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जलझूलनी एकादशी 22 सितंबर को, भगवान विष्णु के करवट बदलने से जुड़ी है मान्यता, जानिए पूजा विधि और महत्व

जलझूलनी एकादशी 2026 में 22 सितंबर मंगलवार को मनाई जाएगी। इसे परिवर्तिनी, पद्मा और वामन एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं।
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Adarsh Thakur

Sep 17, 2026

Jal Jhulni Ekadashi 2026

सांकेतिक इमेजः Gemini

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसे परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी, वामन एकादशी और डोल ग्यारस भी कहा जाता है। 2026 में यह व्रत 22 सितंबर मंगलवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात करीब 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात करीब 9:43 बजे तक रहेगी।

क्यों कहते हैं जलझूलनी एकादशी?

जलझूलनी एकादशी का नाम भगवान विष्णु और जल विहार की परंपरा से जुड़ा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस दिन भगवान कृष्ण या विष्णु के बाल स्वरूप को सजी हुई पालकी में बैठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके बाद भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब या सरोवर के पास ले जाकर पूजा की जाती है। मध्य प्रदेश पर्यटन भी इस पर्व को जलझूलनी और डोल ग्यारस जैसे नामों से जोड़ता है।

कई स्थानों पर भगवान की प्रतिमा को जल के पास झुलाने या जल विहार कराने की परंपरा है। इसी वजह से यह एकादशी स्थानीय संस्कृति और भक्ति उत्सव का रूप ले लेती है।

भगवान विष्णु के करवट बदलने की मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान अपनी करवट बदलते हैं। इसी कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपरा में वामन अवतार को राजा बलि से जुड़ी कथा के साथ जोड़ा जाता है।

ऐसे करें पूजा

सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें। घर के पूजा स्थान की सफाई कर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या वामन भगवान की प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को पंचामृत या गंगाजल से स्नान कराएं। पीले वस्त्र, चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।

इसके बाद दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें। एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें और विष्णु मंत्र का जाप करें। धार्मिक परंपरा में इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार दान करने का भी महत्व बताया गया है।

क्या खाएं और क्या नहीं?

एकादशी व्रत में सामान्य रूप से अनाज और दालों का सेवन नहीं किया जाता। कई परंपराओं में चावल भी वर्जित माना जाता है। फल, दूध, सूखे मेवे और व्रत में मान्य फलाहार लिया जा सकता है। हालांकि व्रत की परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।

जो लोग निर्जल व्रत रखते हैं वे पूरे दिन पानी का सेवन नहीं करते, जबकि दूसरे भक्त फलाहार या सीमित भोजन के साथ व्रत रखते हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार व्रत रखना चाहिए।

22 सितंबर को क्यों खास है यह पर्व

2026 में जलझूलनी एकादशी 22 सितंबर को है। इस दिन कई क्षेत्रों में मंदिरों से भगवान की पालकी यात्रा निकलेगी और जलाशयों तक ले जाकर पूजा की जाएगी। मध्य प्रदेश के खट्टाली स्थित चारभुजा मंदिर में भी 22 सितंबर को जलझूलनी डोल ग्यारस उत्सव का आयोजन निर्धारित है।

जलझूलनी एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं है। यह भगवान विष्णु की भक्ति, पालकी यात्रा, जल पूजा और स्थानीय लोक परंपराओं को एक साथ जोड़ने वाला त्योहार है। यही वजह है कि राजस्थान और मध्य भारत के कई इलाकों में इस दिन मंदिरों और बाजारों में विशेष उत्सव का माहौल दिखाई देता है।