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क्या आपके दादा-दादी भी अकेले हैं? जानिए कैसे पहचानें उनकी मेंटल हेल्थ कैसी?

Elderly mental health signs: कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन आजकल बच्चे बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहते हैं। लेकिन समय का सच और उम्र का तकाजा कहता है कि अकेलेपन के बीच मुस्कुराते हंसते उनके चेहरे के पीछे एक दर्द छिपा है और इस दर्द से उपजने वाली कई मानसिक समस्याएं भी उन्हें घेरती जा रही हैं, ऐसे में हम उस मेंटल हेल्थ को कैसे पहचान सकते हैं ताकि उन्हें इम्प्रूव करने उनकी मदद कर सकें
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 28, 2026

Elderly mental health signs

Elderly mental health signs

Elderly mental health signs: बुजुर्गों की मानसिक सेहत पर ध्यान देना तेजी से बदलती दुनिया में आज जितना जरूरी है, उतना ही अनदेखा रह जाता है। उनका अकेलापन, बीमारी, जीवनशैली में बदलाव जैसे कई कारक हैं, जो इनकी मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डालते हैं। क्या आपके दादा-दादी हैं? अगर हैं, तो यहां जानिए उनकी मानसिक सेहत के वो लक्षण जिनसे उनकी पूरी सेहत प्रभावित हो सकती है। जानिए बुजुर्गों की मानसिक सेहत अच्छी रहना क्यों महत्वपूर्ण, इसे कैसे सुधारें?

सामाजिक जुड़ाव और अकेलापन आखिर क्यों मायने रखता है

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अकेलापन और सामाजिक अलगाव बुजुर्गों में मानसिक बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारक हैं। लगभग एक चौथाई बुजुर्ग इससे प्रभावित होते हैं और यह डिप्रेशन तथा चिंता जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। सामाजिक गतिविधियां, जैसे दोस्ताना समूह, कला या शिक्षा संबंधी कार्यक्रम, अकेलापन को कम कर सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं।

मानसिक विकारों कैसे हो रहे और क्या दिख रहा असर

70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लगभग 14% बुजुर्ग मानसिक विकारों से ग्रस्त हैं और ये विकार इस आयु वर्ग में ‘विकलांगता से जीने वाले वर्षों’ (YLDs) का 6.6% हिस्सा हैं। भारत में, 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों में 20% से अधिक लोग मानसिक या न्यूरोलॉजिकल विकारों से प्रभावित हैं, जिनमें डिमेंशिया और डिप्रेशन प्रमुख हैं। यह आंकड़ा बताता है कि बुजुर्गों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या व्यापक और गंभीर है।

भारत में बुजुर्गों की मानसिक सेहत की स्थिति

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) 2015-16 के मुताबिक, बुजुर्गों में जीवनकाल में डिप्रेशन का प्रसार लगभग 6.93% और वर्तमान में 3.53% था, जो युवा वयस्कों की तुलना में अधिक है। यह दर्शाता है कि बुजुर्गों में डिप्रेशन का बोझ खासा है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकार ने बुजुर्गों के लिए कई पहलें शुरू की हैं। आयुष्मान भारत के तहत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स और नेशनल प्रोग्राम फॉर हेल्थ केयर ऑफ एल्डरली (NPHCE) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बुजुर्गों को समर्पित सेवाएं प्रदान करते हैं। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति 2014 ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार और पहुंच को मजबूत किया है।

कैसे पहचानें

  • यदि बुजुर्ग अक्सर उदास, चिड़चिड़े, नींद में बदलाव, भूख में कमी या सामाजिक गतिविधियों से दूरी दिखाते हैं, तो यह संकेत हो सकते हैं।
  • अकेलापन, याददाश्त में गिरावट, या आत्महत्या जैसे विचारों का होना भी चेतावनी है।

कैसे कर सकते हैं उनकी मदद

  • सामाजिक जुड़ाव बढ़ाएं: परिवार, पड़ोस, क्लब या धार्मिक/सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल करें।
  • नियमित हल्की शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना, योग या घर पर व्यायाम मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।
  • यदि डिप्रेशन या चिंता के लक्षण दिखें, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।

एक्सपर्ट्स और समाज की भूमिका क्या?

WHO की mhGAP (Mental Health Gap Action Programme) बुजुर्गों में डिप्रेशन, डिमेंशिया और अन्य मानसिक विकारों के लिए गैर-विशेषज्ञ सेटिंग में मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। भारत में NPHCE के माध्यम से बुजुर्गों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्राथमिक स्तर पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।

साथ ही, परिवार और देखभाल करने के लिए प्रशिक्षण और समर्थन देना भी जरूरी है। इससे वे बुजुर्गों की भावनात्मक जरूरतों को बेहतर समझ सकते हैं और समय पर मदद दे सकते हैं।

डॉक्टर से मिलना कब जरूरी?

यदि उदासी या चिंता दो सप्ताह से ज्यादा समय तक बनी रहे, तो याददाश्त में तेज गिरावट हो या आत्महत्या जैसे विचार आएं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। यह सामान्य सलाह है, और किसी भी चिकित्सा निर्णय से पहले एक्सपर्ट की सलाह जरूरी है।

अब आगे क्या?

बुजुर्गों की मानसिक सेहत पर ध्यान देना केवल उनकी खुशहाली के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए जरूरी है। सामाजिक जुड़ाव, समय पर पहचान और उपचार के साथ ही सरकारी-स्वयंसेवी प्रयास मिलकर इसे बेहतर बना सकते हैं। यदि आप या आपके जानने वाले बुजुर्ग मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।