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दुर्गा भाभी: जिसने भगत सिंह को अंग्रेजों की आंखों के सामने निकाला, फिर खुद उठा ली बंदूक

Durgawati Devi Durga Bhabhi : जानिए क्रांतिकारी दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) की पूरी कहानी, जिन्होंने भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित निकाला, अपने गहने बेचकर आंदोलन की मदद की और खुद अंग्रेजों पर गोलियां चलाईं।
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Durga Bhabhi

Durga Bhabhi : जानें कौन थी दुर्गा भाभी।

जब भगत सिंह ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर छोड़ने की तैयारी की, तब उनके साथ एक महिला थी। वह महिला उनकी पत्नी बनकर उनके साथ ट्रेन में बैठी और अंग्रेजों की आंखों के सामने से उन्हें सुरक्षित निकाल ले गई। यह महिला थीं-दुर्गावती देवी, जिन्हें क्रांतिकारी प्यार और सम्मान से ‘दुर्गा भाभी’ कहते थे। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ भगत सिंह को बचाने तक सीमित नहीं है। वह खुद हथियार उठाने वाली, क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद देने वाली और अंग्रेजी पुलिस की आंखों में खटकने वाली सक्रिय क्रांतिकारी थीं।

भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका अक्सर कुछ चुनिंदा नामों तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में ऐसी महिलाएं भी थीं, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर संदेश पहुंचाने, आश्रय देने और आर्थिक मदद करने से लेकर खुद हथियार उठाने तक का जोखिम लिया। दुर्गा भाभी इसी श्रेणी की एक असाधारण क्रांतिकारी थीं।

कौन थीं दुर्गा भाभी?

दुर्गा भाभी का वास्तविक नाम दुर्गावती देवी था। उनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 को तत्कालीन इलाहाबाद क्षेत्र में हुआ था और उनका निधन 15 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में हुआ। कम उम्र में ही उनका विवाह भगवती चरण वोहरा से हुआ, जो आगे चलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल हुए। भगवती चरण वोहरा का घर क्रांतिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया था और यहीं से दुर्गावती देवी भी धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों के करीब आती गईं।

HSRA के क्रांतिकारी उन्हें सम्मान से ‘भाभी’ कहते थे। यही संबोधन आगे चलकर उनकी पहचान बन गया और वह पूरे क्रांतिकारी आंदोलन में ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से मशहूर हुईं।

क्रांतिकारी आंदोलन में कैसे आईं?

दुर्गा भाभी का जुड़ाव सिर्फ अपने पति के कारण नहीं था। उन्होंने खुद क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। वह नौजवान भारत सभा से जुड़ीं और भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद तथा दूसरे क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उनका क्रांतिकारियों पर काफी प्रभाव था और वह HSRA की गतिविधियों में सक्रिय थीं।

उस समय किसी महिला का इस तरह के गुप्त क्रांतिकारी संगठन से जुड़ना अपने आप में बड़ा जोखिम था। अंग्रेजी पुलिस लगातार क्रांतिकारियों की तलाश कर रही थी। ऐसे माहौल में महिलाओं की मौजूदगी कई बार क्रांतिकारियों के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी उपयोगी साबित होती थी। लेकिन, दुर्गा भाभी केवल किसी की ‘मददगार’ बनकर नहीं रहीं। धीरे-धीरे वह खुद क्रांतिकारी कार्रवाइयों का हिस्सा बनने लगीं।

सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को कैसे बचाया?

दुर्गा भाभी का नाम सबसे ज्यादा भगत सिंह को लाहौर से निकालने की घटना से जुड़ा है। 1928 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने इसका बदला लेने का फैसला किया। उनका निशाना पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट था, लेकिन पहचान की गलती में सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स मारा गया।

सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर में अंग्रेजी पुलिस ने बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू कर दिया। भगत सिंह के लिए लाहौर से निकलना बेहद मुश्किल था। यहीं दुर्गा भाभी की भूमिका सामने आती है।

उन्होंने भगत सिंह के साथ एक विवाहित महिला के रूप में यात्रा की, जबकि भगत सिंह ने अपना रूप बदल लिया था। इस यात्रा में राजगुरु ने उनके नौकर का रूप धारण किया। इस तरह तीनों लाहौर से निकलने में सफल रहे।

इस पूरी योजना में सबसे बड़ा जोखिम दुर्गा भाभी ने उठाया था। अगर अंग्रेज पुलिस ने उन्हें पहचान लिया होता तो भगत सिंह की गिरफ्तारी लगभग तय थी।

यानी भगत सिंह को बचाने वाली इस योजना में दुर्गा भाभी सिर्फ साथ चलने वाली महिला नहीं थीं, बल्कि पूरे भेष और यात्रा योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।

अपने गहने बेचकर क्रांतिकारियों की मदद

दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारी आंदोलन में सिर्फ अपना साहस ही नहीं लगाया, बल्कि अपनी निजी संपत्ति भी लगा दी। भारत सरकार के अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उन्होंने अपने करीब 3,000 रुपये मूल्य के आभूषण बेचकर भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के प्रयासों के लिए आर्थिक सहायता दी।

आज के समय में 3,000 रुपये की रकम छोटी लग सकती है, लेकिन 1920 और 1930 के दशक में यह एक बड़ी रकम थी। इस घटना से समझा जा सकता है कि उनके लिए स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ विचार नहीं था। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति तक आंदोलन के लिए लगा दी थी।

बम बनाने की गतिविधियों में भी शामिल

दुर्गा भाभी की भूमिका केवल संदेश पहुंचाने या क्रांतिकारियों को छिपाने तक सीमित नहीं रही। भगवती चरण वोहरा और दूसरे क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। दिल्ली में एक ऐसे ठिकाने का इस्तेमाल किया गया जहां बम बनाने की गतिविधियां चलती थीं और उसे सामान्य गतिविधि के आवरण में छिपाया गया था। भारत सरकार के उपलब्ध अभिलेख HSRA के बम निर्माण और उसके गुप्त नेटवर्क का उल्लेख करते हैं। यह वही दौर था जब क्रांतिकारी संगठन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की तैयारी कर रहा था।

पति की मौत के बाद और ज्यादा सक्रिय हुईं

दुर्गा भाभी के जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत आघात 28 मई 1930 को आया। उनके पति भगवती चरण वोहरा लाहौर के पास रावी नदी के किनारे एक बम का परीक्षण करते समय विस्फोट में मारे गए। वह भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना के लिए बम का परीक्षण कर रहे थे।

पति की मौत के बाद दुर्गा भाभी के सामने दो रास्ते थे या तो वह अपने छोटे बच्चे के साथ सामान्य जीवन में लौट जाएं या फिर क्रांतिकारी आंदोलन को जारी रखें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

इतिहासकार कामा मैकलीन के शोध के अनुसार, पति की मृत्यु के बाद दुर्गा देवी क्रांतिकारी गतिविधियों से पीछे हटने के बजाय और अधिक सक्रिय हुईं। उन्होंने पंजाब में संगठनात्मक गतिविधियों में भी भूमिका निभाई।

अंग्रेज अफसर पर हमला करने की कोशिश

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद क्रांतिकारियों में भारी आक्रोश था। दुर्गा भाभी ने सर विलियम हेली, जो पंजाब के पूर्व गवर्नर थे, को निशाना बनाने की योजना में हिस्सा लिया। लेकिन उनके ठिकाने की सुरक्षा बेहद कड़ी थी।

इसके बाद योजना बदली गई और 8 अक्टूबर 1930 की रात मुंबई के लैमिंगटन रोड इलाके में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी और उसकी पत्नी पर गोलीबारी की गई। दोनों घायल हुए। शोध के अनुसार इस कार्रवाई में दुर्गा देवी भी शामिल थीं और ब्रिटिश प्रशासन इस बात से खास तौर पर चौंका कि हमलावरों में एक महिला भी थी।

यह घटना दिखाती है कि दुर्गा भाभी सिर्फ क्रांतिकारियों के लिए सुरक्षित ठिकाना या संदेशवाहक नहीं थीं। वह जरूरत पड़ने पर खुद हथियार उठाने को भी तैयार थीं।

अंग्रेजी पुलिस की नजर में क्यों खतरनाक थीं?

दुर्गा भाभी की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि अंग्रेज पुलिस उन्हें सामान्य महिला समझकर नजरअंदाज कर सकती थी। वह कभी पत्नी, कभी मां और कभी सामान्य महिला की भूमिका में यात्रा करतीं, लेकिन उसी के पीछे क्रांतिकारी गतिविधियां चल रही होती थीं।यही वजह थी कि वह अंग्रेजी खुफिया तंत्र के लिए मुश्किल लक्ष्य बन गईं।

इतिहासकारों के अनुसार, चंद्रशेखर आजाद और दूसरे क्रांतिकारियों ने महिलाओं की भूमिका को भी अधिक महत्व देना शुरू किया। महिलाओं को आंदोलन में शामिल करने और उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया में दुर्गा देवी जैसी महिलाओं का अनुभव महत्वपूर्ण था।

गिरफ्तारी और जेल

क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण दुर्गा भाभी लगातार ब्रिटिश पुलिस के निशाने पर रहीं। बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल की सजा भुगतनी पड़ी। सरकारी स्रोत उनके लिए तीन वर्ष के कारावास का उल्लेख करते हैं।

उनकी गिरफ्तारी के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उन्होंने जेल से बाहर आने के बाद भी सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना जारी रखा। 1930 के दशक में वह कांग्रेस की गतिविधियों से भी जुड़ीं और कुछ समय के लिए संगठनात्मक भूमिका निभाई।

आजादी के बाद क्या किया?

यह दुर्गा भाभी की कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित हिस्सा है। आजादी के बाद वह किसी बड़े राजनीतिक पद की दौड़ में नहीं गईं। उन्होंने अपेक्षाकृत शांत जीवन चुना और लखनऊ में बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल चलाया।

यानी जिस महिला ने युवावस्था में अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियार उठाया था, उसी ने स्वतंत्र भारत में बच्चों को शिक्षा देने का काम किया।

उनका जीवन इस मायने में भी अलग है कि आजादी के बाद उन्होंने अपने क्रांतिकारी अतीत को भुनाकर राजनीतिक पहचान बनाने के बजाय अपेक्षाकृत गुमनाम जीवन बिताया।

फिर इतिहास में उनका नाम इतना कम क्यों?

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा की कहानियों में लंबे समय तक महिलाओं की भूमिका सीमित रूप में सामने आई। क्रांतिकारी आंदोलन में भी महिलाओं को अक्सर केवल सहयोगी के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन दुर्गा भाभी का जीवन इस धारणा को चुनौती देता है।

उन्होंने क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद दी, भगत सिंह को सुरक्षित निकालने में निर्णायक भूमिका निभाई, गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया, बम निर्माण के नेटवर्क से जुड़ीं और खुद ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई में शामिल हुईं। इसलिए उन्हें सिर्फ ‘भगत सिंह को बचाने वाली महिला’ कह देना उनके योगदान को बहुत छोटा कर देना होगा।

दुर्गा भाभी की कहानी हमें क्या बताती है?

दुर्गा भाभी की कहानी आजादी के आंदोलन का वह अध्याय है जिसमें एक महिला ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक बंधनों और ब्रिटिश पुलिस के खतरे-तीनों के बीच क्रांतिकारी रास्ता चुना।

वह किसी बड़ी सेना की कमांडर नहीं थीं। उनके हाथ में कोई राजनीतिक पद नहीं था। लेकिन जब क्रांतिकारियों को भरोसेमंद साथी की जरूरत थी, उन्होंने साथ दिया। जब भगत सिंह को लाहौर से निकालना था, वह जोखिम उठाकर उनके साथ चलीं। जब आंदोलन को पैसों की जरूरत थी, उन्होंने अपने गहने तक बेच दिए। और जब अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती देने का समय आया, तो उन्होंने हथियार उठाने से भी पीछे कदम नहीं खींचा।

दुर्गा भाभी इसलिए सिर्फ भगत सिंह की साथी या किसी क्रांतिकारी की पत्नी नहीं थीं। वह खुद एक स्वतंत्र पहचान रखने वाली क्रांतिकारी थीं। 15 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में उनका निधन हुआ। उनकी उम्र 92 वर्ष थी।