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मुंबई छोड़ीं पर फिल्में करना नहीं… स्टेज 4 कैंसर से जूझते हुए एक्ट्रेस नफीसा अली ने कैसे पाया जीवन का नया मकसद?

कैंसर स्टेज 4 से लड़ रही नफीसा अली की कहानी आपको सिखाएगी कि कैसे मुश्किल हालात में भी खुश रहना और आगे बढ़ना संभव है - उनकी जंग सिर्फ कैंसर से नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह जीने की है!
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Ravi Gupta

Sep 14, 2026

nafisa ali cancer stage 4

नफीसा अली की फोटो

नफीसा अली की कहानी एक प्रेरणा है जो कैंसर जैसी चुनौती के बीच भी जीवन में सकारात्मकता और उद्देश्य तलाशने की ताकत देती है। हाल ही में उन्होंने अपनी जंग से जुड़ी कुछ अहम बातें साझा की हैं, जो न सिर्फ उनकी हिम्मत दिखाती हैं, बल्कि हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती हैं जो मुश्किल दौर से गुजर रहा है।

स्टेज 4 कैंसर से जूझ रही हैं

नफीसा अली ने एक इंटरव्यू में बताया कि वे स्टेज 4 पेरिटोनियल और ओवेरियन कैंसर से जूझ रही हैं, लेकिन अब वह तीसरी बार रिमिशन में हैं। उन्होंने कहा, “मैं अब चुप नहीं रहूंगी… दुनिया को बेहतर जगह बनाना चाहिए।” इससे साफ होता है कि बीमारी ने उन्हें कमजोर नहीं किया, बल्कि एक मजबूत संदेश देने का साहस दिया है।

फिल्म की शूटिंग भी की

उनकी कहानी में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब उन्होंने बताया कि वे स्टेज 3 कैंसर से जूझ रही थीं, तब भी उन्होंने फिल्म “Max, Min And Meowzaki” की शूटिंग की। निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति (पैडी) ने उन्हें कैमरे के सामने वापस आने का हौसला दिया, जबकि वे खुद को कमजोर महसूस कर रही थीं। यह बताता है कि उनका संघर्ष सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से भी जुड़ा था।

उन्होंने कहा, “मैं कोई स्टार नहीं, मैं एक धूमकेतु हूं—मैं आती हूं, चमकती हूं और चली जाती हूं।”

बताया कीमोथेरेपी कितनी कठिन

इसके अलावा, उन्होंने खुलकर बताया कि कीमोथेरेपी कितनी कठिन होती है—“यह दर्द, बुखार और कमजोरी लाती है… लेकिन मैं अपने शरीर से कहती हूं कि यह सफर एन्जॉय करो, कैंसर को कमजोर करो।”

उनकी जिंदगी में परिवार का योगदान भी बेहद अहम रहा है। उन्होंने बताया कि कीमो के दौरान उन्होंने अपने पोते-पोतियों को अपने सिर मुंडवाने में शामिल किया, ताकि वे बीमारी को सामान्य समझें और डर न पाएं। यह एक संवेदनशील और सोच-समझकर लिया गया कदम था, जो उनके परिवार में खुलापन और समझ बढ़ाता है।

मुंबई को कह दिया अलविदा

गोवा में उनका जीवन भी इस जंग का हिस्सा बन गया है। उन्होंने बताया कि 2018 में स्टेज 3 कैंसर के बाद उन्होंने दिल्ली छोड़कर गोवा के शांत वातावरण में शिफ्ट होना चुना। वहां की ताजी हवा, हरियाली और समुद्र तट पर चलना—ये सब उनके लिए एक तरह की चिकित्सा बन गए। उन्होंने अपने घर के आसपास जंगल जैसा माहौल बना लिया, जहां पक्षी, बंदर और अन्य जीव आते-जाते रहते हैं—यह सब उनके लिए मानसिक और भावनात्मक सहारा बन गया है।

इन सब बातों से यह स्पष्ट होता है कि नफीसा अली की जंग सिर्फ कैंसर से नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह जीने की जंग है - जहां दर्द, कमजोरी और डर के बीच भी उद्देश्य, परिवार, प्रकृति और काम ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी।

उनका कहना है, “कैंसर को छुपाओ मत… यह जीवन का हिस्सा है, और हमारी इम्यूनिटी ही इसे नियंत्रित करती है।” यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो बीमारी या किसी अन्य चुनौती से गुजर रहा है।

इस तरह, नफीसा अली की जंग हमें यह बताती है कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ बीमारी से नहीं, बल्कि उम्मीद और उद्देश्य के साथ जीने की होती है।

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