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अब पराली नहीं जला रहे किसान, आलू का उत्पादन बढ़ाने में मिली मदद, पंजाब व हरियाणा में खेती का बदल रहा तरीका

पंजाब और हरियाणा में किसान धान की पराली जलाने के बजाय उसे खेत में मिलाकर आलू की खेती करने की तकनीक अपना रहे हैं। इससे पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने के साथ मिट्टी में जैविक पदार्थ वापस पहुंचाने और कुछ किसानों के अनुसार आलू की पैदावार बढ़ाने में मदद मिल रही है।
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Adarsh Thakur

Sep 17, 2026

Potato Farming From Crop Residue

सांकेतिक इमेजः ChatGPT

पंजाब और हरियाणा में धान की पराली को लेकर हर साल प्रदूषण की समस्या सामने आती है। किसान पराली जलाने के बजाय अब इसे खेत में ही मिलाकर अगली फसल उगाने के तरीके अपना रहे हैं। खास बात यह है कि धान की कटाई के बाद इसी अवशेष को मिट्टी में मिलाकर आलू की खेती की जा सकती है। इससे पराली जलाने की जरूरत कम होती है और मिट्टी की सेहत के साथ फसल की पैदावार पर भी सकारात्मक असर देखा गया है।

भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय महिला कृषि संस्थान (ICAR-CIWA) के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सुकांत कुमार सारंगी ने इस तरीके की खोज की है। उन्होंने बताया है कि पराली को जलाने के बजाय उसमें आलू उगाने से कई लाभ मिलते हैं। इस तकनीक से पानी की खपत लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है, जबकि आलू की पैदावार 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

पराली से आलू की खेती कैसे होती है?

धान की कटाई के बाद खेत में बड़ी मात्रा में पुआल और फसल अवशेष बचते हैं। इन्हें जलाने के बजाय मशीनों की मदद से खेत में काटकर मिट्टी में मिलाया जाता है। इसके बाद आलू की बुवाई की जाती है। इस प्रक्रिया को इन सीटू क्रॉप रेजिड्यू मैनेजमेंट कहा जाता है।

आईसीएआर के अनुसार पंजाब और हरियाणा में धान आलू फसल चक्र बड़े स्तर पर अपनाया जाता है। फसल अवशेष जलाने से हवा में प्रदूषक गैसें और कण बढ़ते हैं। इसके अलावा मिट्टी के पोषक तत्व और जैव विविधता भी प्रभावित होती है। इसलिए अवशेष को खेत में बनाए रखना या मिट्टी में मिलाना एक विकल्प है।

किसानों को मिल रहा पैदावार का फायदा

पंजाब के कुछ किसानों ने पराली को मिट्टी में मिलाकर आलू की पैदावार बढ़ने की बात कही है। बरनाला जिले में किसानों के एक समूह ने बताया कि खेत में धान का अवशेष मिलाने के बाद उनकी आलू की पैदावार करीब 250 से 300 बोरी प्रति एकड़ से बढ़कर लगभग 350 बोरी तक पहुंची।

कुछ किसान इस तरीके से खाद और दूसरे इनपुट की जरूरत कम होने की बात भी बताते हैं। पंजाब में ऐसे उदाहरण पहले भी सामने आए हैं जहां किसानों ने पराली को खेत में मिलाकर आलू और गेहूं जैसी रबी फसलों की खेती की है।

मिट्टी को भी मिल रहा फायदा

पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाने से जैविक पदार्थ मिट्टी में वापस पहुंचता है। इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद मिल सकती है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय भी फसल अवशेष प्रबंधन को मिट्टी की सेहत और टिकाऊ खेती से जोड़ रहा है। सितंबर 2026 में लुधियाना के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, सरफेस सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी तकनीकों की जानकारी दी गई।

पंजाब में आलू की खेती का बड़ा आधार

पंजाब में आलू पहले से ही महत्वपूर्ण फसल है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार 2023-24 में राज्य में करीब 1.17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती हुई और उत्पादन करीब 32.39 लाख टन रहा। जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, लुधियाना और अमृतसर प्रमुख आलू उत्पादक जिलों में शामिल हैं।

कपूरथला जैसे क्षेत्रों में आलू की बीज उत्पादन वाली खेती भी बड़े स्तर पर होती है। 2026 में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने नई अधिक उपज देने वाली आलू किस्मों के खेत प्रदर्शन भी किए।

दिल्ली के प्रदूषण से भी जुड़ा है मामला

पराली जलाने को दिल्ली एनसीआर के वायु प्रदूषण की एक वजह माना जाता है, हालांकि दिल्ली की हवा पर मौसम, स्थानीय प्रदूषण और अन्य कारकों का भी असर होता है। केंद्र की वायु गुणवत्ता प्रबंधन संस्था ने पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष प्रबंधन को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया है। 2025 के धान कटाई सीजन में पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं 2024 के मुकाबले 53 प्रतिशत कम दर्ज हुई थीं।

2026 में भी केंद्र ने पंजाब और हरियाणा को इन सीटू और एक्स सीटू दोनों तरीकों से फसल अवशेष प्रबंधन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

आगे बढ़ सकता है खेती का यह मॉडल

पंजाब में कुछ गांवों ने पराली जलाने के बजाय उसे खेत में मिलाने का मॉडल अपनाकर मिसाल कायम की है। आईसीएआर के अनुसार मोगा का रानसिंह कलां गांव 1310 एकड़ क्षेत्र में लगातार कई वर्षों से अवशेष जलाने से मुक्त रहा है। वहां पराली को मिट्टी में मिलाने और मशीनों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

आलू जैसी रबी फसल के साथ पराली प्रबंधन को जोड़ने से किसानों के सामने एक ऐसा विकल्प बन सकता है जिसमें खेत की सफाई, मिट्टी की सेहत और फसल उत्पादन तीनों पर एक साथ ध्यान दिया जा सके। हालांकि इसका लाभ खेत की मिट्टी, मौसम, मशीनरी, बुवाई के समय और खेती की तकनीक पर निर्भर करेगा। इसलिए किसानों के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार तकनीक अपनाना जरूरी है।