
प्रतीकात्मक तस्वीर | Gemini AI
हिंदुकुश‑हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना अब केवल हिमालयी सौंदर्य का क्षरण नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुका है। हाल ही में आई रिपोर्टों के अनुसार, इस क्षेत्र में ग्लेशियरों की बर्फ की मोटाई में 1975 से अब तक लगभग 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है, और पिघलने की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है।
यह परिवर्तन केवल हिमालय की समस्या नहीं है, बल्कि लगभग दो अरब लोगों की आजीविका, कृषि, ऊर्जा और पानी की उपलब्धता को सीधे प्रभावित कर रहा है।
पानी की अस्थायी वृद्धि ग्लेशियरों के पिघलने से नदी प्रवाह में अस्थायी वृद्धि होती है, जिससे कुछ समय के लिए खेतों में पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है। लेकिन ग्लेशियरों का आकार लगातार घटने से गर्म और शुष्क मौसम में यह प्रवाह बनाए रखना कठिन हो जाएगा। IPCC की रिपोर्ट भी बताती है कि हिमनदों का द्रव्यमान सदी के अंत तक बहुत बड़े स्तर पर घट सकता है, जिससे भविष्य में नदी प्रवाह और कृषि पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
"पीक वॉटर" के बाद गिरावट IPCC की विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदुकुश‑हिमालय के अधिकांश ग्लेशियर इस सदी के मध्य तक “पीक वॉटर” (अधिकतम पिघलने का समय) तक पहुंच जाएंगे, उसके बाद उनका पिघलना और नदी प्रवाह दोनों घटने लगेंगे। इसका अर्थ है कि प्रारंभिक लाभ के बाद पानी की उपलब्धता में निरंतर गिरावट आएगी, जिससे कृषि और खाद्य उत्पादन पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ेगा।
खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव हिंदुकुश‑हिमालय से निकलने वाली नदियां - जैसे सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र—दक्षिण एशिया के सबसे बड़े कृषि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराती हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से यह निर्भरता अस्थिर हो जाएगी। IPCC की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बढ़ता तापमान, बदलती वर्षा और ग्लेशियरों का पिघलना मिलकर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर रहे हैं।
विविध फसलें और पारंपरिक ज्ञान हिमालयी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से स्थानीय फसलें जैसे जौ, बाजरा, कुटकी और क्विनोआ उगाई जाती रही हैं, जो पानी की कमी और ठंडे मौसम में बेहतर टिकती हैं। इन "निग्लेक्टेड एंड अंडरयूज्ड स्पीशीज" (NUS) को बढ़ावा देना खाद्य सुरक्षा और पारंपरिक ज्ञान दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है।
जल‑खाद्य‑ऊर्जा का जाल UNDP की हालिया रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव खाद्य, पानी और ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ प्रभावित कर रहे हैं—इनका असर एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। ग्लेशियरों के पिघलने से नदी प्रवाह अस्थिर होगा, जिससे सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत पर प्रभाव पड़ेगा, और यह सब मिलकर खाद्य उत्पादन को भी प्रभावित करेगा।
धूल‑कणों का प्रभाव IPCC की एक रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि ब्लैक कार्बन (धुएं के कण) हिमालयी ग्लेशियरों पर जमा होकर बर्फ की चमक (अल्बेडो) कम कर देते हैं, जिससे पिघलने की दर बढ़ जाती है। यह मानवजनित प्रभाव ग्लेशियरों को और अधिक कमजोर कर रहा है।
ग्लेशियरों के पिघलने की दर में वृद्धि और "पीक वॉटर" के बाद गिरावट की संभावना से यह स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया को भविष्य में खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए आवश्यक है:
यह परिवर्तन हमें यह सोचने पर विवश करता है कि पारंपरिक खेती, स्थानीय ज्ञान और जलवायु‑अनुकूल नीतियों को अपनाकर हम आने वाले समय में इस संकट से कैसे निपट सकते हैं।
Updated on:
14 Sept 2026 05:40 pm
Published on:
14 Sept 2026 05:40 pm
