
Vimala Devi Mandir | प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT AI
Jagannath Puri Rath Yatra Vimala Devi Mandir :"जय जगन्नाथ…" के साथ ही आज से पुरी और दुनिया भर में रथ-यात्रा शुरू हो चुकी है। आज हम पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर के एक रोचक रहस्य के बारे में जानेंगे। यह कहानी है विमला देवी भगवान जगन्नाथ की तांत्रिक अर्धांगिनी की; जिनके बिना महाप्रसाद भी अधूरा है। इनसे ही जुड़ा है बकरे के मांस और मछली के चढ़ावे का किस्सा।
ओडिशा के श्रीजगन्नाथ मंदिर परिसर के दक्षिण-पश्चिम कोने में, पवित्र रोहिणी कुंड के पास स्थित विमला (बिमला) देवी मंदिर, हिंदू आस्था का वह केंद्र है जहां वैष्णव और शाक्त परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
यह सिर्फ 51-52 शक्तिपीठों में से एक भर नहीं है। कई धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार इसे उन चार 'आदि शक्तिपीठों' में गिना जाता है, जिन्हें सबसे प्राचीन और सर्वोच्च माना गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा शिव के अपमान से आहत होकर अपना शरीर त्याग दिया, तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के टुकड़े कर दिए, जो अलग-अलग स्थानों पर गिरे और शक्तिपीठ कहलाए।
अधिकांश परंपराओं के अनुसार पुरी में सती का चरण (पादखंड) गिरा था, हालांकि कुछ आख्यानों में इसे नाभि गिरने का स्थान भी बताया गया है - यानी इस बिंदु पर स्रोतों में मामूली मतभेद (विवाद) है, पर दोनों ही देवी सती के शरीर के अंश को इस स्थान से जोड़ते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान श्रीजगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने करवाया था। लेकिन विमला देवी की मूल प्रतिमा छठी शताब्दी ईस्वी जितनी पुरानी मानी जाती है, जबकि वर्तमान मंदिर संरचना अपनी स्थापत्य शैली के आधार पर 9वीं शताब्दी में, पूर्वी गंग वंश के शासनकाल में, किसी प्राचीन मंदिर के खंडहरों पर बनी बताई जाती है।
मंदिर के ऐतिहासिक अभिलेख 'मदला पंजी' के अनुसार इसे सोमवंशी वंश के राजा ययाति केशरी ने बनवाया था। यानी विमला देवी की पूजा-परंपरा जगन्नाथ मंदिर के निर्माण से भी सदियों पुरानी है, और जगन्नाथ संप्रदाय में उन्हें विशेष स्थान मिलने की यही जड़ है।
मंदिर देउल शैली में सैंडस्टोन और लेटेराइट पत्थर से बना है, जिसके चार भाग हैं - विमान (गर्भगृह), जगमोहन (सभा मंडप), नाट मंडप (उत्सव मंडप) और भोग मंडप। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा वर्ष 2005 में इसका जीर्णोद्धार किया गया था।
आमतौर पर हर शक्तिपीठ में देवी के साथ शिव को 'भैरव' रूप में पूजा जाता है, लेकिन पुरी में यह परंपरा उलट जाती है। यहां भगवान जगन्नाथ (विष्णु स्वरूप) को भैरव और विमला देवी को भैरवी के रूप में पूजा जाता है।
धार्मिक विद्वान इसे वैष्णव और शाक्त परंपराओं की एकता का प्रतीक मानते हैं - मानो विष्णु और शिव एक ही चेतना के दो रूप हों। विमला देवी को जगन्नाथ की तांत्रिक अर्धांगिनी (तांत्रिक शक्ति स्वरूप) और मंदिर परिसर की रक्षक देवी माना जाता है, जबकि देवी लक्ष्मी को उनकी वैष्णव अर्धांगिनी का स्थान प्राप्त है।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को अर्पित भोग तब तक 'महाप्रसाद' नहीं कहलाता, जब तक वह विमला देवी को अर्पित न हो जाए। इस परंपरा के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है:
"एक बार भगवान शिव वैकुंठ में विष्णु से मिलने पहुंचे और देखा कि भोजन के बाद कुछ अन्न के दाने (उच्छिष्ट) भूमि पर गिरे पड़े हैं। शिव ने बिना सोचे वह दाना उठाकर खा लिया, पर एक आधा दाना उनकी दाढ़ी में अटक गया। कैलाश लौटने पर नारद मुनि की नजर उस दाने पर पड़ी और उन्होंने वह भी खा लिया। जब देवी पार्वती को पता चला कि उनका हिस्सा नारद खा गए, तो वे रुष्ट होकर विष्णु के पास शिकायत लेकर पहुंचीं। विष्णु ने उन्हें आश्वस्त किया कि कलियुग में वे पुरी में विमला रूप में निवास करेंगी और प्रतिदिन उनके भोग का उच्छिष्ट ग्रहण करेंगी।"
यही कारण है कि साधारणतः हिंदू परंपरा में 'जूठा' खाना वर्जित होते हुए भी, यहां देवता का उच्छिष्ट स्वयं प्रसाद बन जाता है।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य को भी नियमित रूप से महाप्रसाद और खिचड़ी की एक थाली भेजी जाती है, क्योंकि विमला देवी को उस मठ की भी अधिष्ठात्री देवी (आद्याशक्ति) माना जाता है।
सालभर भगवान जगन्नाथ और विमला देवी को पूर्णतः सात्विक भोजन अर्पित होता है, क्योंकि सामान्य दिनों में देवी को अलग से भोजन नहीं बनाया जाता। वे जगन्नाथ के भोग का ही उच्छिष्ट ग्रहण करती हैं। लेकिन शारदीय दुर्गा पूजा के दौरान, जो यहां पूरे 16 दिनों तक (सोल पूजा) मनाई जाती है, अश्विन माह की सप्तमी, अष्टमी और नवमी को यह नियम बदल जाता है।
शोधकर्ता दुःखी श्याम बेहेरा और सुरेंद्र नाथ दाश के अनुसार, इन तीन दिनों में विमला देवी उग्र (विनाशकारी) रूप धारण करती हैं, इसलिए तंत्र परंपरा के अनुसार उन्हें शांत करने के लिए मांस-भोग चढ़ाया जाता है।
मंदिर की शब्दावली में इस अनुष्ठान को 'छेड़ा पाका नीति' कहा जाता है, जो विमला कुएं के पास संपन्न होता है। हर दिन प्रातःकाल से पहले, पूरी गोपनीयता में दो बकरों की बलि दी जाती है। कुल छह बकरे तीन दिनों में छह अलग-अलग मठों (महाश्रम मठ, सेनापति मठ, मंगू मठ, बड़-ओड़िया मठ आदि) की ओर से चढ़ाए जाते हैं।
इसके साथ ही पवित्र मार्कंड मंदिर के तालाब से मछली लाकर एक अस्थायी रसोई में पकाई जाती है और पश्चिमी द्वार से विमला मंदिर में अर्पित की जाती है। यह पूरा अनुष्ठान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य द्वार खुलने और सुबह की पहली आरती से पहले पूर्ण कर लिया जाता है, क्योंकि जगन्नाथ स्वयं शुद्ध शाकाहारी हैं।
इन तीन दिनों के दौरान एक और खास परंपरा निभाई जाती है। महिलाओं को विमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती, क्योंकि मान्यता है कि देवी के इस उग्र रूप को देखना उनके लिए असहनीय हो सकता है। इसी तरह वैष्णव भक्तों को भी इस दौरान मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा हमेशा निर्बाध नहीं रही। मुगल काल में पुरी के राजा नरसिंहदेव (शासनकाल 1623-1647) ने देवी को मांस-मछली अर्पित करने की प्रथा पर रोक लगा दी थी, हालांकि बाद में यह परंपरा आंशिक रूप से फिर से शुरू हो गई और आज तक जारी है।
इससे पहले, 16वीं शताब्दी में राजा रामचंद्र देव प्रथम के समय कौलाचार तंत्र परंपरा के प्रभाव में सप्तमी से नवमी तक मछली और बकरे की बलि को औपचारिक रूप दिया गया था। मूल रूप से यहां पंचमकार (मांस, मदिरा, मछली, मुद्रा, मैथुन जैसी पांच तांत्रिक साधनाएं) की परंपरा भी प्रचलित रही है, जिसे समय के साथ काफी हद तक सात्विक स्वरूप में बदल दिया गया।
विमला देवी को दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है, जिन्होंने महिषासुर का वध किया था। विजयदशमी के दिन पुरी के पदवीधारी गजपति राजा स्वयं विमला देवी की पूजा करते हैं। इसका सबसे पुराना लिखित प्रमाण नई दिल्ली स्थित कोणार्क शिलालेख में मिलता है, जिसमें राजा नरसिंहदेव प्रथम (शासनकाल 1238-1264) द्वारा विजयदशमी के दिन 'दुर्गा-माधव' (विमला-जगन्नाथ) की पूजा का उल्लेख है - यानी यह परंपरा कम से कम 13वीं शताब्दी से चली आ रही है।
विमला देवी मंदिर सिर्फ एक शक्तिपीठ भर नहीं, बल्कि भारतीय धर्म-दर्शन की उस गहराई का प्रतीक है जहां शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराएं एक-दूसरे का विरोध नहीं बल्कि पूरक बनकर एक ही परिसर में सह-अस्तित्व में रहती हैं।
जगन्नाथ का भैरव बनना, विमला का भैरवी होना, वर्षभर सात्विक रहकर भी एक खास मुहूर्त में तांत्रिक परंपरा को स्थान देना; यही विविधता में एकता पुरी को भारत के सबसे अनूठे धार्मिक स्थलों में शुमार करती है।
Updated on:
16 Jul 2026 05:45 pm
Published on:
16 Jul 2026 12:15 pm
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