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क्या खाया करते थे हमारे पूर्वज? वेदों से खुलती है भारतीय भोजन की कहानी

सोचिए, अगर आपके खाने की थाली में इतिहास की परतें छिपी हों! प्राचीन भारतीय ग्रंथों से जुड़े अनाज और पकवानों की इस अद्भुत यात्रा में चलें, जहां हर निवाला एक कहानी सुनाता है और संस्कृति की गहराई को उजागर करता है।
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 17, 2026

food history in veda

प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में फूड ट्रेंड्स की कहानी एक स्वाद-भरी यात्रा है, जहां अनाज, पकवान और भोजन के प्रतीक समय के साथ बदलते रहे हैं। हम उस यात्रा की तह तक ले जाएंगे — वेदों से उपनिषदों तक, यजुर्वेद से ब्राह्मण ग्रंथों तक — और बताएगा कि कैसे भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, आध्यात्म और सामाजिक पहचान का हिस्सा रहा है।

प्राचीन अनाज और पकवान

ऋग्वेद में 'यव' शब्द का प्रयोग अनाजों के लिए किया गया है, जो आधुनिक समय में केवल जौ के लिए प्रयुक्त होता है, लेकिन उस समय गेहूं और जौ दोनों को शामिल करता था। उस युग में चावल का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन अनाज से बने केक - जैसे 'पाक्ति', 'पुरोडासा', 'अपूपा' - पूजा और भोजन दोनों में प्रयुक्त होते थे।

यजुर्वेद में चावल, गेहूं, जौ, दालें और तिल जैसे खाद्य पदार्थों का उल्लेख मिलता है।

'ओडना' (उबला चावल), 'यवक' (दूध में उबला जौ), और विभिन्न दलिया प्रकारों का वर्णन मिलता है। साथ ही, कमल की जड़, ककड़ी, लौकी जैसी सब्जियों का भी उल्लेख मिलता है, और खजूर, बेर, बेल जैसे फल यजुर्वेद में पाए जाते हैं।

आम का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण (लगभग 8वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है, जिसे इसकी वैदिक कालीन महत्ता का प्रमाण माना जाता है।

भोजन का आध्यात्मिक अर्थ

तैत्तिरीय उपनिषद की भृगुवल्ली में भोजन (अन्न) को जीवन के मूल स्रोत के रूप में स्थापित किया गया है। इसमें स्पष्ट कहा गया है -

"अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते", यानी अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न पर ही जीवित रहते हैं।

साथ ही यह भी सिखाया गया है - "अन्नं न निन्द्यात्, अन्नं बहु कुर्वीत" यानी अन्न की निंदा मत करो और उसका प्रचुर मात्रा में सृजन करो। यह विचार भोजन को केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि सृष्टि और जीवन-चक्र के आधार के रूप में प्रस्तुत करता है, और भोजन को जीवन तथा आध्यात्म से गहराई से जोड़ता है।

शाकाहार, मिताहार और सामाजिक बदलाव

हिंदू धर्मग्रंथों में शाकाहार का उल्लेख मिलता है - विशेषकर शाकाहार और अहिंसा का प्रभाव उपनिषदों और तिरुक्कुराल जैसे ग्रंथों में स्पष्ट होता है। तिरुक्कुराल में मिताहार (मात्रा में भोजन) को सद्गुण माना गया है - "पाचन ठीक हो और भूख हो तो सावधानी से भोजन करो" जैसे वाक्यांशों में यह स्पष्ट है।

खाद्य-विविधता और सामाजिक परिप्रेक्ष्य

वेदों में पशु बलि और मांसाहार का उल्लेख भी मिलता है - यज्ञों में पशु बलि दी जाती थी और उसका मांस यज्ञ में शामिल लोगों द्वारा खाया जाता था। यह बताता है कि प्रारंभिक सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं में मांसाहार का स्थान था, जो बाद में अहिंसा और शाकाहार की धारणा के प्रभाव से बदल गया।

खाद्य-विज्ञान और आयुर्वेद

आयुर्वेदिक ग्रंथों में भोजन को केवल स्वाद या ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि औषधीय और जीवनशैली का हिस्सा माना गया। जैसे 'अनुपान' (दवा के साथ लिया जाने वाला पेय), 'पथ्य' (उपयुक्त भोजन), और 'द्रव्य' (पदार्थ) जैसी तकनीकी श्रेणियां हैं, जो भोजन को चिकित्सा और स्वास्थ्य के संदर्भ में परिभाषित करती हैं। यह दिखाता है कि भोजन और स्वास्थ्य का संबंध प्राचीन भारतीय सोच में गहरा था।

खाद्य-विकास का सामाजिक इतिहास

एक सामाजिक-ऐतिहासिक समीक्षा बताती है कि भारतीय भोजन का विकास चार मुख्य चरणों में हुआ - प्रागैतिहासिक, वैदिक, मुगल और यूरोपीय उपनिवेश काल। वैदिक युग में धार्मिक ग्रंथों ने भोजन की आदतों को प्रभावित किया, जैसे अनाज, दालें, घी, शहद आदि का उपयोग। बाद के युगों में नए मसाले, पकवान और खाना पकाने की विधियां शामिल हुईं।

पुराने पाकशास्त्र और ग्रंथ

17वीं शताब्दी (लगभग 1650-1710 ई.) में रघुनाथसूरी द्वारा रचित 'भोजन कुतूहल' नामक ग्रंथ में प्राचीन और मध्यकालीन पाकशास्त्रों का विवरण मिलता है। तंजावुर के मराठा शासक एकोजीराव भोसले की पत्नी रानी दीपांबिका के संरक्षक रहे रघुनाथसूरी ने इसमें 'पाकाधिकार', 'पाकदर्पण', 'व्यंजनवर्ग' जैसे कई प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख किया है, जो उस समय के भोजन और पाक कला की जानकारी देते हैं।

वायरल रेसिपी और वैदिक परंपरा

आज जब हम स्ट्रीट फूड, कैफे कल्चर और वायरल रेसिपी की बात करते हैं, तो यह जानना दिलचस्प है कि हमारी भोजन संस्कृति की जड़ें कितनी पुरानी और विविध हैं। वैदिक अनाजों से बने केक, मिताहार की अवधारणा, भोजन का आध्यात्मिक महत्व - ये सभी आज के फूड ट्रेंड्स में एक गहरा आधार रखते हैं।

उदाहरण के लिए, मिलेट्स (ज्वार, बाजरा) का पुनरुद्धार आज स्वास्थ्य और पारंपरिक स्वाद के चलते हो रहा है - यह वैदिक युग के अनाजों की याद दिलाता है।

स्वाद और सीख

प्राचीन ग्रंथों से हमें यह सीख मिलती है कि भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और आध्यात्म का हिस्सा रहा है। मिताहार, स्थानीय अनाजों का उपयोग, भोजन का सम्मान - ये आज भी प्रासंगिक हैं। अगली बार जब आप कोई स्ट्रीट फूड या पारंपरिक पकवान चखें, तो सोचिए कि उसकी जड़ें कितनी पुरानी और कितनी समृद्ध हैं।

यदि आप चाहें, तो अपने शहर या गांव के किसी पारंपरिक पकवान की कहानी जानने की कोशिश करें - उसमें कौन-कौन से अनाज, मसाले, विधियां शामिल हैं, और क्या वे वैदिक या मध्यकालीन ग्रंथों से जुड़ते हैं? इस तरह आप अपने स्वाद के साथ इतिहास को भी जी सकते हैं।

इस तरह, प्राचीन ग्रंथों में छिपे फूड ट्रेंड्स सिर्फ पुरानी बातें नहीं, बल्कि आज की स्वाद-भरी दुनिया के लिए प्रेरणा और पहचान का स्रोत हैं।