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आंदोलन में पुलिस कितनी ताकत का इस्तेमाल कर सकती है? सुप्रीम कोर्ट की नई पहल बदल सकती है Protest Policing का नियम

Protest Policing in India: भारत में हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है, तो पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की पहल के बीच बड़ा सवाल है, प्रदर्शन करने वालों पर बल की सीमा क्या होनी चाहिए, पुलिस कार्रवाई कितनी आनुपातिक होनी चाहिए?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 19, 2026

Protest Policing in India

Protest Policing in India: नीट पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर किए गए स्टूडेंट प्रोटेस्ट में पुलिस पर लगे हिंसा के आरोप के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था केस, अब आगे क्या? (AI Creative)

Protest Policing in India: भारत में विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की सबसे दिखाई देने वाली अभिव्यक्तियों में से एक है। सड़क पर उतरना, नारे लगाना, धरना देना या मार्च निकालना नागरिकों को सरकार के सामने अपनी असहमति दर्ज कराने का मौका देता है। लेकिन उसी सड़क पर पुलिस की जिम्मेदारी भी है, भीड़ को नियंत्रित करना, हिंसा रोकना, सार्वजनिक संपत्ति और लोगों की सुरक्षा करना।

यही दो जिम्मेदारियां अब एक ऐसे सवाल के सामने खड़ी हैं, जिसका जवाब आने वाले वर्षों की प्रोटेस्ट पॉलिटिक्स को प्रभावित कर सकता है। पुलिस आखिर कितनी ताकत इस्तेमाल कर सकती है?

यह है पूरा मामला

18 अगस्त 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस ज्योयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि 20 जुलाई को दिल्ली में NEET पेपर लीक को लेकर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी बनाई जाएगी। प्रस्तावित समिति में एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज, एक पूर्व हाई कोर्ट चीफ जस्टिस, एक पूर्व सीबीआई डायरेक्टर और एक पूर्व डीजीपी शामिल हो सकते हैं। अदालत ने प्रदर्शन की हिंसा से जुड़े CCTV और वीडियो फुटेज भी इस समिति को सौंपने का निर्देश दिया है।

दोनों तरफ के आरोपों की समीक्षा

कोर्ट के सामने रखी गई शिकायतों में पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप भी शामिल है, जिस पर एक अलग याचिका में सीधे सवाल उठाए गए हैं। वहीं सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि झड़प में करीब 200 पुलिसकर्मी भी घायल हुए। यानी यह सिर्फ एक पक्षीय जांच नहीं, बल्कि दोनों तरफ के आरोपों की समीक्षा होगी।

क्या एक ज्यादा स्पष्ट नेशनल फ्रेमवर्क की जरूरत है?

यह सिर्फ एक प्रदर्शन की जांच नहीं है। असली महत्व इस सवाल का है कि भारत में प्रोटेस्ट पोलिसिंग के लिए क्या एक ज्यादा स्पष्ट नेशनल फ्रेमवर्क की जरूरत है? और रिपोर्ट्स के मुताबिक समिति यह भी देख सकती है कि प्रदर्शनों के दौरान ग्रेडेड यूज ऑफ फोर्स यानी परिस्थिति के अनुसार क्रमिक और अनुपातिक बल-प्रयोग के लिए दिशा-निर्देश कैसे बनें?

संविधान प्रदर्शन की इजाजत देता है, अराजकता की नहीं

संविधान का आर्टिकल 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि आर्टिकल 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है। लेकिन ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं। आर्टिकल 19 के तहत सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर रेस्पोंसिबल रिस्ट्रिक्शन लगाए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के मजदूर किसान संगठन मामले में साफ किया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन प्रशासन को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून के तहत कार्रवाई करने की शक्ति भी है। हालांकि इस शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अधिकारी कानून की सीमा से बाहर जाकर ज्यादती नहीं कर सकते। यानी सवाल यह नहीं कि पुलिस कार्रवाई कर सकती है या नहीं। सवाल यह है कि कब, क्यों और कितनी?

आनुपातिकता बनेगी पुलिस कार्रवाई की असली कसौटी?

यदि प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण हैं तो, बातचीत, मार्ग बदलना, बैरिकेडिंग या चेतावनी जैसे कम कठोर उपाय पहले विकल्प हो सकते हैं। लेकिन यदि भीड़ पत्थरबाजी कर रही है या गंभीर नुकसान का तत्काल खतरा है, तो पुलिस की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से अलग होगी। हिमत लाल के. शाह मामले में भी अदालत ने माना था कि राज्य सार्वजनिक व्यवस्था के लिए सभाओं को रेगुलेट कर सकता है, लेकिन ऐसा रेगुलेशन नागरिकों के सभा के अधिकार को पूरी तरह खत्म करने वाला नहीं होना चाहिए।

ब्रिटेन में पुलिसिंग के आधिकारिक मानकों में बल को वैध, आवश्यक, उचित और आनुपातिक होने की कसौटियों पर देखा जाता है। क्या बल के बजाय कोई कम प्रतिबंधात्मक विकल्प उपलब्ध था और इस्तेमाल किया गया बल उद्देश्य के लिए न्यूनतम आवश्यक था या नहीं। यह मॉडल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तुलनात्मक अध्ययन देता है। बल की मात्रा सिर्फ भीड़ के आकार से नहीं, खतरे की वास्तविक प्रकृति से तय होनी चाहिए।

CCTV, कार्रवाई का रिकॉर्ड भी उतना ही जरूरी

सुप्रीम कोर्ट पहले से ही पुलिस स्टेशनों में फंकश्नल सीसीटीवी कैमरा के मुद्दे की निगरानी कर रहा है। अगस्त 2026 में केंद्र ने अदालत को बताया कि पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए एक अंब्रेला स्कीम पर विचार चल रहा है। मौजूदा ASUMP योजना को 31 मार्च 2027 तक बढ़ाया गया है। प्रोटेस्ट पोलिसिंग में बॉडी कैमरा, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड भविष्य में यह तय करने में अहम सबूत बन सकते हैं कि टकराव कैसे शुरू हुआ और किस स्तर पर बल इस्तेमाल किया गया।

दुनिया से भारत क्या सीख सकता है?

ब्रिटेन का उदाहरण बताता है कि प्रोटेस्ट मैनेजमेंटको केवल भीड़ को नियंत्रित करने की तरह नहीं, बल्कि मानव अधिकारों और पब्लिक सुरक्षा के संयुक्त फ्रेमवर्क की तरह देखा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मूलरूप आदर्श भी यही सुझाते हैं। जहां संभव हो अहिंसा के तरीके पहले अपनाए जाएं। बल प्रयोग तभी हो जब दूसरे उपाय प्रभावी न हों, वह भी संयम और आनुपातिकता के साथ। भारत के सामने चुनौती अब इसी सिद्धांत को अपनी संवैधानिक व्यवस्था और जमीनी हकीकत के अनुरूप ढालने की है।

अब फैसला सिर्फ पुलिस का नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट की प्रस्तावित समिति की सबसे बड़ी अहमियत शायद किसी एक घटना में दोष तय करने से आगे है। अगर इससे स्पष्ट दिशा-निर्देश निकलती हैं, तो भविष्य में पुलिस अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों दोनों के लिए नियम ज्यादा स्पष्ट हो सकते हैं।

एक लोकतंत्र में पुलिस का काम सिर्फ भीड़ हटाना नहीं है और प्रदर्शनकारी का अधिकार भी हिंसा करने का लाइसेंस नहीं है। इसलिए आने वाले समय का सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद यह होगा कि, 'प्रदर्शन रोकना है या हिंसा रोकनी है?' इन दोनों को एक मान लेने पर लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन इनके बीच स्पष्ट कानूनी रेखा खींच दी जाए, तो पुलिस को भी पता होगा कि उसकी शक्ति कहां तक है, और नागरिकों को भी यह भरोसा मिलेगा कि शांतिपूर्ण असहमति को अपराध नहीं माना जाएगा।

यही वह बिंदु है जहां सुप्रीम कोर्ट की पहल भारत की प्रोटेस्ट पॉलिटिक्स के लिए एक नए नियम की शुरुआत कर सकती है। बल जितना जरूरी हो, उतना ही और हर इस्तेमाल की जवाबदेही उतनी ही स्पष्ट।