
महिला शक्ति किसी से कम नहीं जिले में महिलाओं की जनसंख्या 951709बालिकाओं की जनसंख्या (0- वर्ष) : 1,19,320साक्षरता स्थिति : 5,54,096 नोट : आंकड़े ग्वालियर जिले के 2011 की जनगणना के अनुसार

1989 में 30 बच्चों के साथ की थी शुरुआत "पद्मश्री से विभूषित उमा तुली ने अमर ज्योति स्कूल की स्थापना 1989 में 15 नॉर्मल और 15 दिव्यांग बच्चों के साथ की। आज वह संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है। दिव्यांग बच्चों को समाज की मुख्य धारा से जोडऩे के लिए एजुकेट करने के साथ ही स्पोट्र्स, कल्चरल, आर्ट मेडिकल एंड कम्प्यूटर एजुकेशन से भी जोड़ा जा रहा है। पद्मश्री ने बताया कि मैंने जब एक पेड़ के नीचे बच्चों को क्लास देनी शुरू की, तो लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि उमा पागल हो गई है। दिव्यांग बच्चों मुख्य धारा से कैसे जोड़ा जा सकता है। यह तो समाज का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन मैंने अपना प्रयास जारी रखा और सरकार ने मेरे इनिशिएटिव को सराहते हुए कई योजनाएं निकालीं, जिनसे आज दिव्यांग अपने लक्ष्य को पूरा कर पा रहे हैं।" उमा तुली, पद्मश्री से विभूषित

बीस साल की मेहनत के बाद बनाया एम्पायर तीन बच्चों की परवरिश, बीमार मदर इन लॉ की सेवा के साथ सन् 2000 में बिजनेस की शुरुआत करने वाली नीता छापरिया ने आज एक बड़ा एम्पायर खड़ा कर लिया है। 20 साल पहले शुरू किया बिजनेस जिसका आज टर्नओवर 1 अरब रुपए है। वह ग्वालियर में हिंदुस्तान लीवर, आइटीसी और ब्रिटानिया कंपनी की डिस्ट्रीब्यूटर हैं। उनकी एक बेटी विजया गुडग़ांव में जॉब कर रही है। दूसरी बेटी हर्षा और बेटा हिमांशु बिजनेस में उनके साथ हाथ बटा रहे हैं। उन्होंने कहा मुझे सपोर्ट नहीं मिला, लेकिन आज उनके साथ लगभग 100 लोगों का स्टाफ है। नीता छापरिया, बिजनेस वुमन ग्वालियर

बड़े सपनों को पूरा करने दोगुनी मेहनत करें शहर की पहली सबसे छोटी उम्र की टीवी एक्ट्रेस सारिका बहलोरिया का कहना है आज भी छोटी जगहों की लड़कियों को काफी कुछ सहना पड़ता है। ऐसे में निराश होने के बजाए बड़े सपने देखने और उन सपनों को पूरा करने के लिए दोगुना काम करने की जरूरत है। सीरियल ‘गुडिय़ा हमारी सब पर भारी’ में सिलेक्शन बहुत ही कम एज में हो गया, लेकिन मैं कॉन्फीडेंट रही और सफलता पाई। कड़ी मेहनत और कोशिश हमेशा रंग लाती है, जो मैंने की। एक बात याद रखें कि अपनी तरफ आने वाले सही मौकों का इंतजार करें और जब भी मौका मिले उसे छोड़े नहीं। मेरी मां मेरे जीवन में सबसे बड़ी प्रेरणा रही हैं, मेरे परों को उड़ान देने वाली वही हैं। सारिका बहलोरिया, टीवी एक्ट्रेस

सोनिया ने वल्र्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज कराया नाम म्यूजिक यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ फाइन आर्ट का कोर्स कर रहीं आर्टिस्ट सोनिया जैन ने अपनी टीम के साथ मिलकर वल्र्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम शामिल कराया। उन्होंने एक मार्च को इंदौर के अलवासा स्थित मॉडर्न ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट के कैंपस में प्रख्यात चित्रकार साहिल लहरी समेत 100 कलाकारों की टीम ने लगभग 6 हजार पुराने जींस से इंदौर के रजवाड़े का 10 हजार वर्ग फीट में कलाकृति बनाई। यह विश्व रिकॉर्ड एक मार्च को बना, जिसमें दिल्ली से आई यीके की टीम की मौजूदगी में वल्र्ड बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज किया गया। इस टीम में म्यूजिक यूनिवर्सिटी की सोनिया भी शामिल थीं। सोनिया जैन, म्यूजिक यूनिवर्सिटी से फाइन आर्ट की छात्रा

जीवाजी विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति जीवाजी विश्वविद्यालय में 2009 में तीन माह कुलपति के पद पर रहीं प्रो शशिप्रभा के बाद प्रो संगीता शुक्ला के इतिहास में पहली कुलपति हैं, जिनको लगातार दो बार कार्यकाल मिला है। 2013 में कुलपति बनने से पूर्व वे बॉटनी की विभागाध्यक्ष रही थीं। वर्तमान में प्रशासनिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ शोध कार्यों में लगे शोधार्थियों के मार्गदर्शन के लिए हमेशा आगे हैं। एक ही विश्वविद्यालय मेंं दो बार कुलपति के पद पर रहने वालीं प्रदेश की पहली महिला को छात्र आंदोलन और आंतरिक विरोध का भी सामना करना पड़ा है लेकिन हर बार बेहतर समझ और सामंजस्य के साथ उबरकर विवि को मैनुअल से तकनीकी व्यवस्थाओं तक ले गईं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय स्टैंडिंग कमेटी की अध्यक्ष भी हैं। प्रो. संगीता शुक्ला, कुलपति, जेयू

चुनौती आती हैं सामना करना जरूरी है जीवाजी विश्वविद्यालय मेंं गणित अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष रहीं डॉ रेनू जैन को पिछले वर्ष डीएवीवी इंदौर की कुलपति बनाया गया था। 24 जून को धारा-52 लगने के बाद तत्कालीन कुलपति प्रो नरेन्द्र धाकड़ को हटाए जाने के बाद विश्वविद्यालय के 55 साल के इतिहास में पहली महिला कुलपति के रूप में डॉ जैन ने पद ग्रहण किया था। इसके बाद से छात्रों की समस्याओं को सुलझाने के लिए लगातार काम कर रही हैं। इसके साथ ही कुलपति का कहना है कि समय मिलने पर गणित विषय की क्लास लेना उन्हें अच्छा लगता है। डॉ. रेनू जैन, कुलपति- डीएवीवी इंदौर

भारत की सबसे कम उम्र की महिला क्रिकेट अंपायर ग्वालियर में जन्मी शुभदा भोंसले गायकवाड़ भारतीय क्रिकेट इतिहास में वह कारनामा कर दिखाया जो फिलहाल अब तक कोई नहीं कर पाया। शुभदा भारत की सबसे कम उम्र की महिला क्रिकेट अंपायर है। बचपन में शुभदा की क्रिकेट में कोई रूचि नहीं थी। पिता क्रिकेट कोच थे और चाचा रणजी खिलाड़ी, इसलिए क्रिकेट खेलना शुरू किया। अंडर-19 क्रिकेट टूर्नामेंट में एमपी के लिए खेल रही थी, तब "ओ" अंपायरिंग परीक्षा दी और पास कर लिया। शुभदा बताती है, हमेशा क्रिकेट के संपर्क में रहना चाहती थीं। अंपायर ही है, जो क्रिकेट खिलाडिय़ों की तुलना में अधिक समय मैदान पर रहता है। जब 2011 में लेवल 1 की परीक्षा पास की, तो भारत में सबसे कम उम्र की महिला क्रिकेट अंपायर बनना, यह मेरा जुनून था। जिसने मुझे आज तक क्रिकेट अंपायर के रूप में जारी रखने के लिए निर्धारित किया। पिता कहते है, मेरी बेटी ने ऐसा उपलब्धि हासिल है जिस पर गर्व है। यह सुनकर काफी अच्छा लगता है। शुभदा भोंसले, महिला क्रिकेट अंपायर