
सैलरी का सही खर्च कैसे करें? (फोटोः एआई)
हर महीने सैलरी आने का इंतजार रहता है, लेकिन कई लोगों के खाते में पैसा आते ही किराया, EMI, राशन, बिल, ऑनलाइन शॉपिंग और बाहर खाने का खर्च शुरू हो जाता है। महीने के आखिर में सवाल वही रहता है कि आखिर पैसा गया कहां?
इस समस्या का समाधान है सही Money Plan। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी SEBI की Investor Education सामग्री भी बजट बनाने, खर्चों को प्राथमिकता देने, नियमित बचत और निवेश करने तथा Emergency Fund बनाने पर जोर देती है।
ऐसे में 50-30-20 Rule एक आसान शुरुआती ढांचा हो सकता है। इसे अपनाकर अपनी आय, परिवार, कर्ज और लक्ष्यों के हिसाब से बदला जा सकता है।
50-30-20 Rule के मुताबिक टैक्स और जरूरी कटौतियों के बाद मिलने वाली आय को मोटे तौर पर ऐसे देखा जा सकता है:
| हिस्सा | प्रतिशत | इसमें क्या शामिल करें |
|---|---|---|
| जरूरतें | 50% | किराया, राशन, बिजली, यात्रा, EMI |
| इच्छाएं | 30% | घूमना, बाहर खाना, मनोरंजन, शॉपिंग |
| बचत और निवेश | 20% | Emergency Fund, SIP, Retirement आदि |
SEBI भी जरूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं के बीच अंतर समझकर पहले जरूरी खर्चों को प्राथमिकता देने की सलाह देता है।
लेकिन अगर आपकी EMI ज्यादा है या परिवार की जिम्मेदारियां अधिक हैं, तो 50-30-20 का अनुपात बदलना बिल्कुल ठीक है।
सैलरी आने के बाद पहले उन खर्चों को अलग करें, जिनका भुगतान हर महीने करना ही है।
पहली प्राथमिकता:
किराया, राशन, बिजली-पानी, गैस, यात्रा, बच्चों की फीस और जरूरी EMI।
दूसरी प्राथमिकता:
इंश्योरेंस प्रीमियम और इमरजेंसी फंड।
तीसरी प्राथमिकता:
इन्वेस्टमेंट और भविष्य के लक्ष्य।
चौथी प्राथमिकता:
घूमना, बाहर खाना, ऑनलाइन शॉपिंग और दूसरी इच्छाएं।
SEBI के अनुसार बजट का उद्देश्य आय और खर्च को समझना, खर्च नियंत्रित करना, बचत बढ़ाना, कर्ज चुकाना और वित्तीय लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ना है।
हर खर्च को तीन श्रेणियों में लिखना शुरू करें।
जरूरी खर्च: घर का किराया, खाना, स्वास्थ्य, बिजली, बच्चों की पढ़ाई और काम पर आने-जाने का खर्च।
इच्छा वाले खर्च: रेस्टोरेंट, फिल्म, घूमना, ऑनलाइन शॉपिंग और मनोरंजन।
बड़े लक्ष्य: कार, घर, महंगा फोन, विदेश यात्रा या अन्य बड़ी खरीदारी।
SEBI भी जरूरतों को पहले और इच्छाओं को बाद में रखने की सलाह देता है। बिना प्राथमिकता के इच्छाओं पर ज्यादा खर्च करने से बचत मुश्किल हो सकती है।
इमरजेंसी यानी ऐसी रकम जो नौकरी जाने, बीमारी, दुर्घटना या अचानक बड़े खर्च की स्थिति में काम आए।
RBI की फाइनेंशियल एजुकेशन सामग्री के अनुसार, सामान्य तौर पर कम से कम 3 महीने के जीवन-यापन के खर्च जितनी राशि Emergency Fund में रखना उपयोगी है। जिनकी नौकरी या आय कम स्थिर है, उनके लिए 6 महीने या उससे अधिक का खर्च रखना बेहतर हो सकता है। इसे आसानी से उपलब्ध अलग सेविंग अकाउंट में रखने की सलाह दी गई है।
उदाहरण के लिए अगर आपका जरूरी मासिक खर्च ₹30,000 है, तो शुरुआती लक्ष्य ₹90,000 का इमरजेंसी फंड हो सकता है। आय अस्थिर है, तो इसे ₹1.8 लाख या उससे ज्यादा तक ले जाने पर विचार किया जा सकता है।
Health Insurance बीमारी के बड़े खर्च से बचाने में मदद करता है, जबकि Life Insurance परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब परिवार आपकी आय पर निर्भर हो।
SEBI Investor के अनुसार Insurance अप्रत्याशित घटनाओं से होने वाले वित्तीय नुकसान को कम करने के लिए सुरक्षा देता है और Insurance Premium को भी बजट में शामिल करना चाहिए।
इमरजेंसी फंड और जरूरी इंश्योरेंस की व्यवस्था के बाद आय का नियमित हिस्सा लंबे समय के लक्ष्यों के लिए लगाया जा सकता है।
सेबी के अनुसार, जल्दी और नियमित निवेश करने से लंबे समय में Compounding (ब्याज पर ब्याज) का फायदा मिल सकता है। निवेश का चुनाव लक्ष्य, समय और जोखिम क्षमता के आधार पर होना चाहिए।
यानी सैलरी बढ़ने का इंतजार करने के बजाय छोटी रकम से शुरुआत करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लोन लेते समय सिर्फ EMI देखकर फैसला न करें। ब्याज, Processing Fee, Prepayment Charge और कुल भुगतान को भी समझें।
सेबी की सलाह है कि कर्ज लेने से पहले अपनी Repayment Capacity जांचें, अलग-अलग विकल्पों की ब्याज दर और शुल्क की तुलना करें तथा बहुत ज्यादा कर्ज लेने से बचें। अगर पहले से कई EMI चल रही हैं तो नई खरीदारी के लिए नया Loan लेने से पहले पुराने कर्ज की समीक्षा करें।
₹25,000 सैलरी:
लगभग ₹12,500 जरूरी खर्च, ₹7,500 इच्छाओं और ₹5,000 बचत या निवेश की दिशा में रखा जा सकता है। अगर ईएमआई ज्यादा है तो इच्छाओं का हिस्सा कम करें।
₹50,000 सैलरी:
₹25,000 जरूरतें, ₹15,000 इच्छाएं और ₹10,000 बचत, इमरजेंसी फंड और इन्वेस्टमेंट में बांटे जा सकते हैं।
₹1 लाख सैलरी:
₹50,000 जरूरी खर्च, ₹30,000 Lifestyle और ₹20,000 बचत और निवेश के लिए रखा जा सकता है। यदि जरूरतें ₹50,000 से कम हैं तो बची रकम को Lifestyle बढ़ाने के बजाय निवेश और बड़े वित्तीय लक्ष्यों में डालना बेहतर हो सकता है।
सबसे बड़ी गलती है पहले पूरा पैसा खर्च करना और अंत में जो बचे उसे बचाना। बेहतर तरीका है पहले बचत, फिर खर्च।
सैलरी आने के 24 घंटे के भीतर एक तय रकम को अलग खाते या निर्धारित Investment में डाल दें। SEBI भी पहले से बचत की रकम तय करके फिर खर्च की योजना बनाने पर जोर देती है।
हर महीने 4 चीजें जरूर जांचें:
सैलरी कितनी है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है। ₹25,000 कमाने वाला व्यक्ति भी मजबूत आर्थिक आधार बना सकता है और ₹1 लाख कमाने वाला व्यक्ति भी बिना योजना के हर महीने खाली हाथ रह सकता है।
इसलिए सैलरी आते ही यह क्रम रखें: जरूरी खर्च → Insurance → Emergency Fund → EMI Management → Investment → Lifestyle खर्च।
50-30-20 Rule इस सफर की शुरुआत के लिए सुझाव है, अंतिम नियम नहीं। आपकी आय, परिवार, कर्ज और भविष्य के लक्ष्य बदलते हैं तो आपका मनी प्लान भी बदलना चाहिए।
Updated on:
16 Aug 2026 05:25 pm
Published on:
16 Aug 2026 05:25 pm
