
राजस्थान में समान नागरिक संहिता की तैयारी, लिव-इन समेत कई निजी कानूनों में बदलाव की संभावना। ( फोटो: AI )
Live-in रिलेशनशिप यानी बिना शादी के दो बालिग लोगों का साथ रहना भारत में अपने आप में अपराध नहीं है। हालांकि, ऐसे संबंधों से जुड़े अधिकार, सुरक्षा, बच्चों की स्थिति और विवाद लंबे समय से कानूनी बहस का विषय रहे हैं। राजस्थान में अब इस विषय को लेकर नई हलचल है। ध्यान रहे कि राज्य सरकार समान नागरिक संहिता (UCC) की दिशा में आगे बढ़ रही है और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 15 अगस्त 2026 को राजस्थान सिविल कोड लाने की घोषणा की है। राजस्थान में लिव-इन रिलेशनशिप पर भजनलाल सरकार ने बिना सूचना पुरुष व महिला के एक माह से ज्यादा साथ रहने पर 3 माह की जेल का प्रावधान किया है। राजस्थान में UCC या लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अब तक कोई नया कानून लागू नहीं हुआ है।
राजस्थान में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने के लिए ‘द राजस्थान यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) विधेयक-2026’ तैयार किया गया है। कैबिनेट से मंजूर इस विधेयक में करीब 400 धाराएं प्रस्तावित हैं। इसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप राज्य में अलग-अलग धर्मों के नागरिकों के लिए इन विषयों पर समान कानूनी प्रावधान लागू करना है। विधेयक को अब विधानसभा में पेश किया जाना है। वहीं, संविधान के तहत विशेष रूप से संरक्षित पारंपरिक अधिकारों वाले वर्गों को प्रस्तावित संहिता के दायरे से बाहर रखा गया है।
राजस्थान सरकार की आधिकारिक UCC समिति की वेबसाइट के अनुसार समिति का गठन राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने की समीक्षा, जनता से सुझाव लेने और सरकार को रिपोर्ट देने के लिए किया गया है। वेबसाइट पर 5 अगस्त 2026 तक सुझाव मांगे गए थे। इसका मतलब है कि राजस्थान में इस समय प्रक्रिया कानून बनाने की दिशा में है, न कि ऐसा कानून पहले से लागू हो चुका है।
राजस्थान में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए फिलहाल उत्तराखंड जैसी अलग और व्यापक वैधानिक रजिस्ट्रेशन व्यवस्था लागू नहीं है। हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि जब तक लिव-इन रिलेशनशिप को नियंत्रित करने के लिए उचित कानून नहीं बनता, तब तक ऐसे संबंधों के पंजीकरण के लिए सरकारी प्राधिकरण या ट्रिब्यूनल की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने सरकार के स्तर पर पोर्टल जैसी व्यवस्था शुरू करने की दिशा में भी निर्देश दिए थे।
इस आदेश का उद्देश्य यह नहीं था कि राजस्थान में लिव-इन रिलेशनशिप को अवैध घोषित कर दिया जाए या सभी जोड़ों के लिए कोई नया अपराध बना दिया जाए। इसके पीछे मुख्य चिंता ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोगों की पहचान, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े मामलों को कानूनी व्यवस्था के तहत लाना थी।
भारत में दो सहमति देने वाले बालिग लोगों का साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी वयस्क व्यक्ति की पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व दिया गया है। अदालत ने अलग-अलग मामलों में माना है कि बालिग व्यक्ति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने या साथ रहने का निर्णय ले सकता है।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। विवाह की कानूनी उम्र और बालिग होने की उम्र एक ही चीज नहीं हैं। भारत में सामान्य तौर पर बालिग होने की उम्र 18 वर्ष है, जबकि विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष है। इसलिए केवल यह कहना सही नहीं होगा कि “लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम होने पर वह किसी बालिग महिला के साथ रह ही नहीं सकता।” विवाह और साथ रहने के कानूनी प्रश्न अलग-अलग हैं और किसी मामले में परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
यदि कोई बालिग जोड़ा अपनी इच्छा से साथ रह रहा है और परिवार या किसी अन्य व्यक्ति से उसे वास्तविक खतरा है, तो परिस्थितियों के अनुसार पुलिस या अदालत से सुरक्षा मांगी जा सकती है। ऐसे मामलों में अदालतें व्यक्ति की जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को भी देखती हैं।
सुरक्षा का आदेश किसी रिश्ते को स्वतः वैध विवाह में नहीं बदलता। इसी तरह लिव-इन में रहने मात्र से विवाह के सभी कानूनी अधिकार स्वतः हासिल नहीं हो जाते। प्रत्येक मामले में रिश्ते की प्रकृति, अवधि, सहमति और अन्य परिस्थितियों का महत्व हो सकता है।
लिव-इन रिलेशनशिप के लिए देश में कोई एक केंद्रीय “लिव-इन कानून” नहीं है। लेकिन घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 में “relationship in the nature of marriage” यानी विवाह जैसी प्रकृति वाले संबंध को घरेलू संबंध की परिभाषा में शामिल किया गया है। कानून में साझा घर में रहने वाली महिला के लिए सुरक्षा, निवास और आर्थिक राहत सहित कई तरह के उपाय उपलब्ध हैं।
इस कानून के तहत घरेलू हिंसा में शारीरिक, यौन, मौखिक एवं भावनात्मक और आर्थिक हिंसा जैसी स्थितियां शामिल हैं। मजिस्ट्रेट परिस्थितियों के आधार पर संरक्षण आदेश और अन्य राहत दे सकता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि लिव-इन में रहने वाली महिला के पास परिस्थितियों के अनुसार कानूनी उपाय हो सकते हैं, लेकिन हर लिव-इन रिश्ता स्वतः “विवाह” नहीं माना जाता।
इस मामले में उत्तराखंड सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता लागू की और उसके तहत लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण की औपचारिक व्यवस्था बनाई। राज्य की आधिकारिक UCC वेबसाइट पर आज भी “Registration of Live-in Relationship” और “Termination of Live-in Relationship” सेवाएं उपलब्ध हैं।
उत्तराखंड के UCC नियमों में लिव-इन संबंध के पंजीकरण के लिए दस्तावेज, प्रक्रिया और जांच का ढांचा दिया गया है। आधिकारिक पोर्टल के अनुसार पंजीकरण सेवा की फीस ₹500 और सामान्य सेवा अवधि 30 दिन बताई गई है।
नियमों में कुछ परिस्थितियों में पंजीकरण से इनकार का भी प्रावधान है। उदाहरण के तौर पर यदि दोनों में से कोई पहले से विवाहित है, किसी तीसरे व्यक्ति के साथ पहले से लिव-इन में है, कोई नाबालिग है या सहमति बल, दबाव, धोखे अथवा गलत जानकारी से प्राप्त की गई है, तो पंजीकरण रोका जा सकता है।
उत्तराखंड के आधिकारिक पोर्टल पर लिव-इन रिलेशनशिप की समाप्ति के लिए भी अलग सेवा उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि वहां व्यवस्था केवल संबंध शुरू होने के समय पंजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि संबंध समाप्त होने की प्रक्रिया भी नियमों में शामिल है।
सबसे बड़ा अंतर यही है कि उत्तराखंड में UCC के तहत लिव-इन रजिस्ट्रेशन की वैधानिक और ऑनलाइन प्रशासनिक व्यवस्था लागू है, जबकि राजस्थान में 17 अगस्त 2026 तक ऐसी व्यवस्था कानून के रूप में लागू नहीं हुई है।
राजस्थान सरकार UCC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार की आधिकारिक UCC समिति सुझाव और राय लेने की प्रक्रिया पूरी कर चुकी है। मुख्यमंत्री की 15 अगस्त की घोषणा के बाद अब प्रस्तावित राजस्थान सिविल कोड को लेकर विधानसभा की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
राजस्थान विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध विधेयकों की सूची में 29 जुलाई 2026 तक राजस्थान सिविल कोड का कानून दर्ज नहीं दिखता। इसलिए फिलहाल यह प्रस्तावित कानून कहना ही तथ्यात्मक रूप से सुरक्षित है।
नहीं। पूरे देश में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक समान अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कानून लागू नहीं है। राज्यों की स्थिति अलग हो सकती है। उत्तराखंड में UCC के तहत स्पष्ट रजिस्ट्रेशन व्यवस्था है। राजस्थान में इस समय ऐसी व्यवस्था कानून के रूप में लागू नहीं है।
यही वजह है कि राजस्थान से जुड़ी खबरों में “लिव-इन पर कानून बन गया” और “लिव-इन पर कानून लाने की तैयारी है”—इन दोनों बातों के बीच अंतर करना जरूरी है।
यदि राजस्थान में UCC के तहत लिव-इन रिलेशनशिप के संबंध में प्रावधान लागू किए जाते हैं, तो उनका असर पंजीकरण, पहचान, पार्टनर के अधिकार, बच्चों से जुड़े मुद्दों और विवादों के निपटारे पर पड़ सकता है। लेकिन प्रस्तावित कानून के अंतिम प्रावधान सामने आने और विधानसभा से पारित होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि राजस्थान में वास्तव में कौन-से नियम लागू होंगे।
इसलिए अभी से यह दावा करना सही नहीं होगा कि हर जोड़े को रिश्ता शुरू करने और खत्म करने की सूचना अनिवार्य रूप से किसी पोर्टल पर देनी ही होगी। ऐसी बात तभी निश्चित रूप से कही जा सकती है जब संबंधित विधेयक और उसके नियम आधिकारिक रूप से सामने आ जाएं और कानून लागू हो जाए।
राजस्थान में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर चर्चा तेज जरूर हुई है, लेकिन 17 अगस्त 2026 तक राज्य में ऐसा अलग कानून लागू नहीं हुआ है। राजस्थान सरकार UCC/राजस्थान सिविल कोड की दिशा में आगे बढ़ रही है और आने वाले विधानसभा सत्र में इसकी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। दूसरी ओर, उत्तराखंड इस क्षेत्र में सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहां UCC के तहत लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण और समाप्ति की सरकारी व्यवस्था चल रही है।
बहरहाल,इस पूरे विषय को समझने का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि लिव-इन में रहना और लिव-इन का सरकारी रजिस्ट्रेशन-दो अलग कानूनी पहलू हैं। भारत में बालिगों के साथ रहने के अधिकार को अदालतों ने मान्यता दी है, जबकि कुछ राज्यों ने अब ऐसे संबंधों के प्रशासनिक और कानूनी पंजीकरण की व्यवस्था बनानी शुरू की है।
Updated on:
17 Aug 2026 11:43 am
Published on:
17 Aug 2026 11:36 am
