
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
सुबह किसी पेड़ से आती चिड़िया की मीठी आवाज मिनटों में तनाव गायब कर देती है। अब यह कुदरती आवाज धीरे-धीरे गायब हो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ट्रैफिक का हल्का शोर भी तनाव मिटाने वाले इस कुदरती 'नेचुरल टॉनिक' को बेअसर कर देता है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के शोधकर्ताओं की नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि शहरों का ट्रैफिक शोर, चाहे वह कितना भी हल्का क्यों न हो, पक्षियों की चहचहाहट से मिलने वाले मानसिक फायदों को लगभग बेअसर कर देता है। यह अध्ययन 26 अगस्त 2026 को ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसाइटी की जर्नल 'पीपल एंड नेचर' में प्रकाशित हुआ। शोध का नेतृत्व पर्यावरण मनोविज्ञान की विशेषज्ञ डॉ. मेलिसा मार्सेल और डॉ. एलेनॉर रैटक्लिफ ने किया।
वैज्ञानिकों ने अपनी बात साबित करने के लिए दो अलग-अलग शोध किए। पहली शोध में 1,500 से ज्यादा प्रतिभागियों को 9 अलग-अलग 'साउंडस्केप' (प्राकृतिक ध्वनियों और ट्रैफिक शोर के मिश्रण) सुनाए गए, जिनकी तीव्रता और जटिलता अलग-अलग रखी गई थी। इसके बाद उनसे पूछा गया कि वे कितना रिलैक्स और तरोताजा महसूस कर रहे हैं? दूसरी स्टडी में 63 प्रतिभागियों को लैब में बुलाकर हार्ट-रेट मॉनिटर पहनाया गया और वही 9 साउंडस्केप सुनाए गए। ताकि उनके शरीर पर पड़ने वाला वास्तविक शारीरिक असर मापा जा सके।
रिसर्च के नतीजों में सामने आया कि पक्षियों की चहचहाहट वाले प्राकृतिक साउंडस्केप का मनोवैज्ञानिक फायदा तब भी मिलता रहा, जब उसकी ध्वनि-विशेषताएं अलग-अलग थीं। लेकिन जैसे ही उसमें ट्रैफिक का शोर घुला तो प्रतिभागियों को मिलने वाला मानसिक सुकून काफी घट गया। खास बात है कि यह शोर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिन के समय के लिए तय शोर मानकों से भी कम था। इसके बावजूद ट्रैफिक का शोर ने प्राकृतिक साउंडस्केप का असर कम कर दिया।
लैब स्टडी में हार्ट-रेट वैरिएबिलिटी (हृदय गति में उतार-चढ़ाव) भी उन प्रतिभागियों में काफी कम पाई गई, जिन्होंने ट्रैफिक शोर मिले साउंडस्केप सुने। यानी शरीर पर तनाव का असर ज्यादा हुआ। दिलचस्प बात यह रही कि जब साउंडस्केप पहले से ही तेज
और जटिल था, तब ट्रैफिक शोर का नकारात्मक असर और भी दोगुना हो गया। इसे शोधकर्ता 'ओवरस्टिमुलेशन' यानी अत्यधिक ध्वनि-उद्दीपन का नतीजा मानते हैं।
अध्ययन में इस्तेमाल हुए हर साउंडस्केप में असल में सिर्फ 3 प्रजातियों की 5 अलग-अलग पक्षी-ध्वनियां ही शामिल थीं, फिर भी जिन प्रतिभागियों को लगा कि वे ज़्यादा तरह के पक्षी सुन रहे हैं। उन्होंने ज़्यादा मानसिक सुकून महसूस किया। यानी असल विविधता से ज़्यादा मायने रखती है, व्यक्ति की अपनी अनुभूति। जिन लोगों को पक्षियों की बेहतर पहचान थी, उन्होंने भी ज़्यादा भलाई (वेलबीइंग) और ज़्यादा विविधता महसूस करने की बात कही।
बड़ी संख्या में प्रतिभागियों के चलते शोधकर्ता अलग-अलग उम्र-वर्गों की तुलना भी कर पाए। नतीजों से पता चला कि युवा प्रतिभागियों ने बुजुर्गों की तुलना में ज़्यादा सुकून महसूस किया। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इसकी वजह युवाओं की बेहतर सुनने की क्षमता हो सकती है, जिससे उन्हें साउंडस्केप का ज़्यादा गुणवत्तापूर्ण अनुभव मिला होगा।
डॉ. मार्सेल के मुताबिक, प्रकृति के बीच रहना और उसकी आवाज़ें सुनना भलाई बढ़ाने का एक स्वाभाविक तरीका है, लेकिन आधुनिक औद्योगिक दुनिया के शोर के असर को समझना ज़रूरी है, ताकि शांत खुले स्थान तलाशे जा सकें। वहीं, डॉ. रैटक्लिफ का कहना है कि शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि लोग उनका पूरा फायदा उठा सकें। इसके लिए शोध टीम ने कुछ सुझाव दिए हैं, जैसे- पार्कों और हरित क्षेत्रों के पास सड़कों पर वाहनों की गति-सीमा घटाई जाए। पार्क की बाहरी सीमाओं पर घनी, ज़मीनी झाड़ियां व पौधे लगाए जाएं, ताकि वे सड़क के शोर को काफी हद तक सोख सकें।
यह पहला अध्ययन नहीं है। नवंबर 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ द वेस्ट ऑफ इंग्लैंड और बैट कंज़र्वेशन ट्रस्ट के शोधकर्ताओं ने जर्नल 'PLoS One' में प्रकाशित अपने अध्ययन में भी पाया था कि प्राकृतिक साउंडस्केप तनाव व चिंता घटाते हैं, लेकिन उनमें घुला ट्रैफिक शोर इस फायदे को काफी हद तक बेअसर कर देता है। दो साल के अंतराल पर आए दो स्वतंत्र अध्ययनों का एक ही नतीजे पर पहुंचना इस चेतावनी को और पुख्ता करता है कि शहरी योजना बनाते समय ध्वनि-प्रदूषण को गंभीरता से लेना जरूरी है।
Updated on:
29 Aug 2026 04:54 pm
Published on:
29 Aug 2026 04:54 pm
