8 अगस्त 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

जनगणना और परिसीमन से यूपी-बिहार को कितना फायदा? दक्षिण भारत क्यों कर रहा विरोध? आम वोटर पर क्या पड़ेगा असर?

Census Delimitation Impact : जनगणना और परिसीमन से उत्तर प्रदेश और बिहार को अधिक लोकसभा सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिण भारत विरोध क्यों कर रहा है? जानिए इस बदलाव का आम वोटर पर क्या असर पड़ेगा।
3 min read
Google source verification
Census Delimitation Impact

Census Delimitation Impact

भारत में जनगणना और परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। इसकी वजह यह है कि अगले कुछ वर्षों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करने पर चर्चा तेज हो गई है। इस बहस का सबसे बड़ा सवाल है क्या उत्तर प्रदेश और बिहार को ज्यादा राजनीतिक ताकत मिलेगी और क्या दक्षिण भारत के राज्यों का प्रभाव कम हो जाएगा?

सबसे पहले समझिए, परिसीमन क्या है?

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हर सांसद लगभग समान संख्या की आबादी का प्रतिनिधित्व करे। भारत में आखिरी बड़ा परिसीमन 2002-08 के बीच हुआ था, लेकिन राज्यों को मिलने वाली लोकसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर लंबे समय से लगभग स्थिर है।

यूपी और बिहार को कितना फायदा हो सकता है?

उत्तर प्रदेश और बिहार देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में हैं। इसलिए यदि भविष्य में सीटों का बंटवारा नई जनसंख्या के आधार पर होता है, तो इन राज्यों को सबसे बड़ा लाभ मिलने की संभावना मानी जाती है। PRS Legislative Research के एक प्रोजेक्शन के अनुसार, यदि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है और आबादी के अनुपात को ज्यादा महत्व दिया जाता है, तो बिहार की सीटें 40 से बढ़कर लगभग 69 तक जा सकती हैं। उत्तर प्रदेश भी सबसे बड़ा लाभ पाने वाले राज्यों में शामिल रहेगा।

हालांकि 2026 में केंद्र सरकार ने यह तर्क दिया है कि सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर सभी राज्यों को अतिरिक्त सीटें दी जा सकती हैं, ताकि किसी राज्य की हिस्सेदारी में बड़ा नुकसान न हो। सरकार के अनुसार 543 सीटों वाली लोकसभा को बढ़ाकर लगभग 816 सीटों तक ले जाने के मॉडल पर विचार किया गया है।

दक्षिण भारत के राज्य विरोध क्यों कर रहे हैं?

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि उन्होंने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि सीटों का बंटवारा केवल आबादी के आधार पर हुआ, तो तेजी से आबादी बढ़ाने वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं और दक्षिणी राज्यों का सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव घट सकता है।

दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफल बनाया, उन्हें उसकी 'सजा' नहीं मिलनी चाहिए। यही वजह है कि तमिलनाडु समेत कई राज्यों में परिसीमन को लेकर राजनीतिक विरोध देखने को मिला है।

केंद्र सरकार क्या कह रही है?

केंद्र सरकार का दावा है कि दक्षिण भारत के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा। सरकार के अनुसार सीटों की कुल संख्या बढ़ाने पर दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी और संसद में उनकी हिस्सेदारी लगभग समान बनी रह सकती है। गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि दक्षिण भारत की मौजूदा 129 सीटें बढ़कर लगभग 195 तक जा सकती हैं और उनका प्रतिशत हिस्सा लगभग 24% के आसपास बना रहेगा। आम वोटर पर इसका क्या असर होगा? परिसीमन का सबसे सीधा असर वोटर पर पड़ेगा।

संभावित बदलाव

  • कई लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएं बदल सकती हैं।
  • आपका गांव या शहर किसी दूसरे संसदीय क्षेत्र में जा सकता है।
  • कुछ सीटें समाप्त हो सकती हैं और नई सीटें बन सकती हैं।
  • सांसदों की संख्या बढ़ने से प्रतिनिधित्व अधिक स्थानीय हो सकता है।
  • महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ सकती है।

क्या यह सिर्फ सीटों का मामला है?

नहीं। यह भविष्य की राजनीतिक ताकत का सवाल भी है। अगर यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों की सीटें तेजी से बढ़ती हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में इन राज्यों का प्रभाव और बढ़ सकता है। वहीं दक्षिण भारत चाहता है कि जनसंख्या नियंत्रण और आर्थिक योगदान जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया जाए।

सवाल-जवाब से समझें पूरा मामला

❓ सवाल✅ जवाब
परिसीमन क्या है?निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों का पुनर्निर्धारण
किसे फायदा हो सकता है?अधिक आबादी वाले राज्यों, खासकर यूपी और बिहार को
दक्षिण भारत क्यों चिंतित है?राजनीतिक हिस्सेदारी घटने की आशंका
सरकार का दावा क्या है?सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा
आम वोटर पर असर?सीटों की सीमाएं बदल सकती हैं, प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है

जनगणना और परिसीमन सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत की भविष्य की राजनीतिक शक्ति-संतुलन को तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। यूपी और बिहार को इससे बड़ा लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है, जबकि दक्षिण भारत अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर सतर्क है। आने वाले वर्षों में यही बहस तय करेगी कि नई लोकसभा में किस राज्य की आवाज कितनी मजबूत होगी।