
Future of IVF in India:जब IVF से जन्मा बच्चा पूछेगा अपनी जेनेटिक पहचान! (AI creative)
Future of IVF in India: अगर कंसेप्शन में डोनर स्पर्म या डोनर एग इस्तेमाल हुआ था, तो यह सवाल सिर्फ माता-पिता के लिए नहीं, बल्कि आने वाले समय में पूरी व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। क्योंकि IVF की अगली कहानी सिर्फ लेबोरेट्री में बनने वाले भ्रूण की नहीं है। यह डीएनए (DNA), निजता (privacy), बच्चे के अधिकार, डोनर की पहचान और परिवार की बदलती परिभाषा की कहानी भी है।
भारत में Assisted Reproductive Technology को नियंत्रित करने के लिए ART (Regulation) Act, 2021 लागू है। इसमें ART clinics और ART banks का रजिस्ट्रेशन, इंफॉर्म्ड कंसेंट, रेकॉर्ड्स, gamete और भ्रूण स्टोरेज, donor gametes तथा बच्चे के अधिकारों से जुड़े प्रावधान हैं। कानून 25 जनवरी 2022 से लागू हुआ। लेकिन कानून बन जाने का मतलब यह नहीं कि हर भविष्य के सवाल का जवाब मिल गया है।
मिसाल के लिए डोनर कंसेप्शन में आज सबसे बड़ा वैश्विक सवाल है, क्या बच्चे को अपने बायलॉजिकल या जेनेटिक पेरेंट के बारे में जानने का अधिकार होना चाहिए? भारत की मौजूदा व्यवस्था डोनर की confidentiality को महत्वपूर्ण मानती है। दूसरी तरफ दुनिया के कुछ देशों ने धीरे-धीरे donor anonymity से दूर जाना शुरू कर दिया है।
ब्रिटेन इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। UK में 1 अप्रैल 2005 से लाइसेंस्ड क्लिनिक्स में स्पर्म, एग और भ्रूण डोनर्स के लिए anonymous donation की व्यवस्था खत्म कर दी गई। ऐसे दान से जन्मे योग्य बच्चे 18 साल की उम्र में डोनर की पहचान संबंधी जानकारी मांग सकते हैं। 16 साल की उम्र से उन्हें डोनर की कुछ non-identifying जानकारी भी मिल सकती है।
इस बदलाव का असर पहली बार 2023 में दिखाई दिया, जब 2005 के बाद के identifiable donors से कंसीव लोगों की पहली पीढ़ी 18 वर्ष की उम्र में पहुंची। यानी ब्रिटेन ने एक बड़ा सवाल उठाया, डोनर ने जेनेटिक मटेरियल दिया था, लेकिन उस जेनेटिक हिस्ट्री जानने का अधिकार आखिर किसका है, डोनर का या बच्चे का?
यहां टेक्नोलॉजी ने कहानी और बदल दी। आज घर बैठे जेनेटिक एनसेस्ट्री यानी वंशावली और DNA मेचिंग सर्विसेज का इस्तेमाल किया जा सकता है। UK की Human Fertilisation and Embryology Authority (HFEA) खुद चेतावनी देती है कि होम DNA टेस्टिंग के जरिए डोनर की पहचान सामने आ सकती है। भले ही डोनर ने उस समय anonymity की उम्मीद की हो। किसी क्लोज जेनेटिक रिलेटिव के डेटाबेस में मौजूद होने से भी पहचान का रास्ता खुल सकता है।
इसका मतलब है कि भविष्य में कानून किसी डोनर की पहचान को कॉन्फिडेंशियल रखे, फिर भी DNA technology उस anonymity को कमजोर कर सकती है। भारत के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण सवाल है।
क्योंकि आने वाले वर्षों में अगर भारतीय डोनर-कंसीव्ड बच्चे भी बड़े पैमाने पर कमर्शियल DNA टेस्टिंग का इस्तेमाल करने लगे, तो जेनेटिक रिश्तों की खोज कानूनी रजिस्ट्री से बाहर भी संभव हो सकती है।
ऑस्ट्रेलिया के Victoria राज्य ने डोनर केंसेप्शन के लिए सेंट्रल रजिस्टर बनाया है। अगस्त 2026 में अपडेटेड सरकारी जानकारी के अनुसार यह रजिस्टर विक्टोरिय में डोनर कंसेप्शन से जुड़े ट्रीटमेंट रेकॉर्ड्स रखता है और डोनर-कंसीव्ड व्यक्ति अपने रेकॉर्ड्स के बारे में जानकारी मांग सकता है। पहचान संबंधी जानकारी जारी करने की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि डोनेशन किस समय हुआ और उस समय कौन सा कानून लागू था।
यह मॉडल दिखाता है कि कुछ समाज डोनर कंसेप्शन को केवल private medical treatment मानने के बजाय एक ऐसी lifelong identity issue के रूप में देखने लगे हैं, जिसका रेकॉर्ड भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नहीं। भारत की सामाजिक परिस्थितियां ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया से अलग हैं। यहां परिवार, biological lineage, रिश्तेदारी, कास्ट और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे मुद्दे रिप्रोडक्टिव निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। इसीलिए भारत में donor conception को लेकर आने वाला बदलाव केवल कानून से तय नहीं होगा। परिवार बच्चों को उनकी genetic origin के बारे में कब और कैसे बताएंगे, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
आज कई परिवार डोनर कंसेप्शन को निजी मामला मान सकते हैं। लेकिन अगर बच्चा भविष्य में DNA टेस्टिंग से अपनी जेनेटिक हिस्ट्री खोज ले तो परिवार के सामने एक बिल्कुल अलग स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए भविष्य का बड़ा सवाल शायद यह नहीं होगा कि “IVF से बच्चा हो सकता है या नहीं?”
बल्कि यह होगा, “बच्चे को उसके जन्म की पूरी जेनेटिक कहानी कब, कैसे और किस अधिकार के साथ बताई जाए?”
भविष्य में fertility प्रीजर्वेशन, फ्रोजन एग्स और भ्रूण, डोनर कंसेप्शन, जेनेटिक टेस्टिंग और बेहतर भ्रूण चुनाव जैसी तकनीकें रिप्रोडक्टिव चॉइस को और बढ़ा सकती हैं। लेकिन यहां सावधानी जरूरी होगी, किसी technology के उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं कि वह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित, सस्ती या नैतिक रूप से स्वीकार्य भी होगी।
WHO के अनुसार दुनिया में लगभग हर छह में एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में इन्फर्टिलिटी का अनुभव करता है। संगठन ने फर्टिलिटी केयरको एफॉर्डेबल और एक्सेसिबल बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
यानी भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक विकसित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होगी कि उसका फायदा सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित न रह जाए।
IVF ने पहले ही एक पुरानी धारणा बदल दी है कि बच्चे के जन्म का रास्ता केवल प्राकृतिक कंसेप्शन से होकर जाता है। डोनर स्पर्म ने जेनेटिक पिता और सामाजिक पिता के बीच अंतर दिखाया।
डॉनर एग ने जेनेटिक मां और gestational mother की अवधारणाओं को अलग किया। फ्रोजन भ्रूणों ने कंसेप्शन और प्रेग्नेंसी के बीच समय का अंतर पैदा किया। और DNA टेक्नोलॉजी अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या जेनेटिक पहचान को हमेशा छिपाकर रखा जा सकता है?
इसलिए भारत में IVF की अगली कहानी शायद किसी नई मशीन या लेबोरेट्री टेक्नीक की नहीं होगी। यह कहानी होगी उस बच्चे की, जो एक दिन बड़ा होकर पूछ सकता है, “मैं कौन हूं, मेरा जेनेटिक इतिहास क्या है और मुझे अपनी कहानी जानने का कितना अधिकार है?” यही वह जगह है जहां IVF की medical journey खत्म होकर भारत के बदलते समाज की कहानी शुरू होती है।
Updated on:
26 Aug 2026 04:55 pm
Published on:
26 Aug 2026 04:55 pm
