उस समय देश में 34.7 करोड़ से ज्यादा कार्ड बनाए जा चुके थे और 7.37 करोड़ अस्पताल में भर्ती के मामले अधिकृत हुए थे।

कुछ राज्यों में अस्पतालों का नेटवर्क बड़ा है और योजना का उपयोग ज्यादा हुआ है। कुछ राज्यों में कार्ड तो बड़ी संख्या में बने, लेकिन अस्पताल में भर्ती का आंकड़ा अपेक्षाकृत कम रहा।

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में जून 2024 तक करीब 5.11 करोड़ आयुष्मान कार्ड बनाए गए थे और करीब 43.56 लाख अस्पताल में भर्ती के मामले अधिकृत हुए थे।

उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी को देखते हुए कार्डों की संख्या स्वाभाविक रूप से ज्यादा है। लेकिन सिर्फ कार्ड की संख्या देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि इतने करोड़ लोगों ने इलाज नहीं लिया।

राज्य में अस्पतालों का वितरण, ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधा की उपलब्धता और निजी अस्पतालों की भागीदारी उपयोग को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं।

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में जून 2024 तक करीब 4.02 करोड़ कार्ड बनाए गए थे और 42.79 लाख अस्पताल में भर्ती के मामले अधिकृत हुए थे।
यहां भी कार्ड और admissions में बड़ा अंतर दिखाई देता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि करोड़ों कार्ड बेकार हैं। इसका बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का हो सकता है जिन्हें उस अवधि में अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

तमिलनाडु

तमिलनाडु की तस्वीर काफी अलग है। जून 2024 तक करीब 73.59 लाख कार्ड बनाए गए थे, लेकिन अधिकृत अस्पताल में भर्ती के मामले 1.04 करोड़ से ज्यादा थे। यहां admissions की संख्या कार्डों से ज्यादा है। इससे साफ होता है कि कार्ड और इलाज का अनुपात राज्यों में सीधे तुलना करने वाला पैमाना नहीं है।

एक लाभार्थी के एक से ज्यादा admissions हो सकते हैं और कुछ राज्यों में योजना को राज्य की दूसरी स्वास्थ्य योजनाओं के साथ जोड़कर लागू किया गया है।

कर्नाटक

कर्नाटक में जून 2024 तक करीब 1.71 करोड़ कार्ड बनाए गए थे, जबकि अस्पताल में भर्ती के मामले करीब 86.94 लाख थे। यानी यहां भी उपयोग काफी बड़ा रहा।

केरल

केरल में करीब 76.70 लाख कार्ड बनाए गए थे और अस्पताल में भर्ती के मामले करीब 62.65 लाख थे। यह आंकड़ा बताता है कि जहां अस्पतालों की उपलब्धता, स्वास्थ्य सुविधाओं का नेटवर्क और योजना के प्रति जागरूकता बेहतर हो, वहां कार्ड का वास्तविक उपयोग भी ज्यादा हो सकता है।

सिर्फ कार्ड बनाना पर्याप्त क्यों नहीं?

मान लीजिए किसी गांव के 100 परिवारों के कार्ड बन गए। लेकिन नजदीकी सूचीबद्ध अस्पताल 50 किलोमीटर दूर है। ऐसी स्थिति में कार्ड तो मौजूद है, लेकिन बीमारी के समय परिवार के लिए योजना का इस्तेमाल करना आसान नहीं होगा।

इसीलिए योजना की सफलता के लिए तीन चीजें जरूरी हैं-

  • कार्ड + अस्पताल + इलाज
  • अगर कार्ड है लेकिन नजदीक अस्पताल नहीं है, तो उपयोग कम हो सकता है।
  • अगर अस्पताल है लेकिन उसमें जरूरी इलाज उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को दूसरे शहर जाना पड़ सकता है।
  • अगर अस्पताल योजना स्वीकार नहीं करता या मरीज से अतिरिक्त पैसे मांगता है, तो कार्ड होने के बावजूद योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा।

निजी अस्पतालों की भूमिका बहुत बड़ी है

आयुष्मान योजना के तहत सरकारी अस्पतालों के साथ निजी अस्पताल भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। फरवरी 2026 तक निजी अस्पतालों में ही 5.77 करोड़ hospital admissions अधिकृत हो चुके थे और इनकी राशि करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये थी। इससे साफ है कि योजना का बड़ा हिस्सा निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी निर्भर है।

यही कारण है कि किसी राज्य में कार्ड का वास्तविक इस्तेमाल जानने के लिए सिर्फ कार्डों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि वहां कितने अस्पताल सूचीबद्ध हैं, उनमें से कितने सक्रिय रूप से योजना के तहत इलाज कर रहे हैं और कौन-कौन से इलाज उपलब्ध हैं।

क्या कम उपयोग का मतलब योजना असफल है?

जरूरी नहीं। स्वास्थ्य योजना में कम उपयोग के दो बिल्कुल अलग अर्थ हो सकते हैं। पहला- लोग स्वस्थ रहे और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ी। दूसरा- उन्हें इलाज की जरूरत थी लेकिन अस्पताल, दूरी, जानकारी, दस्तावेज या किसी दूसरी वजह से योजना का लाभ नहीं मिला। दोनों स्थितियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

इसलिए किसी राज्य में कम admissions देखकर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि योजना वहां असफल है। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि जिन लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ी, उनमें से कितने लोगों ने आयुष्मान योजना का इस्तेमाल किया।

70 साल से ज्यादा उम्र वालों के लिए नई तस्वीर

अक्टूबर 2024 में सरकार ने AB-PMJAY का विस्तार करके 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से अलग, स्वास्थ्य कवर देने की घोषणा की।

31 दिसंबर 2025 तक इस श्रेणी में 96.73 लाख से ज्यादा Ayushman Vay Vandana Cards बनाए गए थे और 10.33 लाख hospital admissions अधिकृत हुए थे। इन admissions की कुल राशि 2,154.37 करोड़ रुपये थी।

यहां भी वही बात लागू होती है। करीब 97 लाख कार्ड बनने और 10.33 लाख admissions होने का मतलब यह नहीं कि बाकी लोग योजना से वंचित हैं। बहुत से वरिष्ठ नागरिकों को उस अवधि में अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ी होगी।

असली चुनौती है 'कार्ड से इलाज तक'

आयुष्मान योजना के शुरुआती वर्षों में सरकार के सामने बड़ी चुनौती थी कि पात्र परिवारों की पहचान हो और उनका कार्ड बने। अब चुनौती बदल रही है। अब सवाल है-

  • कार्ड बनने के बाद क्या लाभार्थी को पता है कि इसका इस्तेमाल कहां करना है?
  • क्या उसके जिले में सूचीबद्ध अस्पताल मौजूद है?
  • क्या उस अस्पताल में जरूरी इलाज उपलब्ध है?
  • क्या अस्पताल कैशलेस इलाज करता है?
  • और जरूरत पड़ने पर मरीज को बिना जेब से पैसा खर्च किए इलाज मिल पाता है?
  • यही सवाल योजना के वास्तविक प्रभाव को तय करेंगे।