
काठमांडू में बाढ़ राहत कार्यों के बीच विदेशी टीमों पर लगी रोक और कूटनीतिक संतुलन। (फोटो : AI.)
Nepal Disaster Response: हिमालयी मुल्क नेपाल में मानसूनी बारिश के बाद आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई। इस गंभीर मानवीय संकट के बीच जब भारत, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी आधुनिक रेस्क्यू टीमों और सैन्य विमानों को नेपाल भेजने की पेशकश की, तो काठमांडू प्रशासन ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए विदेशी कर्मियों की सीधी तैनाती को ठुकरा दिया। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल की विदेश नीति, सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल ये है कि आखिर वह बाढ़ में घिरे होने के बावजूद मदद क्यों नपहीं लेना चाहता।
नेपाल के गृह और विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह फैसला देश की संप्रभुता और सुरक्षा बलों की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर लिया गया है। नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और नेपाल पुलिस के पास दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बचाव अभियान चलाने का पर्याप्त अनुभव है।
प्रशासन का मानना है कि साल 2015 के विनाशकारी भूकंप के दौरान 34 से अधिक देशों की बचाव टीमें एक साथ नेपाल पहुंच गई थीं। इसके चलते त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भारी जाम लग गया, हवाई क्षेत्र (एयरस्पेस) का प्रबंधन बिगड़ गया और विभिन्न देशों की टीमों के बीच आपसी समन्वय की गंभीर कमी देखी गई थी। इस बार काठमांडू ने उसी प्रशासनिक अव्यवस्था से बचने के लिए 'वन-डोर पॉलिसी' (एकल खिड़की नीति) लागू की है, जिसके तहत सीधे मानवीय सहायता और उपकरण तो स्वीकार किए जा रहे हैं, लेकिन विदेशी सैन्य या बचावकर्मियों को आने की इजाज़त नहीं दी गई।
नेपाल की भौगोलिक स्थिति भारत और चीन जैसे दो महाशक्तियों के बीच एक बफर स्टेट के रूप में है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने संकट के शुरुआती घंटों में ही एनडीआरएफ (NDRF) की टीमें और राहत सामग्री भेजने की तत्परता दिखाई थी। जब नेपाल ने विदेशी कर्मियों के प्रवेश पर रोक लगाई, तो भारत ने प्रोटोकॉल का सम्मान करते हुए कई टन राहत सामग्री, दवाएं और आवश्यक उपकरण विमानों के ज़रिए काठमांडू पहुंचाए।
विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि यदि नेपाल भारतीय सुरक्षा बलों या तकनीकी टीमों को अपने संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में काम करने की छूट देता, तो स्वाभाविक रूप से चीन की तरफ से भी उसी स्तर की सैन्य भागीदारी का दबाव बनता। बीजिंग ने भी सीमावर्ती क्षेत्रों में मदद की पेशकश की थी। काठमांडू किसी भी एक देश को ज़मीनी स्तर पर खुली छूट देकर दूसरे को असहज नहीं करना चाहता था।
नेपाल ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्राकृतिक आपदा के समय भी वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) से समझौता नहीं करेगा। काठमांडू ने स्पष्ट किया है कि विदेशी देशों की भूमिका पुनर्वास और वित्तीय सहयोग तक सीमित रहनी चाहिए, जबकि राहत और बचाव का वास्तविक नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के हाथों में ही रहेगा। इस संतुलनकारी कदम से नेपाल ने घरेलू स्तर पर किसी भी राजनीतिक विवाद से बचने के साथ-साथ दोनों पड़ोसी देशों के साथ अपने राजनयिक संबंधों को निष्पक्ष बनाए रखने का प्रयास किया है।
Updated on:
28 Aug 2026 12:54 pm
Published on:
28 Aug 2026 12:54 pm
