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क्या सूरज से चल सकती है कार? जानिए 71 साल पहले किसने पेश किया मिनिएचर सोलर कार मॉडल, 2026 में भी इंतजार क्यों?

Solar powered car 31 August History: हर दिन अपने में सैकड़ों ऐतिहासिक कहानियां समेटे है, ऐसी ही एक कहानी है सोलर कार के सपने की। जरा सोचिए 71 साल पहले ही General Motors के एक इंजीनियर ने सूरज से चलने वाली कार का सपना देखा था, लेकि इतने साल बाद भी ये सपना न वे खुद और न ही कोई और पूरा नहीं कर पाया?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 31, 2026

solar powered car dream incomplete after 71 years

solar powered car dream incomplete after 71 years

Solar powered car 31 August History: 31 अगस्त 1955 में पहली बार सूरज से चलने वाली कार का सपना देखा गया था। उस दिन, General Motors (GM) के इंजीनियर विलियम जी. कॉब ने “Sunmobile” नामक एक मिनिएचर सोलर कार मॉडल पेश किया।

यह सिर्फ 15 इंच (लगभग 38 सेंटीमीटर) लंबा था और इसमें 12 सेलेनियम फोटोवोल्टिक सेल लगे थे, जो सीधे सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करते थे और एक छोटे मोटर को चलाते थे। यह मॉडल GM के Powerama ऑटो शो में चकाचौंध मचा गया था, लेकिन यह केवल एक तकनीकी प्रदर्शन था, व्यावहारिक वाहन नहीं।

तकनीकी चुनौतियां कई

सूरज से चलने वाली कार का सपना अधूरा क्यों रह गया? इसके पीछे कई तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है ऊर्जा की कमी। कार की छत या बॉडी पर लगने वाले सोलर पैनल से मिलने वाली ऊर्जा बहुत सीमित होती है।

आमतौर पर, एक कार की छत पर जितनी जगह होती है, उससे केवल कुछ सौ वॉट्स ही बिजली मिल पाती है। जो एक कार को चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। इसलिए, अधिकांश सोलर कारें या तो बैटरी पर निर्भर होती हैं या फिर सोलर केवल सहायक ऊर्जा का काम करती है।

दूसरी चुनौती है लागत और तकनीकी जटिलता। उच्च दक्षता वाले सोलर सेल (जैसे सिलिकॉन या गैलियम आर्सेनाइड) महंगे होते हैं। साथ ही, हल्के लेकिन मजबूत बैटरी और मोटर सिस्टम की जरूरत होती है, जो लागत को और बढ़ा देते हैं।

डिजाइन और व्यावहारिकता

तीसरी चुनौती है व्यावहारिकता और डिजाइन। सोलर कारों को बहुत हल्का और एयरोडायनामिक बनाना पड़ता है ताकि सीमित ऊर्जा में भी दूरी तय की जा सके। लेकिन यह पारंपरिक कारों की तरह आरामदायक, सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं होतीं। इसलिए, ये आम उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

प्रगति और प्रयास की कहानी

फिर भी, सोलर कारों के क्षेत्र में प्रगति हुई है। 1962 में International Rectifier Company ने 1912 की Baker Electric कार में सोलर पैनल लगाकर पहली पूर्ण आकार की सोलर कार दिखाई। 1982-83 में ऑस्ट्रेलिया में Hans Tholstrup और Larry Perkins ने “Quiet Achiever” नामक सोलर कार से 4,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। यह सोलर कारों का पहला लंबी दूरी का व्यावहारिक प्रयोग था।

भारत में, मणिपाल विश्वविद्यालय की SolarMobil टीम ने “SERVe” (2015) और “SM‑S1” जैसे प्रोटोटाइप बनाए, जो क्रमशः दो-सीटर और चार-सीटर सोलर वाहन थे। दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) ने भी 2012 में राष्ट्रपति भवन से अपनी सोलर पैसेंजर कार को फ्लैग ऑफ किया था, जिसमें 800 वॉट सोलर मॉड्यूल लगे थे और यह 120 किमी/घंटा की रफ्तार तक जा सकती थी।

भविष्य में क्या संभावनाएं?

तो अब सवाल यह है, क्या यह सपना कभी पूरा हो पाएगा? फिलहाल, पूरी तरह सोलर से चलने वाली कारें व्यावहारिक नहीं हैं, लेकिन सोलर तकनीक इलेक्ट्रिक वाहनों में सहायक ऊर्जा के रूप में उपयोगी साबित हो रही है। जैसे-जैसे सोलर सेल की दक्षता बढ़ेगी और लागत घटेगी, भविष्य में सोलर-इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक कारें आम हो सकती हैं।

जानिए आगे क्या?

यदि आप इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने की सोच रहे हैं, तो सोलर पैनल से चार्जिंग विकल्पों पर ध्यान दें, जैसे घर पर सोलर चार्जिंग स्टेशन। इससे बिजली का खर्च कम हो सकता है और पर्यावरण को भी लाभ होगा। साथ ही, सोलर कारों और सोलर-इंटीग्रेटेड वाहनों पर हो रहे शोध और प्रतियोगिताओं पर नजर बनाए रखें। यह तकनीक भविष्य में आपके ड्राइव वे तक पहुंच सकती है।