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बार-बार स्क्रीनशॉट लेने से कमजोर हो रही याददाश्त, वैज्ञानिक रिसर्च में चौकाने वाला खुलासा

क्या जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए आप भी स्क्रीनशॉट लेते हो? स्क्रीनशॉट लेने की आदत के बारे में वैज्ञानिकों ने चौंकाने वाला खुसासा किया है। इस आदत से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव होता है, आइए जानते हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 25, 2026

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सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)

अमेरिका की बिंघमटन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक ताजा शोध में चौंकाने वाला खुलासा किया है। शोध पत्रिका 'मेमरी एंड कॉग्निशन' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, यदि किसी अनुभव के दौरान फोटो या स्क्रीनशॉट लिया जाता है तो उस जानकारी या घटना की याददाश्त कमजोर पड़ जाती है। इसे 'फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट' कहा जाता है। यह खासतौर पर तब होता है, जब ली गई तस्वीर को बाद में दोबारा देखा नहीं जाता। यह शोध सोफिया फैब्रिजियो के नेतृत्व में रेबेका लूरी और मनोविज्ञान की प्रोफेसर डीन वेस्टरमैन ने मिलकर किया है।

7 प्रयोगों से हुई पुष्टि


शोधकर्ताओं ने डिजिटल कैप्चर इफेक्ट को समझने के लिए सात प्रयोगों की एक शृंखला की, जिनमें प्रतिभागियों को कलाकृतियों की तस्वीरें खींचने को कहा गया और फिर उनकी याददाश्त परखी गई। कुछ प्रयोगों में यह जांचने के लिए गणित के सवाल भी शामिल किए गए कि क्या प्रतिभागियों की संज्ञानात्मक क्षमता कहीं और लग रही थी। किसी भी प्रयोग में तस्वीर लेने से याददाश्त को होने वाले नुकसान की तुलना में कोई स्पष्ट फायदा सामने नहीं आया।

नतीजों से पता चला कि स्क्रीनशॉट लेने से याददाश्त पर औसतन काफी बड़ा नकारात्मक असर (d=1.35) पड़ता है, जबकि इसके बदले सोर्स मेमोरी, बाद में सीखी गई जानकारी या किसी संज्ञानात्मक कार्य में प्रदर्शन को लेकर कोई अपेक्षित फायदा नहीं मिला। इसके पीछे की वजह 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' सिद्धांत से समझी जाती है। यानी लोग जानकारी को याद रखने के बजाय अवचेतन रूप से किसी बाहरी डिवाइस पर निर्भर हो जाते हैं। यह मानते हुए कि डिवाइस उनके लिए वह जानकारी संभाल कर रखेगा। इसमें ध्यान का बंटना भी एक भूमिका निभाता है।

तस्वीर खींचने की क्रिया उन संज्ञानात्मक संसाधनों को हटा देती है, जो अन्यथा जानकारी को याद में दर्ज करने में लगते हैं। हालांकि शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह अकेला मुख्य कारण होने की संभावना कम है, क्योंकि तस्वीर लेने से पहले या बाद में अतिरिक्त समय दिए जाने पर भी लोगों में तुलनीय कमी देखी गई।

हर दिन हजारों तस्वीरें पर याद कुछ नहीं


अनुमानों के मुताबिक, एक औसत व्यक्ति रोजाना करीब 20 तस्वीरें या स्क्रीनशॉट लेता है और उसके स्मार्टफोन में औसतन करीब 2,000 तस्वीरें जमा रहती हैं। फैब्रिजियो के मुताबिक, अगर इन तस्वीरों को याददाश्त दोहराने के संकेत के तौर पर सक्रिय रूप से दोबारा न देखा जाए, तो इनका कोई स्मृति-लाभ नहीं मिलता है। यानी ज्यादातर स्क्रीनशॉट सिर्फ फोन में जमा होकर रह जाते हैं, दिमाग में नहीं।

स्मार्टफोन की मौजूदगी मात्र से भी असर

समस्या सिर्फ स्क्रीनशॉट तक सीमित नहीं है। प्रयोगशाला में हुए अध्ययनों से पता चला है कि स्मार्टफोन की नोटिफिकेशन सुनाई देने भर से ध्यान-केंद्रित कार्यों में प्रदर्शन प्रभावित होता है। सिर्फ फोन का पास व नजर में मौजूद होना ही कार्यशील स्मृति (वर्किंग मेमोरी) व सतत ध्यान को कमजोर कर सकता है। इसी कड़ी में एक महीने तक चले एक रैंडमाइज्ड नियंत्रित परीक्षण में सामने आया, जब प्रतिभागियों के स्मार्टफोन पर दो हफ्तों के लिए मोबाइल इंटरनेट एक्सेस पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया, तो उनके सतत ध्यान, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत खुशहाली में सुधार देखा गया।

नींद और बच्चों पर भी असर

देर रात तक स्क्रीन पर बने रहना नींद के चक्र को बिगाड़ता है, जिससे अगले दिन सीखने व ध्यान लगाने की क्षमता प्रभावित होती है। यह बात लंबे समय से नींद विज्ञान में स्थापित है। बच्चों को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। जामा पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, माता-पिता के अत्यधिक स्मार्टफोन इस्तेमाल का सीधा संबंध बच्चों में शब्द-भंडार (वोकैबुलरी) के धीमे विकास से पाया गया।

अभिभावक द्वारा रोजाना एक अतिरिक्त घंटा फोन पर बिताए जाने पर बच्चों की सालाना शब्द-भंडार वृद्धि में कमी दर्ज हुई। नॉर्वेजियन बच्चों पर हुए एक शोध में भी पाया गया कि प्राथमिक अभिभावक का अधिक स्मार्टफोन इस्तेमाल 5 से 7 साल की उम्र के बीच बच्चों की शब्द-समझ क्षमता के धीमे विकास से जुड़ा था। इसी तरह एक बड़े सर्वेक्षण में पाया गया कि रोजाना एक घंटे या उससे ज्यादा मोबाइल स्क्रीन टाइम बच्चों में भाषा-विकास स्कोर घटने और भाषा-समझ व अभिव्यक्ति संबंधी दिक्कतों की आशंका बढ़ने से जुड़ा है। हालांकि बच्चे को नियमित रूप से पढ़कर सुनाना इस नुकसान को कुछ हद तक कम कर सकता है।

क्या है विशेषज्ञों की राय?

विशेषज्ञ पूरी तरह तकनीक छोड़ने की सलाह नहीं देते, बल्कि सजग इस्तेमाल पर जोर देते हैं। शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि सारा स्क्रीन इस्तेमाल नुकसानदेह नहीं होता, बल्कि स्क्रीन के इस्तेमाल का तरीका और संदर्भ मायने रखता है। पूरे परिवार के स्क्रीन इस्तेमाल के पैटर्न को ध्यान में रखना जरूरी है, न कि सिर्फ बच्चे के स्क्रीन-टाइम को। जरूरी जानकारी को सिर्फ स्क्रीनशॉट में कैद करने के बजाय ध्यान से पढ़ना-समझना, फोन को दूर रखकर काम करना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना और बच्चों के सामने संयमित फोन-इस्तेमाल जैसे छोटे कदम याददाश्त और मानसिक स्पष्टता बनाए रखने में मददगार साबित हो सकते हैं।