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गणेश उत्सव में आपने कई पंडालों में भगवान गणेश की एक बड़ी प्रतिमा के साथ छोटी गणेश प्रतिमा भी देखी होगी। बड़ी प्रतिमा पूरे पंडाल का मुख्य आकर्षण होती है, जबकि छोटी प्रतिमा अपेक्षाकृत अलग स्थान पर रखी जाती है। इसके पीछे केवल सजावट या परंपरा ही नहीं, बल्कि भक्तों की आस्था से जुड़ा एक भाव भी माना जाता है। मान्यता के अनुसार बड़ी प्रतिमा उत्सव के बाद विसर्जित की जाती है, जबकि छोटी प्रतिमा को लंबे समय तक अपने पास रखने का भाव होता है।
धार्मिक मान्यताओं में गणपति को विघ्नहर्ता और शुभता का प्रतीक माना गया है। गणेश चतुर्थी पर भक्त कुछ दिनों के लिए बप्पा का आह्वान करते हैं और विधि विधान से पूजा करते हैं। सार्वजनिक पंडालों में स्थापित बड़ी प्रतिमा उत्सव और सामूहिक पूजा का केंद्र होती है।
इसके साथ छोटी प्रतिमा रखने की परंपरा को इस भावना से जोड़ा जाता है कि गणपति उत्सव खत्म होने के बाद भी बप्पा का आशीर्वाद घर या पंडाल से पूरी तरह विदा नहीं होता। छोटी प्रतिमा को इसी स्थायी उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।
गणेश उत्सव में स्थापित प्रतिमा का विसर्जन अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों की परंपरा के अनुसार अलग दिन किया जाता है। 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को थी और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को है। कई स्थानों पर डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन या 7 दिन बाद भी विसर्जन की परंपरा है।
विसर्जन को धार्मिक रूप से भगवान गणेश को विदाई देने और प्रतिमा को प्रकृति के पंच तत्वों में वापस समर्पित करने की भावना से जोड़ा जाता है। मिट्टी की प्रतिमा इस भाव को और स्पष्ट करती है, क्योंकि मिट्टी प्रकृति से आती है और विसर्जन के बाद उसी में मिल जाती है।
पंडाल में छोटी प्रतिमा रखने की परंपरा के पीछे यह मान्यता बताई जाती है कि बड़ी प्रतिमा उत्सव के सार्वजनिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि छोटी प्रतिमा बप्पा की निरंतर उपस्थिति का भाव देती है। इसलिए बड़ी प्रतिमा के विसर्जन के बाद छोटी प्रतिमा को घर या मंदिर में रखा जा सकता है और उसकी नियमित पूजा की जाती है।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि सभी पंडालों और परिवारों में यह परंपरा समान नहीं होती। पूजा पद्धति और प्रतिमा रखने की व्यवस्था स्थानीय परंपरा और परिवार की मान्यताओं के अनुसार बदल सकती है।
गणपति विसर्जन के दौरान भक्तों में भावुकता दिखाई देती है। कई लोग बप्पा को अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना के साथ विदाई देते हैं। ऐसे में छोटी प्रतिमा को पास रखना भक्तों के लिए एक भावनात्मक सहारा माना जाता है। बड़ी प्रतिमा के विसर्जन के बाद भी छोटी प्रतिमा के रूप में गणपति की मौजूदगी बनी रहती है।
इस परंपरा का एक संदेश यह भी माना जाता है कि उत्सव भले ही कुछ दिनों का हो, लेकिन भगवान के प्रति आस्था और उनके बताए मूल्यों को जीवन में लगातार बनाए रखना चाहिए।
2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई गई। इस दौरान देश के कई हिस्सों में घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति की स्थापना हुई। महाराष्ट्र में पर्यावरण अनुकूल मिट्टी की प्रतिमाओं को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। महाराष्ट्र के लोकभवन में भी इस वर्ष मिट्टी की पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमा स्थापित की गई।
गणेश पूजा में प्रतिमा से ज्यादा महत्वपूर्ण श्रद्धा और विधि मानी जाती है। इसलिए बड़ी या छोटी प्रतिमा को लेकर कोई एक सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है। अलग अलग क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं को समझना जरूरी है। बड़ी प्रतिमा उत्सव की भव्यता दिखाती है तो छोटी प्रतिमा बप्पा की निरंतर मौजूदगी और आशीर्वाद की भावना को दर्शाती है। यही वजह है कि कई गणेश पंडालों में दोनों प्रतिमाएं साथ दिखाई देती हैं।
Updated on:
17 Sept 2026 12:37 pm
Published on:
17 Sept 2026 12:37 pm
