
82 साल पहले अंग्रेजों तक को घुटनों पर ला दिया था। इसके बाद किसानों ने अपने हक के लिए जागीरदारों से जंग लड़ी और अब सामने चुनी हुई सरकार है। अंग्रेजों का राज चला गया। राजशाही भी अब नहीं रही, मगर किसानों का जोश, जज्बा और जुनून आज भी वैसा ही है। पेश हैं किसान आंदोलनों के चुनिंदा किस्से। (फोटो-किसान महापड़ाव सीकर की)

1935 : जागीरदारी प्रथा और अंग्रेजों के खिलाफ वर्ष 1935 में हुए इस आंदोलन का नेतृत्व में महिला किशोरी देवी ने किया। नतीजा, यह रहा कि जागीरदारों और अंग्रेजों को किसानों के सामने घुटने टेकने पड़े और लगान बंद करना पड़ा।

वर्ष 1938 की 12 सितंबर को सीकर के किसान नहीं भूल सकते। इसी दिन लगान माफ करने और अत्याचार के खिलाफ 500 महिलाओं समेत किसान गांव गोठड़ा भूकरान में एकत्रित हुए थे।

1951 : टोल टैक्स आजादी के जमाने से चला आ रहा है। वर्ष 1951 में किसानों को शहरी क्षेत्र में आने पर टोल देना पड़ता था। तत्कालीन राजा से टोल माफ करवाने के लिए वर्ष 1951-52 में आंदोलन किया।

1968 : प्रदेशभर में लेवी टैक्स से मुक्ति भी किसान आंदोलन का ही नतीजा है। सरकार वर्ष 1968 तक बाजार पर लेवी टैक्स वसूलती थी।

1987: सरकार बिजली के नाम पैसे बढ़ाकर किसानों की कमर पहले भी तोड़ती रही है। तीस साल पहले वर्ष 1987 में भी सरकार ने बिजली की दरों में पांच पैसे बढ़ाए थे। किसान एकजुट हुए तो सरकार को बैकफुट पर ला दिया।

1997: इसके बाद भी सरकार ने जब जब भी नाजायज रूप से बिजली की दरें बढ़ाई तो किसानों ने आवाज बुलंद की। वर्ष 1997 में 13 दिन तक जयपुर के अमरूदों का बाग में प्रदर्शन और वर्ष 2005 बिजली कंपनियों के विरोध के फलस्वरूप किसानों बिजली की दरों में राहत मिली।

2017 : इस फरवरी में भी किसानों सरकार को झुका दिया। किसानों ने प्रदेश स्तर पर अपनी मांग पुरजोर ढंग से उठाई तो सरकार बढ़ाई गई बिजली की दरें वापस लेनी पड़ी।

2017 : ...और अब किसान स्वामी नाथन आयोग की सिफारिशें लागू करवाने और कर्जा माफी की मांग को लेकर सप्ताहभर से आंदोलनरत हैं। सीकर में ऐतिहासिक रैली निकाले जाने के साथ ही सात सितम्बर को जिला बंद भी किया जा चुका है। अब 11 सितम्बर को जाम का ऐलान।