
सूखी मिट्टी में उगलवाया सोना(AI)
राजस्थान की तपती धरती, सीमित पानी और रेतीली मिट्टी में खेती करना हमेशा से एक कठिन चुनौती रहा है। नागौर जिले के किसान डालुराम खिलेरी भी सालों से परंपरागत तरीके से रसायनों के सहारे खेती कर रहे थे। शुरुआत में यूरिया और डीएपी ने अच्छी पैदावार दी, लेकिन धीरे-धीरे जमीन सख्त होने लगी, पानी सोखने की क्षमता खत्म हो गई और कीटनाशकों का खर्च मुनाफे को निगलने लगा। जब लागत आमदनी से ज्यादा होने लगी, तब डालुराम ने रसायनों का रास्ता छोड़कर प्रकृति की ओर लौटने का फैसला किया।
आज डालुराम न केवल अपनी बंजर होती जमीन को उपजाऊ बना चुके हैं, बल्कि पूरे मारवाड़ क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।
डालुराम ने अपनी खेती को बचाने के लिए गोबर, गौमूत्र, सूखी घास, नीम की पत्तियां और 'ऑस्ट्रेलियन व लाल केंचुओं' (Eisenia fetida) की मदद से जैविक खाद बनाने की शुरुआत की। उन्होंने अपने खेत के एक हिस्से में वर्मी कंपोस्ट बेड तैयार किए।
प्रक्रिया और समय: जैविक कचरे, गोबर और गौमूत्र की परतों को केंचुओं के साथ मिलाकर तैयार होने में 60 से 90 दिन का समय लगता है।
मिट्टी में सुधार: इस खाद के प्रयोग से मिट्टी का जैविक कार्बन बढ़ा, जमीन की जल-धारण क्षमता (Water Retention Capacity) में सुधार हुआ और मिट्टी भुरभुरी हो गई।
खरपतवार और कीट नियंत्रण: गौमूत्र और नीम के अर्क के नियमित छिड़काव से फसलों में दीमक और फंगस की समस्या लगभग खत्म हो गई।
रासायनिक खेती और जैविक खेती के बीच का आर्थिक अंतर समझने के लिए डालुराम के इस मॉडल का विश्लेषण महत्वपूर्ण है।
| घटक | रासायनिक खेती मॉडल | डालुराम का जैविक मॉडल |
| खाद की लागत | ₹4,000 – ₹6,000 प्रति एकड़ (यूरिया/डीएपी) | ₹500 – ₹1,000 प्रति एकड़ (घर पर तैयार खाद) |
| कीटनाशक खर्च | ₹3,000 – ₹4,500 प्रति एकड़ | शून्य (गौमूत्र, नीमार्क व छाछ का छिड़काव) |
| सिंचाई की जरूरत | अधिक (जमीन जल्दी सूखती है) | 30% कम पानी (नमी लंबे समय तक रुकती है) |
| फसल की गुणवत्ता | औसत, रसायन अवशेष युक्त | उच्च पोषक तत्व, चमकदार और टिकाऊ दाना |
| शुद्ध मुनाफा | लगातार गिरता हुआ | 30% से 35% तक की सीधी बढ़ोतरी |
राजस्थान सरकार ने राज्यभर में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और जमीन के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए “अपनो खेत–अपनी खाद” अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान का उद्देश्य हर किसान को अपने खेत के लिए खुद जैविक खाद और हरी खाद तैयार करने के लिए सक्षम बनाना है।
ग्रीन मैन्योर किट्स का वितरण: छोटे और सीमांत किसानों को ढैंचा (Sesbania) और ग्वार के प्रमाणित बीज मुफ्त बांटे जा रहे हैं।
हरी खाद की तकनीक: फसल बोने से पहले ढैंचा को 40–45 दिन तक उगाकर मिट्टी में पलट दिया जाता है, जिससे जमीन में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों की भरपूर आपूर्ति होती है।
अनुदान और तकनीकी सहयोग: राज्य का कृषि विभाग वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाने और जैविक प्रमाणन (Organic Certification) के लिए सहायता प्रदान कर रहा है।
राजस्थान के नागौर, बीकानेर और जोधपुर जैसे जिलों में मिट्टी की क्षारीयता (Alkalinity) और हाई टीडीएस (TDS) वाला खारा पानी एक बड़ी समस्या है। सरसों, मूंगफली, चना और जीरे की खेती में इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है।
पीएच (pH) स्तर का नियमन: जब मिट्टी का पीएच 8.0 या उससे ऊपर चला जाता है, तो पौधे सूक्ष्म पोषक तत्व सोखना बंद कर देते हैं। ऐसे में जैविक खाद के साथ जिप्सम का संतुलित प्रयोग रामबाण साबित होता है।
कैल्शियम और सल्फर का स्रोत: जिप्सम मिट्टी के सोडियम को हटाकर कैल्शियम और सल्फर की उपलब्धता बढ़ाता है। तिलहनी फसलों (सरसों, मूंगफली) में सल्फर से तेल की मात्रा बढ़ती है, जिससे बाजार में किसान को बेहतर भाव मिलता है।
मिट्टी परीक्षण जरूरी: खेत में कोई भी सुधारक डालने से पहले सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए मिट्टी की जांच कराना आवश्यक है।
डालुराम की सफलता केवल उनके खेत तक सीमित नहीं रही। जब आसपास के किसानों ने देखा कि डालुराम की फसलें सूखे में भी हरी-भरी हैं और उनकी लागत न के बराबर है, तो गांव के अन्य किसानों ने भी रासायनिक खाद छोड़ना शुरू कर दिया।
"शुरुआत में लोग कहते थे कि बिना यूरिया के मारवाड़ की रेतीली जमीन में कुछ नहीं उग सकता। आज वही लोग मेरे पास केंचुए और जैविक खाद बनाने का तरीका सीखने आते हैं। हमारी जमीन हमारी मां है, इसे रसायनों का जहर देकर हम आने वाली पीढ़ियों को बीमार नहीं बना सकते।"
गांव के युवाओं ने अब जैविक खाद के उत्पादन को एक कुटीर उद्योग के रूप में अपना लिया है। वे जैविक सब्जियों और अनाजों को सीधे शहरों के बाजारों में प्रीमियम दामों पर बेच रहे हैं।
रासायनिक खेती से पूरी तरह जैविक खेती पर आने के लिए 2 से 3 साल का समय लगता है। इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करना सबसे सुरक्षित तरीका है:
डालुराम खिलेरी की यह यात्रा दिखाती है कि जब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक कृषि तकनीकों का सही मेल होता है, तो सबसे कठिन भूगोल में भी खुशहाली के नए रास्ते खुलते हैं। जैविक खाद केवल फसल उगाने का साधन नहीं, बल्कि जमीन, पर्यावरण और किसान की आजीविका को सुरक्षित रखने का स्थायी समाधान है।
Updated on:
25 Aug 2026 10:16 pm
Published on:
25 Aug 2026 10:16 pm
