
NESAC Space Tech North East : कैसे नार्थ ईस्ट में होगा स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, PC- Chatgpt
पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में अब अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ मौसम या नक्शे बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। सरकार की नई रणनीति में सैटेलाइट इमेज, भू-स्थानिक डेटा, ड्रोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म को खेती, बाढ़, सड़क, प्राकृतिक संसाधन और सीमावर्ती इलाकों की निगरानी से जोड़ने की तैयारी है। जुलाई 2026 में अंतरिक्ष विभाग ने बताया कि North Eastern Space Applications Centre (NESAC) करीब 130 परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इनमें करीब 50 पूरी हो चुकी हैं और 78 अभी चल रही हैं।
NESAC, अंतरिक्ष विभाग और पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्रालय के बीच काम करने वाला प्रमुख संस्थान है। इसका उद्देश्य ISRO की उपग्रह और भू-स्थानिक तकनीक को पूर्वोत्तर की जमीन पर इस्तेमाल होने वाली सेवाओं में बदलना है। जून 2026 में हुई NESAC की 13वीं बैठक में पांच बड़े क्षेत्र तय किए गए। गांवों की उच्च-रिजॉल्यूशन मैपिंग, जंगल-नदियों और आर्द्रभूमियों की निगरानी, स्पेस-टेक स्टार्टअप, आपदा प्रबंधन के लिए NER-Shield डिजिटल ट्विन और प्राकृतिक संसाधनों की मैपिंग।
| क्षेत्र | सैटेलाइट/भू-स्थानिक तकनीक का इस्तेमाल |
|---|---|
| खेती | फसल और जमीन की निगरानी |
| बाढ़ | पानी फैलने और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान |
| भूस्खलन | संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग |
| सड़क | परियोजना की योजना और निगरानी |
| सीमा | भारत-म्यांमार सीमा और अंतर-राज्यीय सीमाओं की मैपिंग |
| जंगल | वन और प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी |
| संचार | दूरदराज इलाकों में उपग्रह आधारित कनेक्टिविटी |
| आपदा | शुरुआती चेतावनी और राहत की योजना |
पूर्वोत्तर की खेती पहाड़ी भूगोल, छोटे खेतों और मौसम की अनिश्चितता से प्रभावित होती है। ऐसे में सैटेलाइट से किस खेत में क्या फसल है, फसल की स्थिति कैसी है और किस इलाके में बदलाव हो रहा है, इसकी बड़ी तस्वीर तैयार की जा सकती है।
NESAC पहले से cropping system analysis जैसी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। सरकार अब किसान-केंद्रित precision agriculture और उच्च मूल्य वाली तथा GI-टैग वाली उपज के लिए भू-स्थानिक रजिस्ट्रियों पर जोर दे रही है।
इसका मतलब भविष्य में किसान को केवल मौसम की सामान्य जानकारी नहीं, बल्कि उसके इलाके के हिसाब से ज्यादा सटीक सलाह देने की कोशिश हो सकती है।
असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में बाढ़ सबसे बड़ी आपदाओं में है। सैटेलाइट लगातार जमीन और जल निकायों की तस्वीरें उपलब्ध करा सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कहां पानी फैल रहा है, कौन-से इलाके ज्यादा जोखिम में हैं और किन क्षेत्रों तक सड़क संपर्क टूट सकता है।
जुलाई 2026 में सरकार ने NESAC के फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम को और ज्यादा सटीक तथा स्थान-विशेष बनाने की जरूरत बताई। लक्ष्य है कि संवेदनशील गांवों तक ज्यादा समय पर और उपयोगी चेतावनी पहुंच सके।
सैटेलाइट और भू-स्थानिक डेटा से ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां ढलान, मिट्टी, बारिश और जमीन की स्थिति मिलकर ज्यादा जोखिम पैदा करती है। सरकार ने भविष्य की रणनीति में भूस्खलन समेत दूसरे प्राकृतिक खतरों की geospatial risk monitoring बढ़ाने की बात कही है। इससे सड़क बनाने से पहले भी यह देखा जा सकेगा कि प्रस्तावित मार्ग कितना जोखिमपूर्ण है।
पूर्वोत्तर में सड़क परियोजनाएं अक्सर कठिन पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों से होकर गुजरती हैं। ऐसे में सड़क कहां से निकाली जाए, किस क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा है और परियोजना के आसपास पर्यावरणीय संवेदनशीलता कितनी है। इन सवालों में भू-स्थानिक डेटा मदद कर सकता है। सरकार ने geospatial decision-support systems को बुनियादी ढांचे की योजना, जोखिम आकलन और कनेक्टिविटी सुधार से जोड़ने की बात कही है।
यानी भविष्य में सड़क बनाने का फैसला सिर्फ जमीन पर सर्वे करके नहीं, बल्कि सैटेलाइट डेटा + जमीन पर सर्वे + ड्रोन के संयुक्त इस्तेमाल से हो सकता है।
पूर्वोत्तर की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। जुलाई 2026 में अंतरिक्ष विभाग ने बताया कि NESAC भारत-म्यांमार सीमा और पूर्वोत्तर की अंतर-राज्यीय सीमाओं की भू-स्थानिक मैपिंग में योगदान दे रहा है।
सैटेलाइट से बड़े इलाके की नियमित तस्वीर और भू-स्थानिक डेटा मिलने से सीमा क्षेत्रों में भूगोल, सड़क संपर्क, बस्तियों और बदलावों की निगरानी में मदद मिल सकती है।
लेकिन इसे सीधे 'सैटेलाइट से हर गतिविधि पर नजर' समझना सही नहीं होगा। वास्तविक सीमा सुरक्षा में सैटेलाइट के साथ जमीन पर तैनात सुरक्षा बल, ड्रोन, सेंसर और अन्य प्रणालियां भी जरूरी रहेंगी।
पूर्वोत्तर जैव-विविधता के लिहाज से देश के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में है। जंगल, बांस, अगरवुड, नदियां और आर्द्रभूमियां यहां की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
NESAC पहले से असम और मेघालय में बांस और अगरवुड संसाधनों की मैपिंग कर रहा है। सरकार का मानना है कि ऐसी मैपिंग से संसाधनों की बेहतर योजना, मूल्यवर्धन और किसानों की आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
यानी भविष्य में सरकार के पास सिर्फ यह जानकारी नहीं होगी कि जंगल कहां है, बल्कि यह भी समझने की क्षमता बढ़ेगी कि किस क्षेत्र में कौन-सा प्राकृतिक संसाधन मौजूद है और उसमें समय के साथ क्या बदलाव हो रहा है।
नई रणनीति में high-resolution village resource mapping को प्रमुख पहल बनाया गया है। इसका उद्देश्य गांवों की जमीन, जल स्रोत, सड़क, संसाधन और दूसरी परिसंपत्तियों की ज्यादा विस्तृत डिजिटल जानकारी तैयार करना है। इससे पंचायत और जिला प्रशासन को योजना बनाने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए—
इससे योजना बनाने का आधार ज्यादा डेटा-आधारित हो सकता है।
नई रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा NER-Shield नाम का all-hazard disaster resilience digital twin platform है। सरल भाषा में डिजिटल ट्विन किसी वास्तविक क्षेत्र का डिजिटल मॉडल होता है, जिसमें अलग-अलग स्रोतों से डेटा जोड़कर उस क्षेत्र की स्थिति और जोखिम को समझने की कोशिश की जाती है।
अगर इसे पूरी तरह लागू किया जाता है तो बाढ़, भूस्खलन और दूसरे खतरों के डेटा को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़कर प्रशासन को जोखिम समझने में मदद मिल सकती है। सरकार ने इसके साथ हाइपर-लोकल और बहुभाषी अंतिम छोर तक चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर भी जोर दिया है।
बिल्कुल नहीं। सैटेलाइट सिर्फ डेटा देता है। उस डेटा को सही समय पर सही फैसले में बदलना असली चुनौती है। इसके लिए जरूरी होगा:
सरकार ने भी NESAC, राज्य सरकारों, शोध संस्थानों, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है।
पूर्वोत्तर में अंतरिक्ष तकनीक का सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि सरकार को जमीन पर समस्या दिखाई देने का इंतजार न करना पड़े। बाढ़ आने से पहले जोखिम का नक्शा, सड़क टूटने से पहले कमजोर इलाका, फसल खराब होने से पहले संकेत और सीमा क्षेत्र में बदलाव की डिजिटल निगरानी-यही इस रणनीति का असली उद्देश्य है।
अभी NESAC करीब 130 परियोजनाओं के जरिए इस दिशा में काम कर रहा है और 2026 की रणनीति इसे अलग-अलग परियोजनाओं से आगे ले जाकर space-enabled governance की तरफ ले जाने की कोशिश है।
यानी पूर्वोत्तर में अंतरिक्ष की नई कहानी सिर्फ रॉकेट और सैटेलाइट की नहीं है। असली कहानी यह है कि आसमान से मिलने वाला डेटा जमीन पर गांव, किसान, सड़क, सीमा और आपदा प्रबंधन के फैसलों को कितना बेहतर बना पाता है।
Updated on:
19 Aug 2026 02:44 pm
Published on:
19 Aug 2026 02:44 pm
