
IVF Law in india: जानिए क्या कहता है कानून, क्या है बच्चे और डोनर के अधिकार? (AI Creative)
IVF Law in India: मान लीजिए एक दंपती कई साल से बच्चे का इंतजार कर रहा है। इलाज के बाद डॉक्टर बताते हैं कि IVF ही रास्ता है। फिर किसी कारण से donor sperm या donor egg की जरूरत पड़ती है। परिवार के मन में एक साथ कई सवाल उठ सकते हैं, क्या यह बच्चा कानूनी रूप से हमारा ही माना जाएगा? Donor बाद में कोई दावा कर सकता है? बच्चे को अपने genetic parent के बारे में पता चलेगा? और अगर clinic से कोई गड़बड़ी हो जाए तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
ये सवाल केवल कानून की किताब में लिखे हुए शब्द नहीं हैं। जिस परिवार ने सालों इंतजार के बाद बच्चे की उम्मीद पकड़ी है, उसके लिए ये जिंदगी बदल देने वाले सवाल हैं।
भारत में Assisted Reproductive Technology (ART) को क्रियान्वित करने के लिए Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 बनाया गया। यह कानून 25 जनवरी 2022 से लागू हुआ और इसके साथ ART clinics तथा ART banks के कामकाज के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार हुआ।
यह शायद donor-assisted IVF से गुजरने वाले परिवारों की सबसे बड़ी चिंता होती है। ART Act की Section 31 कहती है कि ART से जन्मा बच्चा कमिशनिंग कपल का बायोलॉजिकल चाइल्ड माना जाएगा और उसे उस कपल के प्राकृतिक संतान से मिलने वाले सभी अधिकार और विशेषआधिकार प्राप्त होंगे। इसी section के तहत donor अपने gamete से पैदा होने वाले बच्चे पर पेरेंटल राइट्स छोड़ देता है।
इसका सीधा मतलब है, कि जिस परिवार ने कानूनी रूप से ART प्रक्रिया अपनाई है, उसके बच्चे की parental identity donor के नाम से नहीं जुड़ती।
Kerala High Court ने 2025 के एक मामले में Section 31 को लागू करते हुए इसी principle को दोहराया कि donor को बच्चे पर parental rights नहीं होते। यानी जिस पिता ने donor sperm के कारण जैविक योगदान दिया, वह कानून की नजर में उस बच्चे का कानूनी पेरेंट नहीं बन जाता।
कानून ने donor और recipient के बीच सीधा निजी संपर्क रोकने के लिए व्यवस्था बनाई है। ART Rules, 2022 के donor consent form में स्पष्ट है कि डोनर और प्राप्तकर्ता के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क नहीं होना चाहिए और donor की पहचान recipient या donor gamete से पैदा हुए बच्चे के सामने disclose नहीं की जानी है। Donor यह भी स्वीकार करता है कि उसे resulting offspring पर कोई parental rights नहीं होंगे।
यानी भारत का मौजूदा regulatory framework privacy और donor anonymity को काफी महत्व देता है। लेकिन यही जगह भविष्य की एक बड़ी बहस पैदा करती है।
ART Act की मौजूदा व्यवस्था में donor की पहचान की confidentiality महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत में donor-conceived व्यक्ति के लिए अपने जेनेटिक पेरेंट की पहचान जानने का सवाल अभी उतना सरल नहीं है जितना कोई पहली नजर में सोच सकता है।
यहीं आधुनिक DNA टेस्टिंग टेक्नोलॉजी भविष्य में इस व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर सकती है। क्योंकि आज जेनेटिक टेस्टिंग और फेमेलि मेचिंग डेटाबेसेज के जरिए लोग अपने बायलॉजिकल रिश्तेदारों के बारे में ऐसी जानकारी हासिल कर सकते हैं जो पुराने समय में संभव नहीं थी।
इसलिए आने वाले वर्षों में “donor की privacy बनाम बच्चे का genetic history जानने का सवाल” भारत में महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक बहस बन सकता है। कानून सिर्फ माता-पिता और donor को नहीं, बच्चे को भी देखता है।
ART कानून का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों को exploitation और abandonment से बचाना भी है। कानून के तहत ART से जन्मे बच्चे को abandon, disown या exploit करना अपराध है। इसके अलावा human gametes या embryos की खरीद-बिक्री अथवा trading के लिए agency या racket चलाने पर भी रोक है। उल्लंघन की स्थिति में monetary penalty और गंभीर मामलों में imprisonment का प्रावधान है।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि fertility treatment सिर्फ डॉक्टर और patient के बीच का मामला नहीं रह जाता। इसमें donor, embryo, clinic, ART bank और सबसे आखिर में पैदा होने वाला बच्चा-सभी जुड़े होते हैं।
Clinic की गलती हुई तो?
ART Act clinics और banks पर रिटन इन्फॉर्म्ड कंसेंट, एक्यूरेट रेकॉर्ड और निर्धारित प्रोसेड्यूर्स का पालन करने की जिम्मेदारी डालता है। कानून में क्लिनिक्स और ART banks के कर्तव्य अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं।
Rules में donor records को सुरक्षित रखने और डोनर की पहना को सीमित लोगों तक कॉन्फिडेंशियल रखने की व्यवस्था भी की गई है। इसलिए IVF करवाने वाले परिवार के लिए सिर्फ “कौन सा clinic अच्छा है?” पूछना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
उसे यह भी पूछना चाहिए, कि क्या clinic रजिस्टर्ड है? ART बैंक रजिस्टर्ड है? रिटन कंसेंट है? Donor information कैसे सुरक्षित रखी जाएगी? Embryo और gamete storage की व्यवस्था क्या है? और किसी विवाद की स्थिति में शिकायत कहां की जा सकती है?
एक्सपर्ट्स का कहना है नहीं। ART Act सेक्स सिलेक्शन पर पूरी तरह रोक लगाता है। कानून के अनुसार ART के जरिए बच्चे का पहले से सेक्स के मुताबिक चुनने की सुविधा देना प्रतिबंधित है। केवल sex-linked genetic disease की डायग्नोसिस, प्रीवेंशन या ट्रीटमेंट जैसी सीमित मेडिकल परिस्थितियों में जेनेटिक टेस्टिंग की अनुमति हो सकती है।
इसी तरह donor gametes को किसी भी व्यक्ति या कपल को मनमाने तरीके से उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। कानून के अनुसार gamete donor की स्क्रीनिंग और gametes की कलेक्शन, स्क्रिनिंग तथा स्टोरेज रजिस्टर्ड ART bank के माध्यम से होनी चाहिए। एक donor का sperm या oocyte एक से अधिक commissioning couple को supply नहीं किया जा सकता।
2021 का कानून भारत में ART को एक regulatory ढांचे में लेकर आया, लेकिन रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है। आज सवाल केवल IVF की सफलता का नहीं है। कल सवाल होंगे, जेनेटिक जानकारी किसके पास होगी, donor-conceived बच्चे को कितना जानने का अधिकार होगा, AI embryo selection की सीमा क्या होगी और फर्टिलिटी टेक्नोलॉजी में पेशेंट की जानकारी की इच्छा या पसंद कितनी मजबूत होगी? यानी IVF की अगली लड़ाई लेबोरेट्री में नहीं, शायद कानून और समाज के बीच होगी।
जिस परिवार ने कभी सिर्फ एक बच्चे की उम्मीद में IVF का दरवाजा खटखटाया था, उसके सामने अब सवाल कहीं बड़ा है, “विज्ञान हमें माता-पिता बनने का रास्ता दे रहा है, लेकिन उस रास्ते पर हमारे और हमारे बच्चे के अधिकार कौन तय करेगा?”
और यही सवाल हमारी अगली कड़ी को जन्म देता है, भारत से बाहर donor sperm, egg donation और IVF को लेकर कानून और समाज कितने अलग हैं? क्या पश्चिमी देशों का मॉडल भारत के भविष्य की झलक देता है, या भारत अपनी अलग राह बनाएगा?
Updated on:
26 Aug 2026 04:21 pm
Published on:
26 Aug 2026 04:21 pm
